यशवंतजी, आपने एक खबर प्रकाशित की है 'गोरखपुर में योगी के खिलाफ खबर छापकर जनसंदेश टाइम्स ने मचाया तहलका'. सच में इस खबर को आप तक पहुंचाने वाले ने तहलका मचाया है. इस खबर को लिखने वाले भाई ने पत्रकारों को योगी आदित्यनाथ का पालतू पत्रकार बताया है, पर जनाब को शायद पता नहीं है कि पत्रकार केवल योगी के ही पालतू नहीं हैं बल्कि तिवारी हाता में भी पालतू पत्रकारों की एक बड़ी फौज है. और योगी की खबर लिखने वाले जिस जितेंद्र पाण्डेय को हीरो बनाया गया है, वो भी उसी हाता के इशारे पर काम करते रहे हैं. इसके पहले भी हाता के उसी इशारे पर काम करते हुए राष्ट्रीय सहारा से भगाए जा चुके हैं.
अब हम भी आपको खबर के भीतर का सच बता रहे हैं. गोरखपुर में सबको पता है कि योगी और तिवारी के बीच अपनी हनक को लेकर शीतयुद्ध काफी समय से चलता रहा है. और यहां के पत्रकारों पर दोनों खेमों के इशारों पर काम करने के आरोप भी लगते रहे हैं. 16 फ़रवरी के जनसंदेश टाइम्स ने महानगर संस्करण में पेज 3 पर आधा पेज से भी ज्यादा बड़ी एक खबर लिखी है – योगी नहीं चाहते ओवरब्रिज बने. खबर पर सीनियर रिपोर्टर जितेंद्र पांडे का नाम भी है. इसमें उन्होंने तथ्य एवं कुछ स्थानीय लोगों के बातचीत के आधार पर खबर लिख डाली है. अब इसमें कितनी सच्चाई है यह जांच का मसला है, पर अब हम इसके पीछे का खेल आपको बताते हैं.
आप गोरखपुर में जितेंद्र पाण्डेय के बारे में जानकारी ले सकते हैं, अपने कारनामों के चलते यह चर्चित रहते हैं. इसी आधार पर अमर उजाला प्रबंधन ने इन्हें गोरखपुर से मुरादाबाद भेजा था. पर गोरखपुर जैसा मजा मुरादाबाद में कहां मिलता तभी तो हाता की सिफारिश पर जनसंदेश टाइम्स में नौकरी पा गए. अब हाता का एहसान उतारना था सो योगी के खिलाफ एक खबर लिख दी, और आपके पास खबर भेजने वाले ने इन्हें महिमा मंडित करते हुए महान बता डाला. जितेंद्र पाण्डेय इसके पहले भी राष्ट्रीय सहारा में योगी के खिलाफ बिना आधार वाली खबर लिख चुके हैं, जिसके बाद तत्कालीन संपादक ने अपनी जान बचाने के लिए इन्हें दिल्ली दिखाई थी, पर फिर जुगाड़ लगाकर वापस गोरखपुर में आकर गिरे.
सहारा के सहारा समय वीकली अखबार की उस खबर में जितेंद्र पाण्डेय ने एक कथित खुफिया रिपोर्ट के हवाले से लिखा था कि योगी आदित्यनाथ भिंडरावाले साबित हो रहे हैं. खुद की तुलना आतंकवादी से किए जाने के बाद योगी ने खबर का आधार संपादक सिन्हा जी से पूछा. योगी ने संपादक से पूछा कि आप फिर एक भिंडरावाले को क्यों अपने कार्यक्रमों में मुख्य अतिथि बनाकर बुलाते हैं. आपको बता दें कि योगी उस समय सांसद होने के साथ गृहमामलों की समिति में भी शामिल थे. परेशान संपादक ने जितेंद्र पांडेय से खुफिया रिपोर्ट की कॉपी और जानकारी मांगी तो उन्होंने कह दिया कि इसकी कॉपी लखनऊ में खुफिया विभाग के कार्यालय में मिलेगी. आप लखनऊ में क्राइम देखने वाले संवाददाता को कह कर मंगा सकते हैं. इसके बाद संपादक इन पर भड़क गए. संपादक ने कहा कि आपके पास कोई प्रुफ नहीं है और आपने खबर लिख दी.
अब आप ही बताइए कि जिस आदमी के पास एक सांसद की तुलना आतंकवादी से करने जैसी बड़ी खबर हो पर उस खबर के पक्ष में कोई सबूत ना हो फिर भी खबर लिख दी जाए, इसे आप क्या कहेंगे? योगी ने इस मामले में संपादक से सबूत मांगा और सहाराश्री के सामने सारा मामला रखने की बात कही तो संपादक ने अपना गिरेबान बचाने के लिए जितेंद्र पाण्डेय को दिल्ली अटैच कर दिया. अब जितेंद्र पाण्डेय की इस गैरजिम्मेदाराना पत्रकारिता को उनकी शहादत बताकर महिमामंडित किया जा रहा है. खबरें योगी के खिलाफ छपे या तिवारी के, सही खबरें छपनी ही चाहिए, कलम को किसी का गुलाम नहीं होना चाहिए, पर कम से कम ऐसे लोगों को तो महिमामंडित मत करिए, जो पत्रकारिता के नाम पर कलंक लगाते फिरते हों, पत्रकारिता को दूषित करते फिरते हों.
एक बात और जिस शैलेंद्र मणि ने जागरण में रहते हुए कभी साहस के साथ किसी सच को नहीं छापा, आज आखिर उनकी कौन सी मजबूरी हो गई है कि वो भी सच छाप रहे हैं. सच तो यही है कि गोरखपुर में कभी सच की पत्रकारिता हो ही नहीं पाएगी. पत्रकारिता वो ही होगी, जो ताकत के ये दो केंद्र चाहेंगे. वैसे भी कौन कितने पानी में हैं गोरखपुर की जनता सब जानती है. यह अलग बात है कि वो कुछ कहती नहीं है.
एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित. आप भी अगर इस विषय पर कुछ कहना चाहते हैं तो उसे [email protected] पर भेज सकते हैं. आपके अनुरोध पर आपका नाम गुप्त रखा जाएगा.






