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खबरों का खेल वाया नभाटा

अखबार एक ‘प्रोडक्ट’ (उत्पाद) है, जिसे संपादक की कम, ब्रांड मैनेजर की ज्यादा जरूरत है’… इस बात की चर्चा अखबारों के दफ्तरों में 80 के दशक के उतरार्द्ध में शुरू हो गई थी. टाइम्स ग्रुप के अखबार इस ‘ब्रांड विमर्श’ के अगुआ थे. वर्तमान में हिंदी के लगभग सभी अखबार किस तरह से बाजार के सुर में सुर मिलाकर अपना व्यवसायिक हित साध रहे हैं, यह वर्ष 2009 में हुए लोकसभा चुनाव और बाद के विधान सभा चुनावों में पत्रकारिता ने जो भूमिका निभाई उससे खुल कर सामने आ गया.

अखबार एक ‘प्रोडक्ट’ (उत्पाद) है, जिसे संपादक की कम, ब्रांड मैनेजर की ज्यादा जरूरत है’… इस बात की चर्चा अखबारों के दफ्तरों में 80 के दशक के उतरार्द्ध में शुरू हो गई थी. टाइम्स ग्रुप के अखबार इस ‘ब्रांड विमर्श’ के अगुआ थे. वर्तमान में हिंदी के लगभग सभी अखबार किस तरह से बाजार के सुर में सुर मिलाकर अपना व्यवसायिक हित साध रहे हैं, यह वर्ष 2009 में हुए लोकसभा चुनाव और बाद के विधान सभा चुनावों में पत्रकारिता ने जो भूमिका निभाई उससे खुल कर सामने आ गया.

प्रभाष जोशी ने इस सिलसिले में नोट किया था: “अखबारों ने बाकायदा पैकेज बनाए थे और रेट कार्ड छापे थे. पैकेज में चुनाव कवरेज के सभी क्षेत्र कवर किए गए थे. फोटू से लेकर इंटरव्यू और अपील तक की अलग-अलग साइज के अलग-अलग दाम तय किए थे. जिनने ये पैकेज खरीदे उन्हीं की खबरें छपीं. जिनने नहीं खरीदे वे अखबारों के पेजों से गायब रहे.”

असल में जिसे 2009 में ‘पेड न्यूज’ कहा गया और उसकी ‘औपचारिक शुरुआत’ बैनेट कोलमन एंड कंपनी या टाइम्स ग्रुप, जिसके तहत नवभारत टाइम्स प्रकाशित होता है, ने 2003 में मीडिया नेट कंपनी बना कर कर दी थी. इसके तहत टाइम्स ग्रुप के अखबारों के परिशष्टों (Supplement) में कोई व्यक्ति, संस्था, वस्तु या फिल्म का प्रमोशन खबर के रूप में पैसे देकर कर करवा सकता है.

वर्ष 2005 में टाइम्स ग्रुप ने मीडिया नेट से आगे जा कर ‘प्राइवेट ट्रीटीज- जिसे उन्होंने ब्रांड कैपिटल’ कहा- की शुरुआत की. इसके करार के तहत टाइम्स ग्रुप के अखबार कंपनियों के विज्ञापन की लागत के बदले उनसे इक्विटी लेता है. लगभग 500 कंपनियों के साथ बैनेट कोलमन कंपनी ने इस तरह का करार किया है. स्पष्टत: इस तरह का करार पाठकों के विश्वास के साथ धोखा है.

हाल ही में (2012) टाइम्स ग्रुप के मालिक ने प्रतिष्ठित अमेरिकी पत्रिका द न्यूयॉर्कर से बात करते हुए कहा “हम खबरों का नहीं, विज्ञापन का कारोबार करते हैं.” हालांकि मीडियानेट को लेकर जब टाइम्स ऑफ इंडिया ने मार्च 2003 में अखबार में खबर दी तब उसने इसे ‘हिताहित का ध्यान रखने वाला, लेखा परीक्षक और प्रहरी की भूमिका में देखा था जो मीडिया की पीआर सेक्टर के साथ बढ़ते मेल जोल का नियमन करेगा.” जाहिर है पेड न्यूज की परिघटना का जनक टाइम्स ग्रुप है और भूमंडलीकरण के दो दशकों के बाद ‘इस कारोबार’ को लेकर अखबार को कोई मलाल नहीं!

पिछले दो दिनों से नवभारत टाइम्स, दिल्ली ने पहले पन्ने पर ‘हो गया NBT+’ नाम से खुद का एक विज्ञापन दे रहा है जिसमें लिखा है-‘अब आपको हर रोज अखबार लगेगा एनबीटी प्लस. यानी अब आपको अपने पसंदीदी सप्लिमेंट हैलो डेल्ही का पूरा मसाला चार बढ़े हुए पेजों के साथ मुख्य अखबार के पन्नों में ही मिल जाएगा.’ और फिर इस बदलाव पर पाठकों से राय मांगी गई है.

जब मैंने नवभारत टाइम्स फोन कर पूछा कि पहले तो सप्लिमेंट के नीचे ' एडवरटोरियल, इनटरटेनमेंट प्रमोशनल फीचर’ लिखा होता था, लेकिन आज के अखबार में ऐसा तो नहीं दिख रहा है, क्यों?' संपादकीय विभाग से जुड़े एक सज्जन ने इस बारे में अनभिज्ञता जाहिर की और कहा कि ‘इस बारे में पूछना पड़ेगा.’ अगले लोकसभा चुनाव को साल भर भी नहीं बचे हैं, ऐसा लग रहा है कि अखबारों ने फिर से तैयारी शुरू कर दी है!

अरविंद दास के ब्लाग से साभार.

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