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खबरों में जीता था और दिल से लिखता था प्रदीप शेखावत

पिछले साल कल ही के दिन यानि 7 दिसंबर को प्रदीप शेखावत ने अचानक यह संसार छोड़ दिया था। प्रदीप का यूं चले जाना निष्पक्ष, ईमानदारी और निष्ठावान पत्रकारिता के लिए एक धक्का था। सिर्फ 12 साल की पत्रकारिता की जिंदगी में प्रदीप ने दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका, दैनिक नवज्योति और फिर दैनिक भास्कर का सफर तय किया तो इसकी वजह भौतिक सुविधाओं या तनख्वाह में बढ़ोत्तरी का लोभ नहीं बल्कि वे हालात थे, जिन्होंने प्रदीप को सहज नहीं रहने दिया।

पिछले साल कल ही के दिन यानि 7 दिसंबर को प्रदीप शेखावत ने अचानक यह संसार छोड़ दिया था। प्रदीप का यूं चले जाना निष्पक्ष, ईमानदारी और निष्ठावान पत्रकारिता के लिए एक धक्का था। सिर्फ 12 साल की पत्रकारिता की जिंदगी में प्रदीप ने दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका, दैनिक नवज्योति और फिर दैनिक भास्कर का सफर तय किया तो इसकी वजह भौतिक सुविधाओं या तनख्वाह में बढ़ोत्तरी का लोभ नहीं बल्कि वे हालात थे, जिन्होंने प्रदीप को सहज नहीं रहने दिया।

सन 1998 के मई-जून में प्रदीप की पत्रकारिता की शुरुआत दैनिक भास्कर, अजमेर के ‘महानगर प्लस’ पर बतौर प्रशि़क्षु पत्रकार हुई थी। छपी हुई खबर के आधार पर मेहनताना मिलता था जो 20 रुपए से लेकर 80 रुपए के बीच होता था। मैं उन दिनों ‘महानगर प्लस’ प्रभारी था इसलिए प्रदीप की पत्रकारिता की शुरुआत मेरे सानिध्य में ही हुई। पहले दिन से ही मुझे कभी नहीं लगा कि प्रदीप को किसी तरह के पत्रकारिता प्रशिक्षण की जरूरत थी। इसकी सीधी सी वजह थी। प्रदीप के भीतर एक समर्पित पत्रकार था जो खबरों में ही जीता था। पत्रकारिता के जरिए आम आदमी की पीड़ा, जज्बात और सच सामने लाने की बैचेनी और व्याकुलता प्रदीप के व्यवहार में साफ नजर आती थी। यही व्याकुलता उसे रात भर भागने के लिए मजबूर करती थी। दोपहर में अपनी महानगर प्लस टीम के प्रशिक्षु साथियों के साथ जब मैं हर पत्रकार से उसकी ताजा और अगली स्टोरी की चर्चा करता तो प्रदीप और संतोष खाचरियावास दो ऐसे साथी थे जो किस खबर पर काम करना है, इसकी चर्चा करने की जगह बनी-बनाई खबरें मेरे आगे सरका देते थे। बाद में कई साथियों ने भी बिना कहे ही प्रदीप की इस आदत को अपनाया।

प्रदीप को डेस्क पर काम करना पसंद था। रात दो-ढाई-तीन बजे जब बाकी साथी पेज छोड़कर घर जाकर सो जाते थे, प्रदीप रेलवे स्टेशन, बस स्टेशन, सूने चौराहों, बंद बाजारों की शटर गिरी दुकानों के चबूतरों, चाय की थड़ियों और फुटपाथों पर जिंदगी की सच्चाइयां खोजता था। बेजार, बेघर, मजबूर, यतीम, विक्षिप्त और ऐसी ही अन्य जिंदगियों की हकीकत अगले दिन प्रदीप की कलम से कागजों पर उतर आती थी। मानवीय संवेदनाओं से गहरे तक जुड़े होने के कारण प्रदीप दिमाग से नहीं दिल से लिखता था। राजनेता और नौकरशाह जिन रिपोर्टरों को सलाम बजाते थे, उनकी खबरों की ‘कापी’ संपादित करते समय उनके ‘सामान्य ज्ञान’ और ‘लेखन कौशल’ को प्रदीप जिन साथियों से शेयर करता था, उनमें मैं भी एक था। जहां-जहां रहा वहां के वरिष्ठ, गरिष्ठ, दमदार पत्रकारों और संपादकों की आदतों, व्यवहार और ‘मैनेज’ हो जाने की बातें शेयर करने मेरे पास दो-तीन महीने में अदालत आ जाया करता था।

प्रदीप मध्य प्रदेश का मूल निवासी था। रेलवे की नौकरी के कारण अजमेर आए पिता यहीं मकान बनाकर बस गए। मां का निधन बहुत पहले हो जाने के कारण दादी ने ही प्रदीप को पाला। कुछ साल पहले दादी भी चल बसीं और चारेक साल पहले पिता के भी चले जाने पर प्रदीप बुरी तरह टूट गया। अंतिम संस्कार के लिए रवाना होने से पहले मेरे गले लिपट कर रूंधे गले से उसने कहा, ‘सब कुछ खत्म हो गया।’ जो बाद में सही साबित हुआ। दादी और पिता की यादों को संजोए हुए मकान को जब भाइयों ने गुपचुप बेच डाला तो प्रदीप की परेशानियां और बढ़ गई। प्रभावशाली लोगों द्वारा नाजायज तरीके से हथिया लिए गए मकान को जब प्रदीप ने वापस पाने की कोशिश में पुलिस, वकीलों और दलालों ने उसे हिला डाला और कुछ पेशों से उसे नफरत हो गई। यह नफरत उसकी निजी रही परंतु इसका असर कभी उसकी खबरों पर हावी नहीं हुआ।

कपाल पर तर्जनी अंगुली टिकाकर उसने बताया था, ‘इस जगह कभी-कभी अचानक तेज दर्द होता है। मैं सहन नहीं कर पाता।’ इलाज के लिए कहा तो टाल गया और बाद में भी टालता रहा। शराब उसके लिए ‘पेन किलर’ विकल्प बन गई। परंतु कभी वह बहका हो या काम में गफलत की हो इसका कोई उदाहरण नहीं है। उसे लड़खड़ाते हुए तक कभी किसी ने नहीं देखा। पता नहीं कितने वरिष्ठ पत्रकार इस बात को स्वीकार करते होंगे, परंतु मैं प्रदीप के सामने भी सभी साथियों के बीच यह स्वीकार करता था और आज प्रदीप के नहीं रहने पर भी सार्वजनिक तौर पर यह स्वीकार कर रहा हूं कि भले ही प्रदीप ने मेरे अधीनस्थ के रूप में पत्रकारिता की शुरुआत की और लम्बे समय तक काम किया परंतु वह मुझसे अच्छा लिखता था, मुझसे अच्छे हैडिंग लगाया करता था। यही वजह थी कि मैं कभी-कभी अपनी खबरें प्रदीप को संपादित करने के अधिकार के साथ पढ़ने दिया करता था और प्रदीप बेहिचक अपनी टिप्पणी भी करता था। ‘मैं चाहता हूं कि इस खबर का हैडिंग और अच्छा बने, यह कहकर कई दफा अपने बनाए पेज मैंने प्रदीप को दिए और उसके लगाए हैडिंग्स ही छपे क्योंकि वे हैडिंग्स से अच्छे थे।

धर्मेंद्र प्रजापति ने बताया, प्रदीप उस समय राजस्थान पत्रिका में जयपुर था। पूर्व उपराष्ट्रपति भैरों सिंह शेखावत कोमा में चले गए थे। कभी भी उनके निधन की खबर आ सकती थी। ज्यादातर अखबारों ने उन पर विशेष सामग्री ना केवल जुटा ली थी बल्कि उनके नहीं रहने के बाद के वाक्य विन्यास की खबरों के पृष्ठ भी बना लिए थे। प्रदीप का फोन आया, यार धर्मेंद्र किस प्रोफेशन में आ गए, भैरों सिंह जी जिंदा हैं और हम हैं कि उन्हें कागजों में मार चुके हैं। जाना सभी को है परंतु एक सच्चे पत्रकार को हमने बहुत पहले खो दिया, यही पीड़ा हमेशा सालती रहेगी।

राजेंद्र हाड़ा राजस्थान के अजमेर के निवासी हैं. करीब दो दशक तक सक्रिय पत्रकारिता में रहे. अब पूर्णकालिक वकील हैं. यदा-कदा लेखन भी करते हैं. लॉ और जर्नलिज्म के स्टूडेंट्स को पढ़ा भी रहे हैं. उनसे संपर्क 09549155160 के जरिए किया जा सकता है

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