बम विस्फोट के आरोपी खालिद मुजाहिद के एस्कोर्ट में लगे नौ पुलिसकर्मियों के डॉक्टर नहीं होने के बाद भी मात्र उसे नजदीक के अस्पताल में नहीं ले जाने पर निलंबित किये जाने के क्रम में सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. नूतन ठाकुर ने मनमाने निलम्बनों के बारे में इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में एक पीआईएल दायर किया है.
पीआईएल में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों द्वारा यह तय हो चुका है कि किसी भी कर्मी का निलंबन सोच-विचार के बाद तभी किया जाए जब उसके खिलाफ वास्तव में कुछ गंभीर आरोप हों. इसके विपरीत उत्तर प्रदेश में तमाम उलूलजलूल कारणों से सरकारी कर्मी निलंबित किये जाते हैं. यही करण है कि इनमें कई बाद में निर्दोष सिद्ध होते हैं. पीआईएल में डॉ. संजय, पूर्व सीओ कैंट, लखनऊ का भी जिक्र है, जिन्हें मात्र डीजीपी के एक प्रश्न का उत्तर नहीं देने के कारण निलंबित किया गया और अब बिना किसी दंड के बहाल करना पड़ा है.
अतः ठाकुर ने प्रार्थना की है कि सभी विभागों को निर्देशित किया जाए कि पिछले पांच साल में जिन निलंबन के मामलों में सरकारी कर्मी बाद में निर्दोष पाए गए, उनमे जांच करा कर निलंबित कराने वालों के खिलाफ कार्यवाही की जाए. उन्होंने भविष्य के लिए भी ऐसी नीति बनाने का निवेदन किया है.





