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‘खुशहाल’ भूटान में नाखुश पत्रकार

भूटान दुनिया का एकमात्र देश है, जो अपने नागरिकों की खुशी को मुख्य सरकारी नीति बनाने का दावा करता है। लेकिन अगर आप देश के निजी पत्रकारों से पूछेगें, तो वो अलग ही राग अलापेगें। देश के पहले निजी अखबार, भूटान टाइम्स, के 2008 में करीब 100 कर्मचारी थे। आज, आप इस साप्ताहिक अखबार के कर्मचारियों की गिनती उगंलियों पर कर सकते हैं।

भूटान दुनिया का एकमात्र देश है, जो अपने नागरिकों की खुशी को मुख्य सरकारी नीति बनाने का दावा करता है। लेकिन अगर आप देश के निजी पत्रकारों से पूछेगें, तो वो अलग ही राग अलापेगें। देश के पहले निजी अखबार, भूटान टाइम्स, के 2008 में करीब 100 कर्मचारी थे। आज, आप इस साप्ताहिक अखबार के कर्मचारियों की गिनती उगंलियों पर कर सकते हैं।

द भूटान ऑब्ज़र्वर की कहानी भी कमोबेश ऐसी ही है। अखबार के 56 कर्मचारी घटकर अब 10 रह गए हैं। इतना ही नहीं पिछले ही महीने इस साप्ताहिकी को अपना प्रिंट संस्करण भी बंद कर देना पड़ा। आज भूटान के दैनिक अखबार हफ्ते में दो दिन वाले बनकर रह गए हैं, दूसरे मीडिया हाउसों ने भी अपने कर्मचारियों की छंटनी की है और मौजूदा कर्मचारियों को तनख्वाह देने के लिए संघर्षरत्त हैं।

“निजी अखबार पूरी तरह अवहनीय हैं और हम निकट भविष्य में किसी तरह की उम्मीद नहीं कर रहे,” भूटान ऑब्ज़र्वर के संपादक नीदरप जांगपो ने कहा।

संवैधानिक राजतंत्र बन चुके भूटान ने 2008 में अपने पहले लोकतांत्रिक चुनावों से पूर्व 2006 में स्वतंत्र निजी मीडिया को काम करने की स्वीकृति दी। तब तक, राष्ट्रीय प्रसारणकर्ता भूटान ब्रॉडकास्टिंग सर्विस (बीबीएस) और पूरी तरह सरकारी स्वामित्व वाला दैनिक क्यूनसेल ही देश में समाचार परोसा करते थे।

पहले दो सालों में आए निजी मीडिया के दो संस्करण हाथों-हाथ लिए गए। लेकिन जब संस्करणों की संख्या करीब दर्जनभर हुई, तो लाभ कम हो गया।

क्योंकि सारे अखबार 90 फीसदी लाभ के लिए सरकारी विज्ञापनों पर निर्भर हैं, लिहाज़ा प्रत्येक प्रकाशन में विज्ञापनों की संख्या का हिस्सा स्वाभाविक तौर पर कम होता चला गया, श्री जांगपो ने बताया। लेकिन स्थिति का बद से बदतर होना अभी बाकी था।

कुछ सालों के अंदर-अंदर, इस छोटे राष्ट्र में आई आर्थिक मंदी के कारण ये हिस्सा आकार में खुद-ब-खुद कम हो गया। हालांकि कुछ मानते हैं कि इसमें पिछली सरकार का हाथ है। उनका कहना है कि निजी मीडिया ने आरोप-प्रत्यारोप वाली खबरें दिखाईं, तो पिछली सरकार ने बहाना बनाते हुए आर्थिक मंदी को उनके खिलाफ इस्तेमाल किया। गौरतलब है कि पाक्षिक अखबार द भूटानीज़ ने तत्कालीन सरकार में व्याप्त भ्रष्टाचार का खुलासा किया था।

ऐसा भूटान द्वारा न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र सभा के 66वें सत्र में सकल राष्ट्रीय खुशी पर उच्च-स्तरीय बैठक आयोजित करने के दौरान हुआ।

भूटान के चौथे राजा द्वारा प्रस्तुत, सकल राष्ट्रीय खुशी राष्ट्र की आधुनिकता और परंपरा में संतुलन बनाए रखने वाली नीति, ज्यादातर निर्बाध विकास को काबू कर, के संदर्भ में उर्द्धत किया जाता है। राष्ट्र अपने नागरिकों का खुशी स्तर जानने के लिए समय-समय पर सर्वेक्षण करवाता है।

हालांकि, राष्ट्रीय राजधानी और निजी मीडिया के केन्द्र थिंपू में खुशी एक तेज़ी से खत्म होता उत्पाद है, उद्योग से जुड़े लोगों ने कहा।

चेंचो डेमा एक ऐसी ही उदाहरण हैं। पिछले पांच महीनों से उन्हें पूरी तनख्वाह नहीं मिली है। “मैं सुबह 10 बजे अपने तीन महीने के बच्चे को लेकर ऑफिस आ जाती थी, क्योंकि घर पर उसे संभालने वाला कोई नहीं था। मैं घर वापस करीब रात 10 बजे ही जा पाती थी, इसके बावजूद मुझे अपनी तनख्वाह का एक हिस्सा ही नसीब होता था, जो महज़ घर का किराया देने में खत्म हो जाता,” अखबार का नाम गुप्त रखने वाली सुश्री डेमा ने बताया।

“भूटान के निजी मीडिया के पत्रकारों में खुशी का अनुपात निराशाजनक है,” एबे थारकन ने कहा। श्री थारकन भारत से हैं और फिलहाल थिंपू में रह रहे हैं, वो 2006 से भूटान के निजी मीडिया से जुड़े हुए हैं।

देश के अकेले कारोबारी अखबार बिज़नेस भूटान को छोड़ने वाले पूर्व संपादक ताशी दोरजी ने पत्रकारिता ही छोड़ दी है, वो इस बात से सहमत हैं। “जब तक निजी मीडिया के अस्तित्व के लिए कोई बड़ा नीतिगत परिवर्तन नहीं किया जाता, तब तक निराशा ही है,” श्री दोरजी ने कहा।

वे ऐसे अकेले पत्रकार नहीं जिन्होंने मोहभंग होने पर ये क्षेत्र छोड़ दिया हो। भूटान पत्रकार संगठन के अध्यक्ष और महासचिव भी अब अखबारों से संबद्ध नहीं हैं, हालांकि वो अब भी इस कारोबार से जुड़े ज़रूरतमंदों की मदद करते हैं।

पिछले महीने के आखिर में राष्ट्र की अपनी पहली रिपोर्ट में, प्रधानमंत्री त्सेरिंग तोबगे ने स्वीकार किया था कि प्रिंट मीडिया की वित्त स्थिति उत्साहजनक नहीं है। उन्होंने इस संदर्भ में ज़रूरी कदम उठाने की बात भी की थी, लेकिन ये नहीं बताया कि वो क्या होगें या कब उठाए जाएगें।

एक छोटे बाज़ार के लिए यहां ढेरों अखबार हैं और सरकार के पास बेतहाशा पैसा नहीं है, भूटान सरकार में सूचना और संचार सचिव दाशो कीनले दोरजी ने कहा।

भूटान की आबादी 740,000 और साक्षरता दर 63 फीसदी है।

“अखबार शुरू करना हर नागरिक का अधिकार है, लिहाज़ा हमें एक उदारवादी नीति अपनानी होगी….बाज़ार को फैसला लेने दीजिए,” सूचना और संचार सचिव श्री दोरज़ी ने कहा। उन्होंने कहा कि संकट से निपटने के लिए उन्होंने कुछ कदम प्रस्तावित करने की योजना बनाई है और सरकार जल्द ही इनका सविस्तार खुलासा करेगी।

बचाव नीति पर फोकस सरकार को ही करना होगा, क्योंकि निजी क्षेत्र छोटा है। लेकिन सरकार की तरफ से विकास के लिए पर्याप्त प्रोत्साहन नहीं है, भूटान ऑब्ज़र्वर के संपादक श्री जांगपो ने कहा। “आर्थिक विकास, जिसके व्यापक तौर पर निजी क्षेत्रों से संचालित होने की उम्मीद की जाती है, सकल राष्ट्रीय खुशहाली का सबसे महत्वपूर्ण घटक है,” उन्होंने दलील दी।

लेकिन क्या खुशहाली के लिए उठाए कदम सरकार द्वारा निजी क्षेत्र के विकास में अक्षम रहने की अकेली वजह हो सकती है? शायद, श्री जांगपो कहते हैं, जिनका ये भी कहना है कि सकल राष्ट्रीय प्रसन्नता नीति का इस्तेमाल पैसे बनाने की संभावना और आर्थिक विकास की बजाय लोगों के दबाव स्तरों, जीवनशैली और राष्ट्र की संस्कृति और परंपरा पर संभावित प्रभावों पर आधारित कारोबारी प्रस्तावों को तोलने के लिए स्क्रीनिंग टूल हेतु किया गया।

विश्व बैंक का कार्यक्रम, डूइंग बिज़नेस प्रोजेक्ट (कारोबार करने वाली परियोजना) जो 185 अर्थव्यवस्थाओं में कारोबारी नियामकों और उनके कार्यान्वनय के लिए वस्तुनिष्ठ कदम प्रस्तुत करता है, ने इस साल भूटान को कारोबारों के लिए सहज जगह के तौर पर 185 में से 148 नंबर पर रखा है, जो अफगानिस्तान, माली और ईराक से ऊपर है।

वॉल स्ट्रीट जर्नल के लिए विशाल अरोड़ा का राइटअप.

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