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सुख-दुख...

गंगेश भाई माफ करिएगा, आपके संपादक और प्रधान संपादक बहुत छोटे निकले

हम दुनिया की खबर छापते हैं .लेकिन हमारी खबर छापने वाला कोई नहीं है .. .दोस्तों, हिन्दुस्तान अखबार के वरिष्ठ पत्रकार और पटना में चीफ सब एडीटर रहे गंगेश श्रीवास्तव का देवरिया में सडक़ हादसे में निधन हो गया। गंगेश जी इससे पहले दिल्ली में काफी दिनों तक रहे। मैं वर्ष 2005 में उनके सम्पर्क में आया जब मैं हिन्दुस्तान के लखनऊ कार्यालय में था और खबरों के कोआर्डीनेशन में अकसर उनसे बातचीत होती थी। इसके बाद हम लोग फेसबुक पर अकसर हालचाल ले लिया करते थे।

हम दुनिया की खबर छापते हैं .लेकिन हमारी खबर छापने वाला कोई नहीं है .. .दोस्तों, हिन्दुस्तान अखबार के वरिष्ठ पत्रकार और पटना में चीफ सब एडीटर रहे गंगेश श्रीवास्तव का देवरिया में सडक़ हादसे में निधन हो गया। गंगेश जी इससे पहले दिल्ली में काफी दिनों तक रहे। मैं वर्ष 2005 में उनके सम्पर्क में आया जब मैं हिन्दुस्तान के लखनऊ कार्यालय में था और खबरों के कोआर्डीनेशन में अकसर उनसे बातचीत होती थी। इसके बाद हम लोग फेसबुक पर अकसर हालचाल ले लिया करते थे।

वह अकसर कहते कि भाई हम लोग दुनिया भर की खबर छापते हैं और हम लोगों की खबर लेने वाला कोई नहीं। गंगेश भाई आपने सच ही कहा था। अखबार वाले ही अखबार वालों के बारे में नहीं सोचते। आपने न जाने कितनी बार प्रथम पृष्ठ पर सिंगल और डीसी की खबरों के लिए जगह बनाई। बड़ों की जुगाड़ वाली तो विज्ञापनदाताओं को लुभाने वाली खबरों पर अपन आंखें स्क्रीन पर फोड़ी लेकिन अफसोस कि आपकी मौत की खबर को अखबार हिन्दुस्तान ने निर्ममता से दबा दिया। पटना में जहां वह कार्यरत थे वहीं गंगेश जी की खबर नेट एडीशन में पेज वन से गायब थी।

सम्पादक केके उपाध्याय ने पटना पर कलम घिसी पर अपने साथी को श्रध्दांजलि तक नहीं दे पाए। अपने साथियों की मेहनत की बदौलत टिके सम्पादकों की कारस्तानी के चलते विज्ञापनों के ढेर तले खबरों के इस शेर के दुनिया से चले जाने की खबर पेज वन पर किल हो गई। उसे अंदर ही जगह मिली। हिन्दुस्तान के लखनऊ संस्करण में भी गंगेश जी की खबर बहुत अंदर पढऩे को मिली। अपने साथियों के प्रति बेरहमी के कई उदाहरणों से भरे पड़े हैं अखबारी प्रतिष्ठान। कारोबारियों की काली कमाई छुपाते विज्ञापनों से पन्ने रंगीन करने वाले सम्पादकों को अपने ही मेहनतकश साथी का खून गटर का पानी लगता है जिसे वह अंदर के पन्नों पर ठेल देते हैं। पीएम और सीएम को छींक आ जाए या फिर कोई बड़ा आराम फरमाने के लिए अस्पताल में भर्ती हो जाए तो वह पेज वन पर जगह पाता है लेकिन अपने बीच का पत्रकार साथी अचानक चला जाए तो उसके लिए पेज वन पर संक्षिप्त में भी जगह नहीं।

लखनऊ हिन्दुस्तान का तो पुराना इतिहास रहा है। जनवरी 2011 को उसने कई अखबारों में सम्पादक रहे वरिष्ठ पत्रकार घनश्याम पंकज के निधन को एक विज्ञप्ति के माध्यम से अंदर के पृष्ठ पर छापा जबकि उस दौरान पंकज जी के सिखाए पांच वरिष्ठ पत्रकार जो कि लखनऊ हिन्दुस्तान में कार्यकारी सम्पादक सहित कई बड़े पदों पर थे ने भी कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई या कहें अहसान फरामोश निकले। वह दिखाते भी क्यों, पंकज जी सक्रिय पत्रकारिता से बाहर थे और अस्वस्थ चल रहे थे। केरल में उनका अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान के साथ हुआ था लेकिन वह अपने शहर के प्रमुख अखबारों में जगह तक ना पा सके थे। एक सम्पादक नेता अभिनेता या बड़े लेखक पर अपनी कलम चला सकता है पर अपने साथी की मौत पर चार लाइनें भी न तो लिखता है और न ही अखबार में छापने देता है। गंगेश भाई माफ कीजिएगा आप जिन बड़े नामों के साथ काम करने पर इतराते थे वह तो बेहद छोटे निकले। चाहे वह प्रधान सम्पादक हो या फिर स्थानीय सम्पादक। उस पर आपके साथी भी चुप रहे। मैं यह बात दावे के साथ कह सकता हूं कि कोई भी मालिक किसी दूसरे अखबार के साथी की मौत की खबर छापने से मना नहीं करता। मना करने का बहाना सिर्फ और सिर्फ घटिया सम्पादकों और उनके चमचेनुमा पत्रकारों की कुंठाओं की उपज है। दोस्तों, खबरों के खिलाडिय़ों की मौत पर पेज वन पर जगह देने के लिए संघर्ष किया ही जाना चाहिए। यही हमारा साथ छोड़ गए पत्रकार साथियों को हमारी सच्ची श्रध्दांजलि होगी।

वरिष्‍ठ पत्रकार कमलेश श्रीवास्‍तव के फेसबुक वॉल से साभार.

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