नितिन गडकरी की जगह राजनाथ सिंह भाजपा के अध्यक्ष बन गए तो मामला सिर्फ आधा ही हल हुआ। पार्टी के हिसाब से पूरा मामला तब हल होगा, जब भावी प्रधानमंत्री का नाम भी तय हो। अभी अध्यक्ष-परिवर्तन को लेकर जिस तरह की व्याख्याएं सामने आ रही हैं, उनसे तो लगता है कि प्रधानमंत्री के लिए कोई सर्वसम्मत नाम भाजपा चुनाव से पहले तक तय नहीं कर पाएगी। माना जा रहा है कि संघ और भाजपा में गडकरी को लेकर गहरा मतभेद था। अब यह भी कहा जा रहा है कि भाजपा के कुछ नेताओं ने ही सरकार से सांठ-गांठ करवाकर गडकरी के विरुद्ध आरोप जड़वाए।
इस तरह की व्याख्याएं या तो टीवी चैनलों के तत्काल-चिंतन की उपज हैं या कोई दूर की कौड़ी खोज लाने की कोशिश। तथ्य यह है कि गडकरी इस्तीफा देंगे, यह संघ व भाजपा ने लगभग डेढ़ माह पहले ही तय कर लिया था और राजनाथ के नाम पर शीर्ष तीन-चार नेताओं की सहमति भी हो चुकी थी, लेकिन भाजपा कोई प्राइवेट लिमिटेड कंपनी तो है नहीं कि बाप-बेटे या मां-बेटे ने आज कुछ भी तय किया और कल से वह लागू हो गया। एक लोकतांत्रिक पार्टी में यदि बहस-मुबाहिसा हो, मतभेद हों और कल्प-विकल्प हो, तो यह उसके स्वस्थ होने की निशानी है।
जहां तक कुछ भाजपाई नेताओं द्वारा गडकरी को फंसाने का सवाल है, तो यह तर्क भी गले नहीं उतरता। गडकरी को फंसाकर उन्हें क्या मिला? जिन भाजपाइयों के प्रति यह शंका व्यक्त की जा रही है, वे अध्यक्ष की गिनती में दूर-दूर तक कहीं नहीं थे। राजनाथ सिंह पर कोई शक कर सकता है क्या? हां, कांग्रेस ने यदि गडकरी को हटवाने के लिए कोई विशेष पहल की है, तो यह उसकी गंभीर भूल है, क्योंकि गडकरी के बने रहने में ही उसका फायदा था। गडकरी के विरुद्ध चाहे एक भी आरोप सिद्ध नहीं होता, कोरा दुष्प्रचार ही कांग्रेस और भाजपा को एक ही पायदान पर बिठा देता। दोनों भ्रष्ट हैं, यह आम सहमति बन जाती। अब राजनाथ जैसे स्वच्छ छवि के विनम्र नेता से कांग्रेस को खतरा ही खतरा है। वे अपनी पार्टी के दिग्गजों को एकसूत्र में बांधे रखने की कला में पहले ही निष्णात हो चुके हैं और मीडिया से मुखातिब होने में भी पारंगत हैं। गडकरी के हटने का कारण न भाजपा की गुटबाजी है और न ही कांग्रेस की कोशिश। वह कारण है, देश में पनपा भ्रष्टाचार-विरोधी माहौल। आज किसी पर भ्रष्टाचार का शक हुआ नहीं कि वह मारा गया।
यही वह कारण है, जिसके रहते देश में मोदी की मांग बढ़ गई है। मोदी को गुजरात की उल्लेखनीय आर्थिक प्रगति का श्रेय दिया जाता है, लेकिन उन पर भ्रष्टाचार का आरोप उनके धुर-निंदक भी नहीं लगाते। इस दृष्टि से मोदी जैसे कई अन्य मुख्यमंत्री भी उपलब्ध हैं, लेकिन मोदी की एक और भी खूबी है। उनकी ऐसी छवि, जो आप भारत के करोड़ों लोग किसी भी प्रधानमंत्री में देखना चाहते हैं। वह है, दृढ़ और दबंग नेता की छवि। मोदी ने गुजरात में भाजपा-विरोधियों को ही नहीं, भाजपा में अपने विरोधियों को भी धूल चटा दी। आज कांग्रेस की बड़ी दुर्दशा है। उसके प्रधानमंत्री के कर्मों और अकर्मों ने पार्टी की प्रतिष्ठा को पेंदे में बिठा दिया है। इस समय कांग्रेस और भाजपा, दोनों को ही एक तेजस्वी प्रधानमंत्री की जरूरत है। यह देश की भी जरूरत बन गई है।
इस जरूरत को नरेंद्र मोदी पूरा करते दिखाई पड़ रहे हैं। भारत के पूंजीपति और प्रतिष्ठित अभिनेता ही मोदी से मुदित नहीं हैं, विदेशी राजदूत व विदेशी सरकारें भी मोदी के लिए पलक पांवड़े बिछाने के लिए तैयार हैं। उनकी चीन-यात्रा के समय उन्हें वैसा सम्मान दिया गया, जैसा किसी प्रधानमंत्री को दिया जाता है। विदेशी सरकारों के पास प्राय: एक तीसरी आंख भी होती है, जिसका काम यही होता है कि वह भावी प्रधानमंत्री की तलाश करे। मोदी के तीसरे सत्तारोहण ने विदेशियों की इस तीसरी आंख में रोशनी भर दी है। लेकिन अपनी पार्टी और अपने देश में मोदी का मार्ग अभी कंटकाकीर्ण ही दिखाई पड़ता है।
गडकरी अध्यक्ष नहीं रहे और मोदी व राजनाथ का स्नेह-मिलन हो गया, यह मोदी के लिए अच्छी खबर है। लेकिन यह अभी भी आधा ही हल है। मोदी का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए घोषित हो, यह शेष समाधान है। लेकिन इस समाधान के मार्ग में कई रोड़े हैं। पहली बात तो यही कि जब तक सारे शीर्ष नेता सहमत न हों, यह घोषणा कैसे हो? अभी तक तो आडवाणीजी ने ही यह घोषणा नहीं की कि वे प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नहीं हैं। वे सबसे योग्य, अनुभवी और गंभीर दावेदार हैं। लगभग इसी श्रेणी में सुषमा स्वराज हैं। भाजपा में अभी लगभग आधा दर्जन नेता ऐसे हैं, जिनके सीने में एक प्रधानमंत्री धड़क रहा है। इसके बावजूद हर नेता समझ रहा है कि 543 में से 250 सीटें जिता लाने की क्षमता उसमें नहीं है। मोदी में यह क्षमता सबको दिखाई दे रही है।
क्या मोदी का नाम घोषित कर देने भर से भाजपा 250 सीटें जीत सकती है? हां, मोदी के नाम में जादू है, लेकिन यह गुलाब कांटों से घिरा है। डर है कि अल्पसंख्यकों के थोक वोट कांग्रेस ले जाएगी। लेकिन न भूलें कि उन वोटों पर प्रांतीय नेताओं का कब्जा है और यह संभावना भी कमजोर नहीं कि अल्पसंख्यक ध्रुवीकरण की टक्कर में बहुसंख्यक ध्रुवीकरण भी जोर से हो सकता है। जहां तक गठबंधन के घटकों का सवाल है, तो सभी सत्ताप्रेमी हैं। कोई भी सिद्धांतप्रेमी नहीं। सत्ता का ताज सिर पर पहनने के लिए वे तथाकथित सेक्युलरिज्म के जूते बाहर उतारने पर राजी क्यों नहीं होंगे? जब भाजपा ने खुद मंदिर, कश्मीर और समान नागरिक-संहिता जैसे मुद्दे ताक पर रख दिए, तो छोटी-मोटी प्रांतीय पार्टियों के क्या कहने!
भाजपा मोदी का नाम घोषित कर देती है, तो उसे अगले चुनाव में बढ़त जरूर मिलेगी, लेकिन अगर वह अपने दम पर चुनाव जीतना या गठबंधन सरकार बनाना चाहती है तो उसे मोदी के शरीर में अटलजी की आत्मा का प्रवेश करवाना होगा। मोदी अटलजी की तरह संघातीत (संघ से आगे) तो पहले ही हो चुके हैं, अब उन्हें गुजरातातीत होने की भी जरूरत है। अखिल भारतीय दृष्टि और सर्वसमावेशी चित्त के बिना भारत का कोई प्रधानमंत्री सफल नहीं हो सकता।
लेखक डा. वेद प्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं.






