राजस्थान सरकार का सूचना और जनसंपर्क विभाग बेचारा पत्रकारों के अधिस्वीकरण के नियम और कायदे निर्धारित करता है और मुख्य मंत्री का कार्यालय इन नियम कायदों की धज्जियां उड़ाता है. दूसरा कार्यकाल संभालते ही गहलोत सरकार ने राज्य में पहली बार वर्ष 2009 में तीन ऐसे फोटो-पत्रकारों को “विशिष्ट प्रकरण” मान कर अधिस्वीकरण किया वो भी स्वतंत्र फोटो पत्रकार के रूप में और उसके बाद ये “एहसान” अब 2012 तक किसी अन्य पर नहीं किया गया.
सूचना के अधिकार के बावत मांगी सूचना के अनुसार (क्र./प्रस्था/सू.अ./40/2012/7439/7-5-12/सू.ज.सं विभाग/राजस्थान सरकार) स्वतंत्र फोटो-पत्रकार के लिये कम से कम 25 वर्ष का अनुभव, न्यूनतम आयु 45 वर्ष और न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता “सीनियर सेकेंडरी अथवा समकक्ष परीक्षा उतीर्ण होना आवश्यक है. विजय दिवाकर द्वारा मांगी गयी आरटीआई सूचना के अनुसार मुख्यमंत्री ने विशिष्ट प्रकरण मानते हुए, एक ऐसे फोटो-पत्रकार रोहित जैन पारस को स्वतंत्र पत्रकार का अधिस्वीकरण 2009 में दे दिया जब वो 33 वर्ष का था और वह सीनियर सेकेंडरी भी फेल है. आजीविका पत्रकारिता पर आश्रित होना भी आवश्यक है, पर चूंकि वे फोटो स्टूडियो भी चलाते हैं, इसलिये मुख्यमंत्री कार्यालय ने ये प्रमाण-पत्र भी मांगना आवश्यक नहीं समझा. आवेदक के आचरण के संबंध में जिला मजिस्ट्रेट का सत्यापन भी आवश्यक होता है, मगर इसकी चिंता भी सीएमओ ने नहीं की. दिलचस्प बात ये है कि प्रार्थी के पास केवल जिले स्तर के पेपर्स में एक-दो फोटो देने का ही 12 साल का ही अनुभव बताया गया है. यानी वह 20 साल की उम्र से कथित फोटो-जर्नलिस्ट है.
आखिर सीएमओ ने ये अनुकंपा इस पर क्यों दिखाई? ऐसी क्या मजबूरी थी जो तीन जनों रोहित जैन पारस (दो अन्य महेश आचार्य, उत्तम कुमार जोशी की सूचना उपलब्ध नहीं हुई) को अधिस्वीकरण का कानूनी अधिकार दे दिया. जिसके तहत रोहित जेडीए की एक नयी सरकारी योजना में एक भूखंड प्राप्ति की चयन सूची में आ गया है, जबकि एक जेडीए प्लाट पत्रकार कोटे में इसके पिता के पास भी है, जिसमें ये रह रहे हैं. कम से कम दस ऐसे फोटो जर्नलिस्ट होंगे जो वर्षों से अधिस्वीकरण के लिये हर साल आवेदन करते हैं. मगर मुख्यमंत्री के पत्रकार सलाहकार मंडली से ये जेन्युइन फोटो-पत्रकार दूर हैं. रोहित कुछ ऐसे प्रिंट पत्रकारों को ओब्लाईज्ड करता है जो मुख्यमंत्री के सलाहकार मंडल में हैं और जिनकी एप्रोच पर बिना कानूनी पेचिदिगियां देखे मुख्यमंत्री ने इन्हें विशिष्ट प्रकरण मानकर अधिस्वीकरण की फाईल पर मोहर लगा दी. रोहित के बायोडाटा के अनुसार वे कम से कम एक दर्जन पत्रों के लिये, जिनमें द हिंदू, पीटीआई, टेलीग्राफ में वे फ्रीलांसिग करते हैं. ताज्जुब ये कि इन संस्थाओं ने ऐसी एक भी चिट्ठी नहीं दी जो सू.ज.सं विभाग अपने उपरोक्त पत्र में जवाब में लगा सकता. सादे आवेदन पर बिना किसी राजपत्रित अधिकारी के एटेस्टेड के मुख्यमंत्री के सलाहाकार मंडल से रेवड़ी मिल जाना राजस्थान में अनूठी मिसाल और गैर कानूनी अपवाद है.





