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गाजियाबाद से ‘पीपुल टुडे’ अखबार लांच, आलोक मेहता ने किया विमोचन

गाजियाबाद से खबर है कि शहर में एक और अखबार ने दस्तक दे दी है। नाम है 'पीपुल टूडे'। फिलहाल यह साप्ताहिक अखबार है। अखबार का विमोचन हो गया। शीघ्र ही यह अखबार दैनिक के रूप में गाजियाबाद से प्रकाशित होगा। विमोचन किया आलोक मेहता ने। ट्रांसपेरेंसी ग्रुप के डायरेक्टर रवि अरोड़ा ने अखबार की पृष्ठभूमि और आगामी योजनाओं की जानकारी दी। इस मौके पर वरिष्ठ पत्रकार इंदु शेखावत, कुलदीप तलवार, तेलूराम कांबोज, कमल सेखरी, राकेश पाराशर, राज कौशिक, सलामत मियां, अजय औदिच्य, गौरव त्यागी, सत्यपाल चौधरी, पूर्व विधायक रूप चौधरी, गौरव त्यागी आदि ने विचार रखे।

गाजियाबाद से खबर है कि शहर में एक और अखबार ने दस्तक दे दी है। नाम है 'पीपुल टूडे'। फिलहाल यह साप्ताहिक अखबार है। अखबार का विमोचन हो गया। शीघ्र ही यह अखबार दैनिक के रूप में गाजियाबाद से प्रकाशित होगा। विमोचन किया आलोक मेहता ने। ट्रांसपेरेंसी ग्रुप के डायरेक्टर रवि अरोड़ा ने अखबार की पृष्ठभूमि और आगामी योजनाओं की जानकारी दी। इस मौके पर वरिष्ठ पत्रकार इंदु शेखावत, कुलदीप तलवार, तेलूराम कांबोज, कमल सेखरी, राकेश पाराशर, राज कौशिक, सलामत मियां, अजय औदिच्य, गौरव त्यागी, सत्यपाल चौधरी, पूर्व विधायक रूप चौधरी, गौरव त्यागी आदि ने विचार रखे।

साप्ताहिक अखबार पीपुल टुडे के विमोचन समारोह में वरिष्ठ पत्रकार राज कौशिक ने कहा कि लोगों को मीडिया से शिकायत तो होती है मगर वो शिकायत करें किससे। मीडिया के लोगों को बहुत कुछ सोचना चाहिए। राज कौशिक ने शुरू में ही डा. बशीर बद्र का यह शेर सुनाकर उन्होंने संकेत कर दिए कि पत्रकारिता पर बाजारवाद किस कदर हावी हो चुका है…

मुझसे क्या बात लिखवानी है जो मेरे लिए,
कभी सोने, कभी चांदी के कलम लाए जाते हैं…

रवि अरोड़ा ने अपने भाषण में बताया कि वो डा.आलोक मेहता के साथ 1995 से जुड़े हैं। इस पर अपने भाषण में राज कौशिक जी ने कहा कि यह बहुत महत्वपूर्ण बात है मगर इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि डा.आलोक मेहता भी आपके साथ 1995 से जुड़े हुए हैं। रवि अरोड़ा जी और पीपुल टुडे के लिए कौशिक जी द्वारा सुनाए गए इस शेर ने लोगों को जमकर तालियां बजाने पर मजबूर कर दिया..

परों को खोल, जमाना उड़ान देखता है
जमीन पर बैठकर क्या आसमान देखता है…

राज कौशिक जी द्वारा यह कहना कि चुनाव के समय तो पत्रकारों को भूखे भेड़ियों की तरह शिकार के लिए छोड़ दिया जाता है, एक श्रमजीवी पत्रकार की पीड़ा को दर्शाता है। लोगों ने इस पर भी खूब तालियां बजाईं। अंत में उनके द्वारा मीडिया के लोगों को संदेश के तौर पर सुनाए गए अंदाज देहलवी के ये शेर तो कार्यक्रम की जान ही बन गए…

वो एक जख्मी परिंदा है, वार मत करना
पनाह मांग रहा है, शिकार मत करना
इरादा सामने वाला बदल भी सकता है
मुकाबला ही सही, पहले वार मत करना…

वरिष्ठ पत्रकार इंदु शेखावत की रिपोर्ट.

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