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गिरोहबाजों की राजनीति में माया खराब तो अच्छा कौन?

: बेहाल किसान युवा हलकान : कौन सी राजनीतिक पार्टी मैदान मार लेगी और कितने गिरोह मिलकर सरकार को ‘हांकने’ का काम करेंगे, इस पर सूबे की जनता की कोई दिलचस्पी नहीं रह गई है। नोएडा से लेकर पूर्वांचल के गोरखपुर तक के दर्जनों शहरों और गांवों के जनमानस को देखकर ऐसा कहा जा सकता है कि चुनाव के प्रति लोगों के मन में उत्साह नहीं है। गिरोहबाज नेताओं की धमाचौकड़ी, नेताओं के बड़े-बड़े वादों और गिरगिट की तरह बदलते उनके रंगों को देखकर सूबे की जनता हतप्रभ है। चुनाव के इस झमाझम माहौल में पानी की तरह बहते धन से भले ही कुछ पार्टी समर्थित लोगों के घर-परिवार, बाल-बच्चों की मुरादें पूरी हो रही हों, लेकिन भीतर ही भीतर एक उबाल सा दिख रहा है।

: बेहाल किसान युवा हलकान : कौन सी राजनीतिक पार्टी मैदान मार लेगी और कितने गिरोह मिलकर सरकार को ‘हांकने’ का काम करेंगे, इस पर सूबे की जनता की कोई दिलचस्पी नहीं रह गई है। नोएडा से लेकर पूर्वांचल के गोरखपुर तक के दर्जनों शहरों और गांवों के जनमानस को देखकर ऐसा कहा जा सकता है कि चुनाव के प्रति लोगों के मन में उत्साह नहीं है। गिरोहबाज नेताओं की धमाचौकड़ी, नेताओं के बड़े-बड़े वादों और गिरगिट की तरह बदलते उनके रंगों को देखकर सूबे की जनता हतप्रभ है। चुनाव के इस झमाझम माहौल में पानी की तरह बहते धन से भले ही कुछ पार्टी समर्थित लोगों के घर-परिवार, बाल-बच्चों की मुरादें पूरी हो रही हों, लेकिन भीतर ही भीतर एक उबाल सा दिख रहा है।

बसपा की माया सरकार को आप जितनी भी गाली दें, राजनीति के अखाड़े में उतरे तमाम दलों की पृष्ठभूमि को भी कोई बेहतर बताने को तैयार नहीं है। इस पूरे चुनावी खेल में दो समुदाय किसान और नौजवान मूक दर्शक हैं, जिन्हें रिझाने का ‘राजनीतिक खेल’ चल रहा है।

पिछले 20 सालों में तमाम सियासी दलों ने इस सूबे को क्षत-विक्षत कर रखा है। संसद से लेकर विधानसभा में जात-पात खत्म करने के नाम पर चाहे जितनी बहसें हुई हों, लेकिन यहां तो जाति ही सिर चढ़कर बोल रही है। जाति-पाति, घपले-घोटाले, लूट-खसोट और बढ़ते अपराधों के मनोविज्ञान और समाजशास्त्र पर आंकड़ों की बाजीगरी कोई कितनी भी कर ले, सबसे बड़ा सवाल यहां रोजगार का अकाल और बेहाल किसान का है। चुनाव से पहले अन्ना इफैक्ट, घोटाले, राज्य का बंटवारा, मुस्लिम राजनीति, दलित प्रेम, राष्ट्रवाद, सांप्रदायिकता और महंगाई जैसे मुद्दे लोगों की जुबान पर तैर रहे थे, लेकिन अब ऐसा कुछ भी नहीं है। गौर करके देखिए, तमाम दलों के नेताओं ने जनता और युवाओं की चुप्पी को जानकर दो ही मुद्दों पर अपने को केंद्रित कर रखा है।

पूर्वांचल में किसानों की दयनीय स्थिति और पूरे सूबे में रोजगार का अकाल। यही दो मुद्दे हैं, जो किसी भी राजनीतिक दल को पसीना छुड़ा रहे हैं और यही वह सवाल हैं, जिसके सही जवाब मिलने पर यह भीड़तंत्र उसे अपनी हिफाजत की बागडोर देने को उद्दत हो सकता है। सबसे पहले उत्तर प्रदेश में रोजगार और बेरोजगारी पर एक-एक नजर। सूबे में कुल वोटरों की आबादी 12.58 करोड़ है। इस आबादी में 18-19 साल के युवाओं की संख्या 55 लाख है। 20-29 साल के वोटरों की आबादी 3.51 करोड़ है, जबकि 30-39 साल के 3.4 करोड़ युवा मतदाता सभी दलों के निशाने पर हैं। इन युवाओं में सभी जाति, धर्म के लोग शामिल हैं और इस दफा यह युवा अपने वोट की कीमत वसूलने के मूड में हैं।

सूबे के युवाओं के सामने समस्याएं तो बहुत हैं, लेकिन शिक्षा में सुधार, रोजगार सृजन, युवाओं के हाथ में राजनीतिक बागडोर, भ्रष्टाचार का खात्मा और आधारभूत संरचनाओं का उन्नत विकास को लेकर वह ज्यादा संजीदा हैं। प्रदेश की साक्षरता 75 फीसदी है। पिछले पांच सालों में सूबे में तकनीकी शिक्षा का दायरा बढ़ा है। आप कह सकते हैं कि बसपा की मायावती सरकार चाहे जितनी भी भ्रष्टाचार के आकंठ में डूबी है, तकनीकी शिक्षा के मामले में उसने बेहतर काम किया है। पिछले पांच सालों में पूरे सूबे में 712 तकनीकी कॉलेज खुले। इन कॉलेजों से हर साल 1.32 लाख बीटेक स्नातक निकल रहे हैं। 36 हजार से ज्यादा प्रबंधन स्नातक इस सूबे से निकल रहे हैं। मायावती की देखरेख में एक दर्जन से ज्यादा निजी विश्वविद्यालय खोले गए, जहां से हर साल तीन लाख से ज्यादा बच्चे निकल रहे हैं। इसके अलावा दर्जन भर मेडिकल कॉलेज और उनसे निकलने वाले स्नातक अलग से।

यह पांच सालों के बीच की कहानी है, लेकिन डिग्री लेकर बाहर निकल रहे इन युवाओं के लिए रोजगार कहीं नहीं है। खेत-खलिहान, गहने-जेवर बेचकर पढ़ाई करने वाले स्नातकों और उनके अभिभावकों के सामने बेरोजगारी की यह समस्या किसी दंश से कम नहीं है। पिछले पांच सालों में केवल तकनीकी कॉलेजों से निकले छात्रों व युवाओं पर ध्यान केंद्रित करें, तो 12 लाख से ज्यादा बेरोजगारों की ऐसी फौज खड़ी हो गई है, जो किसी भी सरकार के लिए किसी फांस से कम नहीं है। युवा और उनके अभिभावकों के लिए ‘सब कुछ लुट गया’ का दंश चाहे जो भी हो, राजनीति के सामने यह अब सबसे बड़ी चुनौती है। जनता का मूड और युवाओं को अपनी ओर रिझाने के लिए तमाम दलों के नेता वादों के सब्जबाग दिखाने में लगे हुए हैं, लेकिन युवाओं को ऐसे मगरमच्छों से उम्मीद नहीं है।

आपको बता दें कि प्रदेश में चुनाव लड़ रहीं तमाम राजनीतिक दल या गिरोह युवाओं की समस्या और रोजगार के सृजन को लेकर बड़ी-बड़ी बाते कर रहे हैं, लेकिन कोई भी दल या गिरोह रोजगार सृजन का सही ब्लू प्रिंट पेश नहीं कर रहा है। ‘हमवतन’ ने इस चुनावी महासमर में उतरे कुछ चर्चित चेहरों से रोजगार का अकाल और युवा वोटरों की समस्या पर बात करने की कोशिश की।

आइए, जानते हैं उन चेहरों के बयान। बसपा के एक प्रवक्ता कहते हैं कि सबसे पहले हमारी पार्टी में बहन जी से पूछे बगैर कोई कुछ नहीं बोलता। यह निर्देश है। आप चाहें जिस लोकतंत्र की बात कर लें, यहां का लोकतंत्र चुप्पी साधने का है। इस प्रवक्ता ने कहा कि हमारी सरकार ने पिछले पांच सालों में सबसे ज्यादा रोजगार के अवसर प्रदान किए हैं और आने वाले सालों में हम सभी बेरोजगारों को रोजगार दे देंगे। कैसे देंगे, कहां देंगे, इस पर फैसला मायावती जी को करना है। आप इसका आशय जो भी लगा लें, एक पंक्ति में इस पूरे बयान को आप ठगी से ज्यादा कुछ नहीं कह सकते।

उधर, सपा के अखिलेश यादव युवाओं की समस्याओं को अपने हर मंच पर उठाने से नहीं चूक रहे। अखिलेश यादव कहते हैं ‘हमारी पार्टी ने 40 फीसदी टिकट युवाओं को दिया है। बेरोजगारी भत्ता और कन्या विद्या धन की राशि बढ़ाने की हमने बात की है और सरकार बनने के बाद सबसे पहला काम रोजगार का सृजन करना ही है।’ मुलायम सिंह के इस तेज-तर्रार बेटे के सामने भी रोजगार सृजन करने का कोई ‘मॉडल’ नहीं है। आप कह सकते हैं कि सपा को सबसे पहले गद्दी चाहिए, उसके बाद ‘सब कुछ ठीक हो जाएगा’ जैसे जुमले पर यकीन करें। सपा के शासनकाल में भी युवाओं की गति क्या थी, किसी से छुपा नहीं है। युवा नौकरी तो नहीं कर सके लंठई, गुंडई के दम पर रोजी-रोटी चलाते रहे। आज इस लंठई और गुंडई को सामने लाने का प्रयास कांग्रेस के राहुल गांधी कर रहे हैं। राहुल गांधी प्रदेश में एक युवा मॉडल तो बन रहे हैं, लेकिन युवाओं की सबसे बड़ी भीड़ अखिलेश यादव के संग है।

अगर कांग्रेस की सरकार बन जाती है, तो कांग्रेस के सामने रोजगार के क्या मॉडल हैं? जवाब देती हैं प्रदेश अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी कहती हैं, ‘हमारी सरकार पिछले 22 सालों से यहां नहीं है। हम प्रदेश और यहां के युवाओं की परेशानी को केंद्र में रखकर खाका तैयार कर रहे हैं। रोजगार और शिक्षा पर ही हमारा जोर है। हम आधारभूत संरचनाओं का विकास करेंगे और युवाओं को स्वावलंबी बनाएंगे।’

भाजपा के कलराज मिश्र युवाओं की समस्या को लेकर खासे चिंतित हैं। यह चिंता आज क्यों है, आप समझ सकते हैं, लेकिन इतना तय है कि युवाओं के रोजगार के नाम पर भाजपा की झोली में भी वादों के अलावा कुछ नहीं है। कलराज मिश्र कहते हैं, ‘हमारी पार्टी ने 162 नौजवानों को टिकट दिया है। हम सरकार में आते हैं, तो एक करोड़ लोगों के लिए रोजगार का सृजन करेंगे। गांवों में ई-गर्वनेस के जरिए लाखों युवाओं को रोजगार से जोड़ा जाएगा।’ भाजपा मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, हिमाचल, गुजरात, पंजाब, कर्नाटक और अन्य राज्यों में कितने युवाओं को रोजगार देने में सफल रही है, उसका आंकड़ा सबके सामने है।

मायावती ने प्रदेश को चार हिस्सों में बांटने की राजनीति चाहे जिस मकसद से की हो, लेकिन इतना तय मानिए कि प्रदेश की राजनीति ने प्रदेश के लोगों की सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक और मानसिक हालात को कमजोर कर दिया है। चाहे आप पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गांवों में चले जाएं या फिर बुंदेलखंड के जर्जर और बिलखते गांवों में।

चाहें आप अवध क्षेत्रों को घूमें या फिर दरिद्रता, पलायन, बाढ़ से अभिशप्त, बेरोजगारी की वजह से अपराध में लिप्त पूर्वांचल के गांवों पर दस्तक दें, बेहतर कहने के लिए आपके पास कुछ नहीं बचेगा। गांवों की तस्वीर ‘शिखंडी राजनीति’ ने ऐसी कर दी है कि उसकी अस्मिता ही संकट में फंसी है। गांवों का विकास चाहे न हुआ हो, वहां लोकतंत्र पहुंच गया है। हर घर के ऊपर पार्टियों के लटकते झंडे, कीचड़ भरे गांवों में चमचमाती गाड़ियों की रेलमपेल, पार्टियों के पोस्टर, बैनर और उनके कार्यकर्ताओं को देखकर लोकतंत्र ताजा हो रहा है।

गोरखपुर में इस संवाददाता की मुलाकात पीयूसीएल के जिलाध्यक्ष फतेह बहादुर सिंह से हुई। कहने लगे ‘अब तक जो भी सरकार बनी है, उससे बेहतर सरकार की कल्पना तो हम नहीं कर सकते। जब कुछ करना ही नहीं है, तो किसी की सरकार बने, क्या अंतर है? पूर्वांचल का हाल आज किसी श्मशान से कम नहीं है। सभी उद्योग-धंधे समाप्त हैं। खेती बर्बाद है। किसान पलायन कर रहे हैं और युवा परेशान होकर आपराधिक गतिविधियों में लिप्त हैं। यह किसे मालूम नहीं है, लेकिन चुनाव है, तो सभी दल हल्ला मचा रहे हैं।’

27 जिलों में बंटे पूर्वांचल से 146 विधायक चुने जाते हैं। इस बार भी इतने ही विधायक चुने जाएंगे, लेकिन कोई विधायक या कोई भी सरकार यहां कुछ कर पाएगी, कहना असंभव है। गोरखपुर विश्वविद्यालय के प्रख्यात विद्वान और मनोवैज्ञानिक डॉ. एके सक्सेना कहते हैं कि ‘सब कुछ’ लुट चुका है। राजनीति ने समाज को बर्बाद कर दिया है।

चुनाव से पहले मुद्दे कुछ और होते हैं और चुनाव जाति पर आधारित हो जाते हैं। इसे लोकतंत्र की जीत कहें या हार समझ से परे है। चुनाव से पहले पूर्वांचल मुद्दा था, अब नहीं है। सूखा, बाढ़, बेकारी, भ्रष्टाचार, अपराध मुद्दा था, अब नहीं है। जब पूरे मतदाता ही धर्म, जाति, संप्रदाय में शामिल हैं, तो फिर विकास का नारा बेकार है। यहां तो दलों के दलदल में हम जीने को अभिशप्त हैं।’

चुनाव के इस पूरे खेल में राजनीति का बाजीगर चाहे जो भी निकले, लखनऊ की सत्ता चाहे जिसके हाथ लगे, कौन सी पार्टी किसके साथ गठबंधन करेगी, उसका भविष्य चाहे जो भी हो, किसी भी पार्टी के पास रोजगार का मॉडल नहीं है। भाई-भतीजावाद, जातिवाद, धर्मवाद और पिछड़ेवाद का नारा देकर चाहे जो भी सरकार बना ले, लेकिन इतना तय है कि सूबे में रोजगार का अकाल आने वाली किसी भी सरकार के लिए खतरनाक साबित होगा।

वरिष्ठ पत्रकार अखिलेश अखिल का यह लिखा हमवतन अखबार में प्रकाशित हुआ है. वहीं से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.

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