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गुंजन, जिन्‍हें बुरा लगता है उनसे कह दो नवभारत टाइम्‍स पढ़ना छोड़ दें

नवभारत टाइम्स पटना में प्रख्यात उपन्यासकार हिमांशु श्रीवास्तव हर हफ्ते अपने संस्मरण लिखा करते थे। मैं प्रादेशिक और सम्पादकीय पेजों का प्रभारी था। कुछ साहित्यकारों ने मुझसे कहा कि हिमांशु जी अपने हर कालम में अपनी तारीफ़ किसी न किसी बड़े साहित्यकार के मुंह से करा देते हैं – यह अच्छा नहीं लगता। इन साहित्यकारों ने कुछ उदाहरण भी दिखाए। मुझे लगा शिकायत वाजिब है। कुछ ऐसे अंशों को मैने सम्पादक श्री अरुण रंजन को दिखा कर उनका निर्देश माँगा।

नवभारत टाइम्स पटना में प्रख्यात उपन्यासकार हिमांशु श्रीवास्तव हर हफ्ते अपने संस्मरण लिखा करते थे। मैं प्रादेशिक और सम्पादकीय पेजों का प्रभारी था। कुछ साहित्यकारों ने मुझसे कहा कि हिमांशु जी अपने हर कालम में अपनी तारीफ़ किसी न किसी बड़े साहित्यकार के मुंह से करा देते हैं – यह अच्छा नहीं लगता। इन साहित्यकारों ने कुछ उदाहरण भी दिखाए। मुझे लगा शिकायत वाजिब है। कुछ ऐसे अंशों को मैने सम्पादक श्री अरुण रंजन को दिखा कर उनका निर्देश माँगा।

अरुण रंजन जी ने वे हिस्से सरसरी निगाह से देखे और मुझसे बोले कि कवियों, विद्वानों और होमियोपैथी के डाक्टरों को बुढ़ापे में अपनी तारीफ करने की बीमारी हो जाती है। क्या करोगे! जहाँ जहाँ ऐसे वाक्य हों, उनको काट कर छाप देना। फिर उन्होंने मुझसे पूछा कि हिमांशु जी के घर कभी गए हो कि नहीं? मैंने जब कहा – नहीं, तो बोले एक दिन तुम को लेकर चलूँगा उनके यहाँ। उधर पटना सिटी जाने वाली रोड में एक गन्दी सी गली है। गली में कुछ आगे जाओगे तो ऐसे ऐसे एक दरवाजा मिलेगा। वह सीधे उनके कमरे में ही खुलता है। ख़ट खटाओगे तो वह बूढ़ा खुद ही दरवाजा खोलेगा। भीतर जाओगे गुंजन तो देखोगे कि बस वही एक कमरे का घर है। एक कोने में चौकी है, ईंटों पर रखी हुई। चौकी के नीचे घर का साज सामान, राशन पानी के डिब्बे रखे हैं। दूसरे कोने में देखोगे कि बुढ़िया बैठ कर बर्तन मांज रही है।

तीसरे कोने में अँधेरी सी जगह में एक टेबुल है और वहीँ कुर्सी पर बैठ कर बुड्ढा लिखता रहता है। इसी अँधेरे बंद कमरे से पिछले साठ साल से! इस बीच दुनिया कहाँ से कहाँ चली गई। हमलोग गाड़ी फ़्लैट, शेयर, प्रोमोशन लेते रहे और वह वहीँ बैठ कर लिखता रहा। बुढ़िया भी कितना बोली होगी राशन पानी के लिए। लड़का गरियाता होगा कि हमलोगों के लिए कुछ नहीं किया। लेकिन सब झेल कर वह लिखता रहा। समाज के लिए। लोगों के लिए। एक फटा कुरता खूंटी पर – एक चप्पल पैरों में, बस – यही है उसके पास। अपना पूरा जीवन उस आदमी ने साहित्य और समाज के लिए दे दिया। पूरा जीवन! मैं कहता हूँ गुंजन, उस आदमी को पूरा हक़ है कि वह लाउड स्पीकर लगा कर कहे कि हाँ मैं महान हूँ। मैंने समाज के लिए अपनी जिन्दगी दी है।

और सुनो गुंजन! जब तक मैं सम्पादक हूँ, हिमांशु जी का लिखा जस के तस छपेगा। खबरदार! तुम उनके कालम में से एक कौमा फुल स्टॉप भी नहीं काटोगे। जिन साहित्यकारों को उनकी तारीफ़ बुरी लगती है, उनसे कह दो, नवभारत टाइम्स पढ़ना बंद कर दें क्योंकि जब तक मैं यहाँ हूँ, हिमांशु श्रीवास्तव और मथुरा प्रसाद नवीन छपेंगे और उन दोनों को हजार रुपए महीने का चेक जाता रहेगा। इसलिए नहीं कि कोई उनको पढ़ेगा, इसलिए कि समाज और साहित्य पर इन जैसे लोगों का जो कर्ज है मैं उसके सूद का एक हिस्सा चुका रहा हूँ। जाओ और दुबारा कभी इस बारे में मुझसे कुछ भी मत कहना।

वरिष्‍ठ पत्रकार गुंजन सिन्‍हा के फेसबुक वॉल से साभार.

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