वर्धा। वर्तमान में मीडिया की अंतर्वस्तु से मैं बहुत निराश हूँ जो कुछ आप पढ़ रहे हैं, देख रहे हैं वह विश्वनीय नहीं है। बाजारवाद के प्रभाव में पत्रकारिता का जो दौर चल रहा है उसमें आज गुरिल्ला पत्रकारिता का जमाना है। प्रतिरोधी चेतना हममें जीवित रहनी चाहिए, आप छोटे-छोटे अखबार निकालिए उसे गांव के पंचायत भवन, या सार्वजनिक स्थलों पर लगाइए, कैंटीन की दीवार पर लगाकर लोगों को चेतस करने की जरूरत है। पत्रकारों को पद, यश और धन तीनों से बचने की जरूरत है। पत्रकारों को अपना एक सहकारी या सामूहिक उद्यम बनाकर अखबार या चैनल (मूल्य आधारित अंतर्वस्तु प्रसारित करने के लिए) शुरू करनी चाहिए, जिससे कारपोरेट हाऊस द्वारा संचालित मीडिया से मुकाबला की जा सके। वर्गीज कुरियन ने अमूल जैसा सहकारी उद्यम बनाकर सहकारिता के क्षेत्र में आमूल-चूल परिवर्तन ला दिया। हमें परिवर्तनगामी प्रवृति से वैकल्पिक पत्रकारिता के बारे में सोचने की जरूरत है।
उक्त बातें करीब पांच दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सकि्रय देशबन्धु पत्र समूह के प्रधान संपादक ललित सुरजन ने कही। वे महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में बतौर अतिथि वक्ता के रूप में आए थे। उनसे हुई बातचीत में उन्होंने बताया कि वैश्विक ग्राम की आड़ में अपने बाजार का विस्तार करने के लिए पूंजीपति मीडिया का इस्तेमाल करते हैं। आज आप देखेंगे कि मीडिया की नकेल किनके हाथों में है। जब तक मालिकाना हक पत्रकारों के हाथ में नहीं होगा, तब तक मीडिया की विश्वनीयता पर सवाल उठता रहेगा। इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में सूचना एवं प्रसारण मंत्री नंदिनी शतपथी ने डिवोल्यूशन ऑफ ऑनरशिप की बात की थी, जिसे कि अब तक कि्रयान्वित नहीं किया जा सका है। जनतांत्रिक सरकार को इस ओर कदम बढ़ाने की जरूरत है। सरकार समानान्तर फिल्मों के लिए मदद करती हैं तो पत्रकारों के हित के लिए क्यों नहीं।
विश्वविद्यालय में अति तीव्र गति से हुए विकास कार्य को देखते उन्होंने कहा कि किसी संस्थान के बाह्य विकास के साथ उसके भीतरी स्वरूप की संपन्नता ही वास्तविक मूल्य रखती है। आज गांधी का विचार यानी गांधी के जीवनशैली किसी भी समय से अधिक प्रासंगिक है। हमें इस देश और पूरी मानवता को विनाश से बचाकर अभय का विचार देना होगा और यह केवल गांधी सोच के द्वारा ही किया जा सकता है। यदि हम महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में गांधी के विचारों को एक जीवनपद्धति के रूप में बहुप्रचारित और प्रसारित कर पाए तो यह संस्थान निश्चय ही एक वैश्विक स्तर का विचारवान संस्थान बन सकने की पात्रता ग्रहण लेगा। यहां प्रबुद्धता का वातावरण मुझे बहुत लगा, साथ ही विश्वविद्यालय परिसर का माहौल देखकर लगता है कि अगर विभूति नारायण, पांच साल और यहां रहते तो हिंदी समाज की आकांक्षा के अनुरूप यह विश्वविद्यालय दुनिया के उम्दा विश्वविद्यालयों में गिना जाता।
ललित सुरजन ने कहा कि नई पीढ़ी से मैं बहुत आशन्वित हूँ, अभिभावकों से मेरी विनती है कि आप अपने बच्चों को मशीन व पैकेज में तब्दील न होने दें अपितु साहित्य, कला, संस्कृति का भी ज्ञान दें जिससे वह मूल्यानुगत समाज के निर्माण में अपना योगदान दे सके। आज साम्राज्यवादी ताकतें अदृश्य तरीके से हमारे दिमाग को भोथरा करने की साजिश रच रही है। अगर आपके बच्चों के दिन की शुरुआत सचिन के छक्के व रात की समाप्ति मुन्नी बदनाम हुई से होती है तो निश्चित रूप से वह बच्चा एक बेहतर नागरिक नहीं बन सकेगा। नई व्यवस्था के अंतर्गत सांस्कृतिक गुलामी से हमें छुटकारा पाने के लिए हम सभी को सचेत होने की जरूरत है।






