गुवाहाटी। बजट के दिन आज असम के हिंदी अखबारों के पाठकों के लिए दोहरी मार पड़ी। पहली मार वित्त मंत्री ने महंगाई को रोकने के लिए कोई कड़े कदम न उठा कर मारी तो दूसरी पिटाई हिंदी अखबारों ने कर दी। गुवाहाटी के महंगे हिंदी अखबारों ने आज अपने मूल्य में एक रुपए की बढ़ोत्तरी कर दी। यानी गुवाहाटी में अब 6 रुपए की जगह अखबार 7 रुपए में मिलेंगे। कर्मचारियों के लिए दो जुन की रोटी के लिए ठीक से पैसे न देने वाले इन अखबारों ने महंगाई का हवाला देते हुए पाठकों से 12 पेज के अखबारों के लिए 7 रुपया देने की अपील की है।
हालांकि इन अखबार प्रबंधकों को कर्मचारियों पर पड़ रही महंगाई का असर नहीं दिख रहा है। कर्मचारियों का शोषण करने वाले इन अखबार प्रबंधकों को शायद यह पता नहीं कि इसी देश में 24 से 28 पेज के अखबार 2 रुपए में मिल रहें हैं। दरअसल, गुवाहाटी में इनकी मनमौजी है। यहां के चारों अखबार मिलीभगत कर दाम बढ़ा देते हैं। पाठकों की मजबूरी है कि वे करें तो करें क्या? असल में राष्ट्रीय अखबार शाम को यहां पहुंचते हैं। यह अलग बात है कि राष्ट्रीय अखबारों के ऑनलाइन संस्करण से खबर लेकर ये लोग अपने पेजों में चिपका लेते हैं।
ऐसी सूचना है कि यहां के अखबारों के पास न्यूज एजेंसी का सब्सक्रिप्शन भी नहीं है। ऐसा भी नहीं है कि अहिंदी क्षेत्रों से निकलने वाले इन अखबारों को विज्ञापन से पैसा नहीं मिलता है। हमेशा भूत-प्रेत, श्मसान घाट और बनियों की कहानी लिखने वाले इन अखबारों को पांच से छह करोड़ रुपए सालाना विज्ञापन से मिलता है। ये दाम इसलिए बढ़ाते हैं कि ज्यादा अखबार छापना न पड़े और लागत खर्च कम हो। क्योंकि प्रसार संख्या बढ़ने-घटने से इन्हें कोई असर नहीं पड़ता। हिंदी के नाम पर विज्ञापन तो मिलेगा ही।






