Samar Anarya : एक पत्रकार का काम करते हुए (in the line of duty) मिर्जापुर में गैंगरेप होता है, पुलिस से लेकर नारीवादियों तक को सूचना होती है पर बस….. बात यहीं ख़त्म। इस बार कोई गुस्से में उबलता नहीं दिखता, नारीवादियों तक. क्यों? मुम्बई के शक्तिनगर मिल्स मामले से लेकर तहलका के गोवा थिंक फेस्ट मामले में उबले गुस्से से इस मामले में ऐसा क्या फर्क था कि गुस्सा छोड़िये, यह खबर अखबारों के भीतरी पन्नों में बॉक्स तक सिमट के रह गयी.
फर्क था, फर्क यह था कि दिल्ली से हजार किलोमीटर दूर हुए इस बलात्कार में इस बार एक तो पीड़िता हिंदी पत्रकार थी और फिर अपराधी अनजान चेहरे- मतलब एक तरफ पीड़िता इन प्राइमटाइम टीवी फेमिनिस्टों के अपने वर्ग की नहीं थी (शी डजंट बिलोंग टू अस, यू नो) और दूसरी तरफ हाईप्रोफाइल टारगेट नहीं सो टीआरपी की कोई सम्भावना नहीं। सो क्यूँ उबलते मध्यवर्गीय नैतिकता के ये अंग्रेजीदाँ झंडाबरदार, फिर चाहे इनकी दूकान का झंडा लाल ही रंग का क्यों न हो.
अपनी पिछली करतूतों को छिपाने के लिए जनसंघर्षों में जिंदगी लगा देने वालों को 'सेकुलर रेप' की एक नयी कैटेगरी इजाद कर उसका समर्थक बताने की साजिशों में लगे ये लोग काश देख पा रहे होते कि उनके मुखौटे नोचे जा रहे हैं.
काश वो देख पाते कि सम्भावनाओं से भरी हुई युवा पत्रकार Priyanka Dubey उनसे पूछ रही हैं कि "क्या होगा जब अपनी कारों में बिसलेरी भर गांव 'विजिट' करने वाली इन 'अंग्रेजी मेमों' का छिछलापन गरीब समझ जायेंगें?''
किसका किसका चरित्र हनन कर लाल झंडों से लेकर उदारवाद के मुखौटों में छुपाया अपना आभिजात्य-अंग्रेजीदां चरित्र, व्यवहार और सरोकार छुपाने के लिए?
पत्रकार, स्तंभकार, एक्टिविस्ट और मानवाधाकिरवादी अविनाश पांडेय 'समर' के फेसबुक वॉल से.
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