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ग्यारह फीसदी ब्राह्मणों का वोट जिसे मिलेगा वो सत्ता के करीब होगा

: कौन होगा राइट च्वाइस? : चुनाव पांच राज्यों में, लेकिन सबकी निगाहें टिकी हैं उत्तर प्रदेश पर। क्या राजनेता, क्या चुनाव विश्लेषक, क्या सामाजिक कार्यकर्ता और क्या दूसरे प्रदेशों के राजनीतिक दल, सभी अपने-अपने तरीके से समीकरण बिठाने में लगे हैं। चुनाव सर्वेक्षण करने वाली संस्थाएं और मीडिया की भी निगाहें केवल उत्तर प्रदेश पर टिकी हैं। सभी के अपने-अपने तर्क हैं और अपनी-अपनी भविष्यवाणियां। कोई सपा को सरकार बनाते देख रहा है, तो कोई कांग्रेस को। कोई बसपा को इंकम्बेंसी फैक्टर की वजह से कमजोर बताने में लगा है, तो कोई राम आंदोलन के खत्म हो जाने से भाजपा को चौथे नंबर की पार्टी बता रहा है। लेकिन इन सब के बीच जनता के मन को टटोलने और उनकी इच्छा को जानने का काम कोई नहीं कर रहा है। कोई यह नहीं बता रहा है कि कौन होगा प्रदेश का भावी मुख्यमंत्री और किसके सिर पर सजेगा, देश के सबसे बड़े सूबे का ताज। इतना तय है कि सूबे की कोई भी पार्टी ऐसी नहीं रह गई, जो अपने दम पर इस बार सरकार बना ले।

: कौन होगा राइट च्वाइस? : चुनाव पांच राज्यों में, लेकिन सबकी निगाहें टिकी हैं उत्तर प्रदेश पर। क्या राजनेता, क्या चुनाव विश्लेषक, क्या सामाजिक कार्यकर्ता और क्या दूसरे प्रदेशों के राजनीतिक दल, सभी अपने-अपने तरीके से समीकरण बिठाने में लगे हैं। चुनाव सर्वेक्षण करने वाली संस्थाएं और मीडिया की भी निगाहें केवल उत्तर प्रदेश पर टिकी हैं। सभी के अपने-अपने तर्क हैं और अपनी-अपनी भविष्यवाणियां। कोई सपा को सरकार बनाते देख रहा है, तो कोई कांग्रेस को। कोई बसपा को इंकम्बेंसी फैक्टर की वजह से कमजोर बताने में लगा है, तो कोई राम आंदोलन के खत्म हो जाने से भाजपा को चौथे नंबर की पार्टी बता रहा है। लेकिन इन सब के बीच जनता के मन को टटोलने और उनकी इच्छा को जानने का काम कोई नहीं कर रहा है। कोई यह नहीं बता रहा है कि कौन होगा प्रदेश का भावी मुख्यमंत्री और किसके सिर पर सजेगा, देश के सबसे बड़े सूबे का ताज। इतना तय है कि सूबे की कोई भी पार्टी ऐसी नहीं रह गई, जो अपने दम पर इस बार सरकार बना ले।

हालात हंग असेंबली की ओर इशारा कर रहे हैं। ऐसी हालत में अभी यह बताना मुश्किल है कि सूबे की कुर्सी किसके हाथ लगेगी, क्योंकि बसपा को छोड़कर प्रदेश के चुनावी समर में ऐसी कोई पार्टी नहीं है, जिसमें सीएम बनने वालों की संख्या एक से ज्यादा न हो। भाजपा ने भले ही अपने संभावित सीएम के रूप में उमा भारती का नाम आगे किया है, लेकिन तय मानिए अगर भाजपा सरकार बनाने की स्थिति में आती भी है, तो सबसे पहले कलराज मिश्र, राजनाथ सिंह जैसे लोगों से लोहा लेना होगा। जहां तक कांग्रेस की बात है, रीता बहुगुणा जोशी से लेकर श्रीप्रकाश जायसवाल, सलमान खुर्शीद और बेनी प्रसाद वर्मा से लेकर प्रमोद तिवारी जैसे लोगों पर भी कांग्रेस दांव खेल सकती है, जो अंधेरे में भटकाव के शिकार रहे हैं। भला कौन जानता था कि सोनिया गांधी, डॉ. मनमोहन सिंह जैसे एक गैर राजनीतिक व्यक्ति को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठा देंगी। इसलिए आप कांग्रेस के खेल पर मत जाइए।

आप कह सकते हैं कि सबसे ज्यादा मुख्यमंत्री के लिए कांग्रेस और भाजपा में मारा मारी है। जातीय आधार पर हो रहे चुनाव और चुनाव के बाद किस जाति और किस नेता के लोगों की जीत ज्यादा हुई है, इस पर भी मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार का फैसला होना है और राहुल गांधी जिस युवा राजनीति का पाशा फेंकते नजर आ रहे हैं, तो कोई युवा चेहरा भी कांग्रेस की ओर से मुख्यमंत्री के पद पर जा सकता है। सपा का तो पूरा सीन ही साफ है। सपा की सरकार बनती है, तो मुख्यमंत्री या तो मुलायम सिंह यादव बनेंगे या फिर उनके पुत्र अखिलेश यादव। किसी भी सूरत में मुख्यमंत्री की कुर्सी मुलायम सिंह के घर ही जानी है। इन तमाम पहलुओं पर आगे हम और चर्चा करेंगे, लेकिन सबसे पहले प्रदेश के राजनीतिक मिजाज, बसपा से कटे सवर्णों की सोच और सूबे में मायावती, उमा भारती, रीता बहुगुणा जोशी और अनुराधा चौधरी जैसी चार महिलाओं के बीच जारी जंग पर एक नजर।

चुनाव के इस माहौल में एक दूसरे पर तीखे बाण छोड़ते नेताओं को आप परखें, तो पता चल जाएगा कि किसी भी पार्टी या नेता को जनता की बुनियादी समस्या से कोई लेना देना नहीं है। लोकतंत्र के इस चुनावी महापर्व में सभी नेता अपने झंडे बैनर के साथ मतदाताओं को रिझाने में लगे हैं, लेकिन जब मतदाता अपनी समस्याओं को सामने रखता है, तो नेता जी बगले झांकते हुए निकल जाते हैं। आइए हम आपको अपने चुनावी दौरे के दरम्यान देखी कुछ जिलों की तस्वीर से साक्षात्कार कराते हैं। काका हाथरसी को तो आप जानते हीं होंगे। हास्य कवि काका साहब हाथरस के रहने वाले थे। लोगों को काका खूब हंसाते थे, लेकिन उनका हाथरस रो रहा है।

आलम यह है कि एक पार्टी का एक उम्मीदवार वहां लोगों के बीच कंडे बांटता फिर रहा है। अपना राशन कार्ड दिखाओ और एक वोट के बदले 125 कंडे ले जाओ का नारा लगाते फिर रहे नेता जी से जब पूछा गया कि हाथरस के लिए जीतने के बाद क्या करेंगे। नेता जी कह गए कि हालत बदल दूंगा। रासजीवन भाई कहते हैं कि पहले भी सभी नेताओं ने हाथरस को बदलने की बात कही थी, कुछ नहीं बदला। हाथरस के कांशी राम टाउनशिप के अंतर्गत 90 प्रखंडों में 1500 घर बीपीएल धारकों के लिए हैं। सब जर्जर हालत में हैं। खाने को अनाज नहीं और अनाज है, तो कंडे नहीं। हाथरस की तस्वीर कब बदलेगी, नहीं कहा जा सकता। आगे बढ़ा, तो बुंदेलखंड प्यासा मिला।

पानी के लिए पानी-पानी होते लोगों की सही तस्वीर किसी को देखनी हो, तो बुंदेलखंड जरूर जाएं। पानी के अभाव में अधिकतर लोग अपना घरवार छोड़ चुके हैं। इस इलाके में पेयजल के लिए कुछ सालों में 50 से ज्यादा योजनाएं शुरू की गईं, लेकिन किसी से पानी का एक बूंद भी नहीं टपका। बांदा में 16, चित्रकूट में 12, हमीरपुर में 18 और हमीरपुर में 4 योजनाएं चालू हुर्इं और 670 गांवों को पानी पहुंचाने की बात की गई, लेकिन पानी की बूंदे 300 गांवों तक भी नहीं पहुंची। बुंदेलखंड कांग्रेस से हुंकार भर रहे राजा बुंदेला कहते हैं कि जब तक बुंदेलखंड अलग राज्य नहीं बनता, तब तक यहां कुछ नहीं होना है।

सभी दलों के लोगों ने इस इलाके को लूटा है और अपनी संपत्ति बनाई है। हमें डर है कि कहीं फिर ऐसी पार्टी के हाथ कुर्सी न चली जाए, जो लूटने का काम कर रहे हैं। उधर, सोनभद्र अपनी बदहाली पर रो रहा है। इस सोनांचल में पानी के लिए हाहाकार मची हुई है। साल में आठ महीने पानी के लिए लोग भटकते फिरते हैं। चुनाव प्रचार के दौरान सपा, बसपा और कांग्रेस के लोग जब पहुंचे, तो लोग नेताओं से लड़ पड़े। नेता जी कहां वोट की मांग करते, पानी पर नाराज लोगों को देखकर भाग खड़े हुए। यही वह इलाका है, जहां नक्सली गतिविधियां भी होती हैं और रेत की भारी तस्करी भी। कहते हैं कि मायावती के लोगों ने इस इलाके से रेत बेचकर अरबों की रकम कमाई, लेकिन यहां के लोगों को पानी नहीं दिया। सामाजिक कार्यकर्ता महेश आनंद कहते हैं कि यह इलाका पानी के लिए तरस रहा है। ऊर्जा नगरी ओबरा भी टैंकर के पानी पर जिंदा है। बेलन, कनहर, रिजुल, रेणु और कर्मनाशा नदी सात महीने सूखी रहती है और दुद्धी, घेरावल और नगवा इलाका पथरीला होने की वजह से हैंडपंप भी काम नहीं करता। किसी भी सरकार ने आज तक इस इलाके लिए कुछ नहीं किया है।

यह है सीतापुर। आबादी कोई 44 लाख। इसी सीतापुर से कभी राजेंद्र कुमारी वाजपेयी और रामलाल राही चुनकर आए और केंद्र में मंत्री भी बने। लेकिन आज भी सीतापुर रो रहा है। जिले की 37 फीसदी आबादी आज भी निरक्षर है और महिलाएं तो 47 फीसदी। जिले में महमूदाबाद में दरी उद्योग में पहले हजारों लोग काम करके रोटी खाते थे, अब ऐसा नहीं है। कहने के लिए यहां छह चीनी मिले हैं, लेकिन सब बीमार। लोग बेकारी का दंश झेल रहे हैं। प्लाइवुड फैक्ट्रियां बंद हो चुकी हैं। हर साल जिले की बड़ी आबादी शारदा, सरयू, धैरा और घाघरा का कहर झेलते-झेलते टूट चुकी है।

बाढ़ से बचाने की बात हर चुनाव में होती है, लेकिन जो जीत कर जाते हैं, वापस पलटकर नहीं देखते। बलबीर कुमार कहते हैं कि इस बार इसका हम मजा चखाएंगे। बाराबंकी में करीब 32 लाख की आबादी है। देश के पहले शिक्षा मंत्री रफी अहमद किदवई से लेकर बेनी प्रसाद बर्मा और यहीं के हैदरगढ़ से जीतकर मुख्यमंत्री बनने वाले राजनाथ सिंह ने कभी भी बाराबंकी को कुछ नहीं दिया। बाराबंकी की सभी फैक्ट्रियां बंद हो चुकी हैं। लोग हर साल बाढ़ का कहर झेलने को अभिशप्त हैं। 80 वर्षीय शांति देवी कहती हैं कि अब किस पर भरोसा करें। घर में तीन बेटे बेकार बैठे हैं और परिवार चलाना मुश्किल हैं अगर सरकार कुछ करती, तो भला होता।

फैजाबाद राम की जन्मभूमि है। 24 लाख की आबादी है यहां की। कितनी सरकारें आर्इं और गर्इं, लेकिन अयोध्या पर्यटन स्थल के रूप में विकसित नहीं हो पाया। रोजगार और शिक्षा व्यवस्था के नाम पर यह जिला आज सबसे पिछड़ा है। बलरामपुर से अटल विहारी वाजपेयी और नानाजी देशमुख प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। 21 लाख की आबादी वाला यह जिला, हर साल बाढ़ की वजह से टापू बन जाता है। आजादी के 65 साल में भी यहां शिक्षा का स्तर 50 फीसदी से ज्यादा नहीं बढ़ सका है। रोजगार के सभी साधन समाप्त हैं और मुस्लिम अब अपने पुश्तैनी धंधों को छोड़ चुके हैं।

सिद्घार्थ नगर, बहराइच, श्रावस्ती, गोंडा, बस्ती और अंबेडकर नगर के जिस इलाके में आप चले जाएं, विकास को ढूंढते रह जाएंगे। न बिजली, न पानी और न ही यातायात की सुविधा। अंबेडकर नगर मायावती का इलाका है। 24 लाख की आबादी वाले इस जिले में चांदा का प्रसिद्घ टेरीकाट अब अतीत बन गया है। कपड़ा उद्योग बंद होने की स्थिति में है। यहां के बुनकरों के पास एक लाख से ज्यादा पावर लूम तो है, लेकिन उनके पास बाजार नहीं है। कांग्रेस की रीता बहुगुणा कहती हैं कि पिछली सारी सरकारों ने प्रदेश को लूटने का काम किया है। हमारी बारी आने दीजिए। हम जनता की उम्मीदों पर खरे उतरेंगे। इस पूरी बयान बाजी में सवर्ण मतदाता मौन हैं।

बसपा के सोशल इंजीनियरिंग से आजिज आ चुके सवर्ण और खासकर ब्राह्मण मतदाता उस राह का इंतजार कर रहे हैं जिस राह से उन्हें सम्मान मिल सके। यही वजह है कि पूरे सूबे के किसी भी इलाके में आप चले जाएं। आपको किसी पार्टी के झंडे बैनर नहीं मिलेंगे। इलाहाबाद के संतोष तिवारी गरीबों के लिए काम करते हैं। सूबे में 25 फीसदी सवर्ण हैं, जिनमें ठाकुर नौ फीसदी, ब्राह्मण 11 फीसदी, वैश्य 4 फीसदी और कायस्थ 1 फीसदी हैं। 2007 के चुनाव में हर बार ठगी के शिकार हुए बाह्मण बसपा के साथ चले गए थे। लेकिन जिस तरह से शेखर तिवारी, बादशाह सिंह, राकेश त्रिपाठी और पुरुषात्तम द्विवेदी जैसे नेताओं को अपमानित किया गया अब ब्राह्मण बसपा से बिदक गए हैं। रधुनाथ तिवारी कहते हैं कि ‘सभी दलों को देख लिया सभी ने हमारा अपमान ही किया है। तिवारी आगे कहते हैं कि समाज में बंचितों और उपेक्षितों को अवसर देना सही है तो सवर्णों को ज्यादा दबा देना भी अच्छा नहीं हैं । मंडल आयोग के बाद सामाजिक क्रांति के हर प्रयोग में इसी तबके को ही दबाया गया है।’ दरअसल, भाजपा को कभी ऊंचा उठाने में इसी तबके का ही हाथ था। मंडल आयोग लागू होने से पहले सूबे की राजनीति में सवर्णों की ही चलती थी।

चरण सिंह जब राजनीति में मजबूत हुए, तो यादवों और जाटों में राजनीति के प्रति ललक बढ़ी। लेकिन 1989 में मुलायम सिंह जब मुख्यमंत्री बने, तो यादवों और जाटों को अपना मुकाम मिल गया। इसके बाद अगड़ी जाति भाजपा के साथ खड़ी हो गई, क्योंकि भाजपा तब मंडल के विरोध में हिंदुत्व के सवाल को हवा दे रही थी। लेकिन भाजपा ने भी बाद में अपना चोला बदला और पिछड़ों की राजनीति करने लगी। दागियों को गले लगाना शुरू किया और भ्रष्टाचार में शामिल होने लगी।

फिर सवर्णों की दीवानगी भाजपा से भी जाती रही। देखने वाली बात यह है कि 11 फीसदी ब्राह्मणों का वोट किसके खाते में जाएगा। इसके लिए सभी दलों में होड़ मची हुई है। और तय मानिए कि अब ये 11 फीसदी वोट जिस दल को जाएंगे वही सत्ता के करीब होगी।

लेखक अखिलेश अखिल वरिष्‍ठ पत्रकार हैं तथा राष्‍ट्रीय साप्‍ताहिक हमवतन से जुड़े हुए हैं. उनका यह लेख हमवतन से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया जा रहा है.

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