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सुख-दुख...

चंचल और दयानंद पांडेय की फेसबुकिया भिड़ंत चर्चा में है इन दिनों, आप भी आनंद लें

चंचल कांग्रेस में हैं. कभी बीएचयू में हुआ करते थे. कांग्रेस पार्टी है. बीएचयू विश्वविद्यालय है. चंचल में कई और भी है. कलाकार. साहित्यकार, रंगकर्मी. पेंटर. पत्रकार. स्तंभकार. कई सारे डाइमेंशन्स समेटे हुए हैं. जौनपुर के रहने वाले हैं. बनारस उनकी रगों में है. इन दिनों दिल्ली में हैं. उनकी मुंबई पर लिखी गई एक पोस्ट को लेकर दयानंद पांडेय ने कुछ तथ्यगत आपत्तियां जताई और चंचल को हांकू टाइप आदमी करार दिया. दयानंद पांडेय भी पत्रकार हैं. साहित्यकार हैं. निर्दल बताते हैं खुद को. गोरखपुर को जीते हैं. इन दिनों लखनऊ में हैं. तो इन दो के बीच जो बौद्धिक घमासान हुआ, उसका आचमन ढेर सारे लोगों ने किया. कई तो इधर-उधर पार्टी बनाकर बम बरसाने लगे, जैसे कोई फाइनल वॉर शुरू हुआ हो. तो आप भी आनंद लें.

-यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया

चंचल कांग्रेस में हैं. कभी बीएचयू में हुआ करते थे. कांग्रेस पार्टी है. बीएचयू विश्वविद्यालय है. चंचल में कई और भी है. कलाकार. साहित्यकार, रंगकर्मी. पेंटर. पत्रकार. स्तंभकार. कई सारे डाइमेंशन्स समेटे हुए हैं. जौनपुर के रहने वाले हैं. बनारस उनकी रगों में है. इन दिनों दिल्ली में हैं. उनकी मुंबई पर लिखी गई एक पोस्ट को लेकर दयानंद पांडेय ने कुछ तथ्यगत आपत्तियां जताई और चंचल को हांकू टाइप आदमी करार दिया. दयानंद पांडेय भी पत्रकार हैं. साहित्यकार हैं. निर्दल बताते हैं खुद को. गोरखपुर को जीते हैं. इन दिनों लखनऊ में हैं. तो इन दो के बीच जो बौद्धिक घमासान हुआ, उसका आचमन ढेर सारे लोगों ने किया. कई तो इधर-उधर पार्टी बनाकर बम बरसाने लगे, जैसे कोई फाइनल वॉर शुरू हुआ हो. तो आप भी आनंद लें.

-यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया

Chanchal Bhu : आरहा हूँ बम्मई ! बहुत अखर रहा है ,धर्मवीर भारती ,राही मासूम रजा ,गणेश मंत्री जी नहीं रहे . बहुत याद आते हैं ये लोग जब उस शहर का रुख करता हूँ . कितनी गप्पें ,कितनी बाते , ……../ ७ को मुम्बई जाना हो रहा है . एक सेमीनार में भाग लेने . बहुत दिनों बाद पुराने मित्र प्रभात खबर के संपादक भाई हरिवंश भी हैं . विश्वनाथ सचदेवा जी का कल जन्मदिन था ,बधाई तो दिया है अगर मिल गए कहीं ,जो कि हम कोशिश करेंगे तो पार्टी जरूर ले लूंगा . संजय पुगलिया ,आलोक जोशी जी सब को खबर कर दे रहा हूँ ,बाद में यह मत कहियेगा कि कमबख्त बताया नहीं यूँ ही बैरन वापस चलागया . फिल्म के बहुत से दोस्त हैं . राजबब्बर को पता है .घर पर बैठुंगा कुछ देर चकल्लस होगी .नादिरा जी के ठहाके सुनेगे . कुक्कू ,बच्चू . जूही और बेटे से मिलूंगा . भाई रणजीत कपूर , अनुपम श्याम , ……. सब एक जगह एक साथ . इसी शहर में हमारी एक बहन है भामा . कोशिश करूँगा कि मिल लूं . हमारे गाँव की एक बेटी है वीना मुखर्जी .. मौक़ा मिला तो सब से मिलना चाहूँगा . हमारा गाँव वहाँ पसरा पड़ा है . किसे चाह नहीं होती कि उनसे न मिलाजाय . ९ की सुबह वापसी .

Dayanand Pandey :  एक हैं चंचल बी एच यू। फेंकने के मामले में बड़े-बड़े फेंकुओं को भी पानी पिलाने में सिद्धहस्त। इतने कि कई बार मोदी भी पानी मांगें। बताइए भला धर्मवीर भारती भी उन से गप्प लड़ाते थे ! कांग्रेस की चमचई की धुर अलग तोड़े रहते हैं। लोग-बाग उन की जम कर धुलाई भी खूब करते रहते हैं। पर वह फेंकने के फेर में इतने बेफ़िक्र रहते हैं कि लोग लाख लपेटते रहें उन की सद्दी-मंझा खत्म ही नहीं होती। पतंग है कि उड़ती ही जाती है। तिस पर अपनी बात को चटक करने के लिए थोड़ा देशज की भी छौंक लगाए रहते हैं। तो भी मन करता है कि उन्हें बलबीर सिंह रंग की यह कविता भेंट कर दूं:

जिस तट पर प्यास बुझाने से अपमान प्यास का होता हो,
उस तट पर प्यास बुझाने से प्यासा रह जाना बेहतर है।

लेकिन आत्म-मुग्धता और अहंकार के मारे चंचल बी एच यू को यह कविता भाएगी नहीं, न ही सुहाएगी। वह तो फेंकने में भी काका यानी राजेश खन्ना और राज बब्बर की परिक्रमा करते नज़र आते हैं। सब देख रहे थे की शीला दीक्षित हार रही हैं,लेकिन यह सावन के अंधे अंदाज़ में उन की विजयघोष करते हुए कोर्निश बजाते रहे थे तब। अब शीला का नाम नहीं लेते। आज कल राहुल और सोनिया की परिक्रमा लगाते हैं अपने फ़ेंकू अंदाज़ में। और लोग हैं कि उन की धुलाई करते रहते हैं। लेकिन चंचल जी चेहरा साफ करने के बजाय आइना साफ करते हुए आगे बढ़ जाते हैं। वह रह-रह कर जार्ज और राजनारायण भी बुदबुदाते रहते हैं। लेकिन कभी जार्ज से मिलने नहीं जाते। उन के स्वास्थ्य की खबर नहीं लेते। और कांग्रेस की कोर्निश बजाते रहते हैं बिना राजनारायण की आत्मा की परवाह किए। राज्य सभा की चाह पूरी होगी कि नहीं, वह ही जानें पर कांग्रेस में उन को कोई पूछने वाला है नहीं, यह क्या वह भी नहीं जानते? जो भी हो उन के अपमान की प्यास का अंत हाल-फ़िलहाल तो दिखता नहीं। अभी तो वह राजा का बाजा बजा में न्यस्त और पस्त हैं।

Chanchal Bhu : ये भाई ! यहाँ फेस बुक पर एक एक उपन्यासकार है दया नन्द पांडे . उसे वह हर पोस्ट नागवार लगती है जिसमे किसी बड़े आदमी का नाम आ जाता है . आज जब हमने बम्मई पर पोस्ट लिखा तो उसे हैरानी हुई . लगा हमें फेकू कहने . हमें हँसी आयी . 'गिरोह ' का छद्म रंगरूट बहुत वक्त दिया हम पर लिखने के लिए . हमें लगा कि यह शख्स बीमार है . इतनी नकारात्मक सोच ? इसके पहले भी एक पोस्ट इसने हम पर लिखा था आज फिर इसे दौड़ा पड़ा . हमने इससे कहा कि दोस्त किसी मनो चिकित्सक को दिखा दो . गोरखपुर और जौनपुर में कोइ बुनियादी फर्क नहीं है . आप गोरखपुर में पैदा हुए और हम जौनपुर में . पैदा होने के पहले हम दोनों से नहीं पूछा गया था कहाँ पैदा होगे ? हो गए तो हो गए . इसमें क्या कुंठा ? आप काशी विश्व विद्यालय से खुंदक खा गए .इसलिए कि यहाँ दाखिला नहीं मिला . इसमें हम क्या कर सकते थे . अलबत्ता हमारे जमाने में आये होते तो निश्चित दाखिला मिल जाता . यह भी आपको फेकना लग रहा होगा . लेकिन ऐसा हुआ है किसी से भी दरियाफ्त कर लीजिए . दोस्त आप कलम बाज होकर दिल्ली पहुंचे . सारिका ,पराग ने घास नहीं डाला तो हम क्या करते . दिनमान की तो बात ही और थी . आप घूम कर लखनऊ जा गिरे हम तो गाँव तक आ गए . आप जिस मर्ज से गुजर रहे हैं उसका इलाज है . अपनी पोस्ट पर जाइए और देख लीजियेगा . अगर पिछलीबार की तरह मिटाया न होगा तो .

Siddharth Kalhans थोक के भाव लुगदी लिखता रहता है कौन गाते नही.. कौन गांव की मुनमुन…किसको फेंकू कहता है। खुद ही जाने किस किस के संबंधों की बातें बघारता है। आजकल पत्रकारित न कर कंपनी की मैगजीन देखता है सालों से। इसका ईलाज कोई बंगाली डाक्टर के चांदसी दवाखाने में हो सकता है

Dayanand Pandey चंचल जी, उस प्रबुद्ध मनोचिकित्सक का नाम भी सुझा दीजिए। फिर हम दोनों ही साथ चले चलते हैं। अपनी-अपनी कुंठा और मनोविकार को जंचवा लेते हैं। इलाज का खर्च भी हमारे जिम्मे रहेगा। रही बात भारती जी की तो मैं उन की बतौर लेखक बहुत इज़्ज़त करता हूं। अंधा युग, कनुप्रिया, सूरज का सातवां घोड़ा और मुनादी के लिए उन्हें सैल्यूट करता हूं। उन के संपादक रुप का भी आदर करता हूं। उन की बंगलादेश की रिपोर्ट भी मन में है। भारती जी के समय में मैं भी छपा हूं धर्मयुग में। लेकिन रही बात उन के साथ गप्प मारने की तो यह आप की तीरंदाज़ी है,फेंकना है, कुछ और नहीं। अरविंद कुमार जो तब के दिनों माधुरी के संपादक थे, उन से धर्मवीर भारती के अंदाज़े बयां पूछ लीजिए। रवींद्र कालिया भी हैं। उन के साथ धर्मयुग में काम कर चुके हैं। कालिया जी से भी बात कर लीजिए। उन की एक कहानी काला रजिस्टर है बांच लीजिए। धर्मयुग का ही काला रजिस्टर है वह। हरिवंश जी हैं, उन से जांच लीजिए। आलोक मेहरोत्रा हैं, हमारे पड़ोसी हैं,लखनऊ में, धर्मयुग में काम कर चुके हैं, बात कर लीजिए। कन्हैयालाल नंदन की आत्मकथा बांच लीजिए। नंदन जी ने धर्मयुग में जितनी यातना भुगती है, धर्मवीर भारती के हाथों, उतनी यातना शायद अपने किडनी के इलाज और डायलिसिस में भी नहीं पाई। धर्मवीर भारती कितना किस से गप्प मारते थे जान लीजिएगा। रही बात सुषमा जी की तो वह धर्मयुग में तब ट्रेनी हो कर गई थीं, भारती जी के बारे में उन से भी दरियाफ़्त कर लीजिए। पता पड़ जाएगा आप को कितना और किस से गप्प करते थे भारती जी। गणेश मंत्री की सादगी से भी आप परिचित नहीं होंगे। फेंकने और आत्मश्लाघा की कला में आप निष्णात हैं, यह हमीं नहीं, सभी लोग कहते हैं। आप अपनी पोस्टों पर आई प्रतिक्रियाओं को भी कभी बांच लिया कीजिए। आप क्या कर रहे हैं, पता चल जाएगा। आप कांग्रेस में रहिए या कहीं और यह आप की अपनी सुविधा है। पर यह जो अंधों की तरह राजा का बाजा बजा रहे हैं आप उस पर ज़रा शर्म कीजिए। किन्नर कभी गोरखपुर या कहीं भी राजनीति नहीं करते, वह गुस्सा जाहिर करते हैं लोगों का सिस्टम के खिलाफ़। लेकिन आप की बौखलाहट मुझ से किन्नर राजनीति का संग साथ करवा देती है, तो इस का क्या करें? क्या सिर्फ़ इस लिए कि मैं ने पूर्व मेयर किन्नर अमरनाथ पर एक पीस लिख दिया इस लिए? और एक बात यह भी अपनी जानकारी में रख लीजिए कि मैं स्वयंभू उपन्यासकार नहीं हूं। उपन्यास लिखने के लिए बहुत श्रम करना पड़ता है। आप की तरह लफ़्फ़ाज़ी कर के उपन्यास नहीं लिखे जाते। मेरे सात उपन्यास हैं। जिन पर राजेंद्र यादव जैसे संपादक ने हंस में चार पन्ने की संपादकीय भी लिखी है। हाइकोर्ट में कंटेंप्ट आफ़ कोर्ट भुगता है। ए्क उपन्यास पर गोरखपुर के महंत और माफ़ियायों की धमकी भुगती है। और भी तमाम बातें हैं। उदय प्रकाश दिनमान के समय के मेरे मित्र हैं, यह सही है। लेकिन मैं आज तक किसी बास या संपादक के आगे-पीछे नहीं घूमा, मित्र के पीछे-पीछे घूमने की तो बात ही क्या ! आप ने महिलाओं से मित्रता की बात कही है। अच्छी बात है। मेरी अच्छी मित्र हैं बहुत सारी महिलाएं भी। खैर छोड़िए मेरे लिए इतना ही काफी है कि आप हमारे फ़ेसबुकिया मित्र हैं और कि सब कुछ के बावजूद लोकतांत्रिक भी। बात सुनने की सलाहियत भी रखते हैं। अब बताइए कि कब चलें आप के प्रबुद्ध मनोचिकित्सक के पास। खर्च-बर्च मेरा ही रहेगा। लेकिन इलाज ज़रुरी है। अब यह उस प्रबुद्ध मनोचिकित्सक पर मुन:सर है कि इलाज वह मेरा करेगा कि आप का, कि दोनों का ! और अंत में आप की सुविधा के लिए आप के प्रिय मारियो मिरींडा का एक कैरीकेचर आप को समर्पित कर रहा हूं जो आप की मनोदशा दिखाने के लिए काफी है।

Chanchal Bhu दोस्त हमने इसका जवाब लिखा था ,वह कहाँ गया?

Dayanand Pandey चंचल जी, अब आप की भाषा भी अब अभद्र हो गई है। इस तू तकार की भाषा में मैं तो बात करने की आदत है नहीं है मेरी। आप ने जवाब मेरी पोस्ट पर लिखी थी, वहीं है।

Chanchal Bhu दोस्त पाडे जी . आप दूसरी बार चिहुंक रहे हैं . यह आपकी मानसिक कुंठा है जो मनोविकार में तब्दील हो चुकी है .कृपया आप किसी प्रबुद्ध मनो चिकित्सक को दिखाइए . हम जितनी भी बार किसी वजनदार की बात करते हैं आप अपना कद नापने लगते हैं . क्यों कि आप अपने आपको ;उपन्यासकार ' घोषित कर गिरोह की तरफदारी में लगे हुए हैं . अब तक हम चुप रहे .लेकिन अब ज़रा बात हो जाय .हम तीन महीने बम्मई में रहे . कार्टून और कैरीकेचर की ट्रेनिंग के लिए . मारियो मिरांडा (अगर आप इस नाम से वाकिफ होंगे तो आप को फिर एक झटका लगेगा इस फेकने पर ) के साथ . यह मेहरबानी भारती जी की ही थी . उन दिनों 'धर्मयुग में गणेश मंत्री , शुषमा पारासर भी रही . भारती जी के बारे में आप निहायत घटिया राय रखते हैं . वो अपने स्टाफ के साथ जिस अनुशासन से रहते थे वही वह नहीं थे .अगर आप पढ़ेते भी हैं तो उन्ही दिनों हमारी एक कहानी धर्मयुग में छपी है उसे के बहाने ,उसी के साथ भारती जी ने हमें राही साहब से मिलवाया था . आपको क्यों चिढ़ होती है उसकी वजह से हम वाकिफ हैं . जब आप उदय प्रकाश के साथ पीछे पीछे घूमते थे और दिन भर दिनमान के दफ्तर में बैठे रहते थे तब हम पत्रकारिता से विदा लेने की सोच रहे थे . हे बिप्रालोचक इलाज कराओ . आप कुछ फ़िल्मी लोगों का साक्षात्कार लिख कर इतरा रहे हो उनके साथ जिंदगी का बड़ा हिस्सा गुजरा है लेकिन वह कोइ मायने नहीं रखता . अपनी सोच को ऋणात्मक सोच से बाहर निकालो दोस्त नहीं तो कुंठा में ही बहुत कुछ गंदगी मचाओगे . गोरखपुर में केवल जनखे ही राजनीति नहीं करते . कुछ और भी लोग है और होंगे कुछ दूर उनके भी साथ चलो . अगर आपको ऐतराज है कि हम कांग्रेस के साथ क्यों हैं तो आप ही बता दीजिए कि कहाँ रहूँ ? अब आपको खुल कर बोलने में भी शर्म आयेगी कि मोदी के साथ चलो .क्यों कि कही न्कहीन से आपको अपना चेहरा भी बचाए रखना है . दोस्त फेकना होता तो हम भी मोदी की तरह फेकते कि क्लिंटन को चाय पर बुलाया है . हमारे सच को फेकना लगा तो हम गिरीश कर्नाड की बात रखना चाहते हैं -तुम्हारे तो मंसूबे में ही कंगाली है . विपर यह कंगाली छोड़ो कुछ सकारात्मक सोचो किसी अच्छी लड़की से दोस्ती कर लो अकल खुल जायगी .

Chanchal Bhu दोस्त दयानंद पांडे ! एक बात पर गंभीरता से सोचना , बार बार व्यक्तिगत व्यक्तियों पर ही क्यों उलझ जाते हो . यह अपने आप से पूछना . सुधरने की उम्मीद है अभी भी …

Chanchal Bhu हमने तू तकार नहीं की दोस्त . दोस्त ही बोलता रहा हूँ . आपकी टप पूरी पोस्ट ही ग्रीना से भरी है . फिर भी हम पढ़ रहे हैं . अगर हम कहे कि आप जिन पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी जी की जीवनी पढ़ कर फेल होते रहे हैं ,हम उनके साथ उनके घर में रहे हैं तो हम फेकू हैं ? फेकू किस साहित्य से उपजा है ? भाषा की अपनी तमीज होती है . हमें भी आलोचना की है लेकिन भाषा की लाज बचाते हुए . पांडे जी भाषा की बदतमीजी हमें भी आती है लेकिन हम यह जानते हैं कि इसे केवल हम दो जन ही नहीं पढ़ रहे हैं . एक बार अपनी सोच को देख लो दोस्त . .. आप दूसरी बार इस औकात पर आये है . विश्वविद्यालय का मजाक उडाया आपने

Dayanand Pandey आप विषयांतर करने के आदी है चंचल जी। बात आम की हो रही होती है, आप बबूल गिनने लगते हैं। अपनी यह पोस्ट एक बार फिर से बांचिए। यह तू तकार की भाषा से लदी-फदी है कि नहीं, देख लीजिए। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी को पढ़ कर क्यों फेल होगा मैं या कोई और भला? यह सब आप की अपनी कल्पनाएं और कुतर्क हैं, कुछ और नहीं। पहले पूरा पढ़िए फिर उस पर टिप्पणी कीजिए तो गुड लगेगा। लेकिन आप का दोष है भी नहीं। आप तो या तो तू तकार जानते हैं या फिर फेंकना या फिर राजा का बाजा बजाना !

Dayanand Pandey और हम कोई फ़ासिस्ट नहीं हैं कि किसी की लिखी बात मिटा दें। आप ने मेरी वाल पर जब भी, जो भी लिखा है, सब कुछ बदस्तूर पड़ा हुआ है। हम ने कभी किसी विश्वविद्यालय को बदनाम नहीं किया कभी। आप को यह ज़रुर बताया था, याद कीजिए कि जिस बी एच यू के आप पढ़े हुए हैं, मैं वहां परीक्षक हूं। सो उस विश्वविद्यालय को मैं भी प्यार करता हूं, इज़्ज़त करता हूं। लेकिन आप तो कौवा कान ले गया की तर्ज़ पर बात करने के आदी हैं, तो आखिर कहेंगे भी क्या?

Dayanand Pandey सिद्धार्थ कलहंस के मन में भी देखिए कि मेरे लिए कितना जहर भरा हुआ है, और कि चंचल जी को यह जहर बहुत पसंद आया है। सिद्धार्थ कलहंस खुद क्या हैं, यह फिर कभी लेकिन अभी तो देखिए कि क्या लिख रहे हैं मेरे लिए, 'थोक के भाव लुगदी लिखता रहता है कौन गाते नही.. कौन गांव की मुनमुन…किसको फेंकू कहता है। खुद ही जाने किस किस के संबंधों की बातें बघारता है। आजकल पत्रकारित न कर कंपनी की मैगजीन देखता है सालों से। इसका ईलाज कोई बंगाली डाक्टर के चांदसी दवाखाने में हो सकता है !' अदभुत है ! जाहिर है कि सिद्धार्थ कलहंस या तो बहुत ज़्यादा पढ़े-लिखे हैं या फिर इस से कोसों दूर है ! इन की शब्दावली पर खास ध्यान दीजिए और चंचल जी, आप अपनी पसंद की दाद लीजिए !

Dayanand Pandey चंचल जी, आप मुझे लेखक मानिए यह किसी डाक्टर ने आप से नहीं कहा। आप हमारे लेखन को कूड़ा मान लीजिए यह आप की अपनी सुविधा और अपनी पसंद है।आप मुझे घटिया लेखक कंबोज आदि के खाने में भी डाल दीजिए। यह आप का अपना विवेक है। लेकिन कुतर्क मत कीजिए, न अभद्र भाषा में बात कीजिए। यह तू तकार ठीक नहीं है। असहमत होना और बात है, तू तकार करना बिलकुल दूसरी। मुद्राराक्षस से मैं मिलता ही रहता हूं जब-तब। आज से नहीं, १९७८ से जब मैं विद्यार्थी था, गोरखपुर में तब से। उन का स्नेह मुझे हमेशा से मिलता रहा है।

Sanjay Sharma यहाँ तो कुछ व्यक्तिगत अदावत लगती है आप लोगों की ।

Chanchal Bhu संजय जी अदावत भी नहीं है , हम दोनों में से एक 'खिसक ' गया है . लेकिन हम दोनों नहीं तय कर पा रहे है . आब आपै बताओ ..

Chanchal Bhu हम तो लौट आये हैं . आप जिस शहर में हैं वहीं इलाज हो जायगा . मुद्राराक्षस से मी लीजिए . आपने रवीन्द्र कालिया , कन्हैलाल नंदन याँ जिनका भी सब के सब धर्मयुग में थे हमने जो लिखा है उसे देख लें . अनुशासन दफ्तर तक और दफ्ताएर के साथ ही रहा .आप सात लिखें याँ सत्तर हम गिनती नहीं गुणात्म तथ्य और कथ्य पर कह रहे हैं . रानू कम्बोज वगैरह आपसे ज्यादा लिखे हैं क्या करूं लेखक मान लूं ?

Praween Singh Koti Chanchal Bhu sir,यदि आप को याद हो तो एक बात साझा करदूं ,आप ने एक बार मुझे बताया था की राजनीति दो तरह की होती है.1 पुरषार्थ की और दूसरी ,यदि? अपना कद ही छोटा हो तो राजनीति को ही बौना बना दो जैसा की बी.पी.सिंह ने किया..तीसरी बात आप ने कहा की मैं दही बेचने वाला नहीं जिसे खरीदना हो खरीदे …चौथे ये दयानंद जी हैं जो इस फार्मूले को साहित्य और पत्रकारिता में गुसा दिए हैं खुद की राजनैतिक महत्वा कांक्षा केलिए ..सत्य इनको भी पता है पर गल्दोदाई भी तो कोई चीज है..जब भी आप इन जैसे को उत्तर देते हैं तो आप के तमाम पाठक ये सोचने लगते हैं की मुझमें भी तो कुछ साहित्यिक समझ है ये मुझे उत्तर क्यूँ नहीं देते …?और यहीं पे दयानंद जैसे लोग जीत जाते हैं . जिनको विश्वविद्यालय की परम्परा नहीं मिली तो वो चौकेंगे ही..@ramadheen singh sir(आज तक वो राजनाथ जी को राजनाथ ही कहते हैं आज तक क्यूँ राजनाथ कहते हैं? )इनके लिए वो भी आश्चर्य का विषय होगा |क्यूँ की एक लेख में इन्हों ने बताया था कि किसतरह ये अटल जी के करीबी थे..जो की इनके जीवन पर्यंत कभी संभव न हुआ..एक बात रामाधीन सर का कोड करूंगा …ये जो भी है ADC और CMP टाइप का है ये विश्वविदालयी परम्परा को जानता ही नहीं..

Dayanand Pandey चंचल बी एच यू जी, वैचारिक विमर्श में टट्टुओं की ज़रुरत नहीं होती। न लफ़्फ़ाज़ी की, न ही विलो द बेल्ट जाने की। Praween Singh Koti के मार्फ़त जो काम आप कर रहे हैं या करवा रहें, छाती ठोंक कर खुद सामने आ कर करिए। और खुल कर आरोप लगाइए। मज़ा आएगा। खुली चुनौती दे रहा हूं आप को भी, आप के ट्ट्टुओं को भी कि जो भी आरोप लगाए हैं, उन्हें साबित करें और उसे सार्वजनिक रुप से साझा करें।

Chanchal Bhu गुस्सा क्यों हो रहे हो भाई . शुरुआत तो आपने की . हमने तो महज जवाब दिया . बाकी एक ख़याल आप निकाल दीजिए जो कुछ करना होता है खुद करता हूँ . न्किस्सी से बुलवा सकता हूँ न किसी को रोक सकता हूँ .लेकिन एक बार अपनी भाषा देख लीजिए

Chanchal Bhu गुस्से से बाहर आइये . आज बसंत पंचमी है . किसी महिला मित्र के साथ काफी हाउस जाइए . और यह गुंड इ बंद करिये (चिढा रहा हूँ ,गंभीर मत होइए ) जिस वाल पर आप चढ़ के चले आये और निहायत ही भद्दी भाषा में .वा स्थान महिलाओं के लिए आरक्षित है .

Dayanand Pandey हा हा ! गुस्सा नहीं हो रहा चंचल जी, आप को आप के दर्पण में देख रहा हूं, लोगों को दिखा रहा हूं। कि आप कितने पानी में हैं। देख रहे हैं लोग कि आप अपनी छात्र राजनीति के दिनों और उन्हीं रुग्ण औजारों से मुक्त नहीं हुए हैं। लगे रहिए। और चतुर बउरहिया बने रहिए। आखिर लोगों को आप के इस दस्तरखान का भी तो स्वाद मिलना ही चाहिए। ले रहे हैं लोग। आप तब तक कुछ नया फ़ेंकने का बंदोबस्त कीजिए। गोता नज़र से देखने वाले लोग आप के सारे कार्य-व्यवहार को देख रहे हैं। हम तो मज़ा ले रहे है,आप भी लीजिए। अपने टट्टू से कहिए कि कुछ और अनर्गल करे। क्यों कि वह तो आप से भी बड़का वाला है। बहुत आगे जाएगा वह टट्टूगिरी में। इस लिए भी कि जैसे तर्क और तथ्य अगर आप के पास नहीं है तो वह भी निरा कंगाल है। सुन-सुना कर लिखता है बिचारा !

Chanchal Bhu :  कमबख्त ऐसे भी लोग अपने को साहित्यकार कहते हैं ?

Chanchal Bhu : आज मन बहुत खराब है .

Chanchal Bhu कल एक बदतमीज सांझ रही . एक बेडौल अक्ल से टकरा गया . बहुत दिनों बाद ऐसा हुआ .

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