चेहरे पर हल्की-हल्की बेतरतीब दाढ़ी। एकदम सादा लिबास। उस शाम राष्ट्रीय राजधानी की एक मेट्रो में वे सफर कर रहे थे। शायद, उनकी सफेद हो चली दाढ़ी का लिहाज करके एक नौजवान ने उनके लिए सीट छोड़ दी। इससे वे खुश हो गए। बड़े महानगर की आपाधापी में यह नजारा एकदम रोजमर्रा का है। लेकिन, दाढ़ी वाले प्रौढ़ सज्जन कुछ बोलने के लिए बेचैन से हो रहे थे। नौजवान ने उनके लिए सीट छोड़ी, तो वे शुरू हो गए। कुछ-कुछ बोलने लगे। बोलते-बोलते बात केंद्र की आला सरकार तक पहुंची। उनके एकालाप पर लोगों का ध्यान तभी गया, जब वे कुछ खरी-खरी बातें कहने लगे। कुछ लोगों ने उनकी हां में हां मिलाकर, हौसला अफजाई भी शुरू कर दी। तो उनकी ‘राम कहानी’ का बैंड बजने लगा।
उनकी बोली से सबको समझ में आ गया था कि वे बिहार के रहने वाले हैं। बात कहने की उनकी स्टाइल इतनी गजब की थी कि महज तीन-चार मिनट के अंदर ही तमाम लोगों का ध्यान उधर ही चला गया। चार-मिनट तक पहले वे क्या बोलते रहे? ज्यादा कुछ पल्ले नहीं पड़ा। लेकिन, जब उन्होंने रेल मंत्री पवन बंसल और कानून मंत्री अश्विनी कुमार की राजनीति की चर्चा शुरू कर दी, तो कई लोगों ने इस चर्चा राग में अपने भी स्वर घुसाने की धमा चौकड़ी सी मचा दी। इसी बीच एक साथी ने मेरा ध्यान खींचा, कि ये बातूनी अंकल लगता है, चना-चबैना बेचने का धंधा करते हैं? मेरी जिज्ञासा थी कि इतना दिव्य ज्ञान उसे कैसे हो गया? उसने हंसते हुए सामने रखी एक ढकी हुई बाल्टी की तरफ इशारा किया। कहा, कि ये सज्जन चना बेचने वाले कोई वेंडर लगते हैं।
इस आशय कि बहस तेज हो गई थी कि रेलगेट और कोलगेट दोनों मामलों में केंद्र सरकार बेशर्मी कर रही है। लेकिन, खांटी ‘कामरेड’ के अंदाज वाले उन महाशय ने एकदम पल्टा मारा। बोले, भई इस देश में मुश्किल यही है कि हम लोग हर समस्या का ‘शार्ट कट’ ढूंढने की कोशिश कर लेते हैं। इसीलिए कुछ इस्तीफों के बाद भी ‘बीमारी’ वहीं की वहीं बनी रहती है। वे बोलते गए। एक-दो को चोर करार करने से साहूकारी का युग नहीं लौट आएगा। ऐेसे में, जरूरी है कि देश के नौजवान बीमारी के लक्षणों पर झपट्टा न मारें। बल्कि, बीमारी की जड़ों में मट्ठा डाल दें। तभी बात बनेगी।
किसी ने सवाल दागा कि अंकल, आप बड़ी क्रांतिकारी बातें करते हैं। बताइए, करते क्या हैं? वे झटके से बोले, अरे! इस सवाल से दसियों साल जूझता रहा हूं। इसलिए इसका जवाब ढूंढने के लिए बिहार से दिल्ली आ गया। जहां से देश का सत्ता सिंहासन चलता है, उन सड़कों पर भी खूब घूमा। यह जानने की कोशिश की कि दूर-दराज के इलाकों से चुनकर जो हमारे नेता यहां आते हैं, वे यहां का पानी पीकर इतने ‘पत्थर दिल’ क्यों हो जाते हैं? कई साल भटकने के बाद समझ में आ गया कि सत्ता की चमक-दमक इनका दिल भी बदल डालती है। बस, ये तो गरीब-गुरबों की बात अपने वोट-बैंक की राजनीति के लिए करते रहते हैं। लेकिन, मजाल है कि किसी एमपी के यहां किसी आम आदमी को इज्जत से एक लौटा ठंडा पानी भी मिल जाए? मैं तो कई सालों तक भटक कर अब सही रास्ते पर आ गया हूं।
कई बार उनके जुमले किसी बाजीगर वाले अंदाज में होते। वे बोले, बहुत दिन बेरोजगारी की मार झेली। लेकिन, अब सेल्फ इंप्लायड हूं। दिल्ली से लेकर एनसीआर तक बाल्टी में चना-चबैना बेचता हूं। दो-तीन अखबार खरीदता हूं। ताकि, देश-दुनिया की खबरें पता रहें। वे बोलते गए। तमाम पार्टी वाले ईमानदार प्रधानमंत्री के पीछे पड़े हैं। वे भले आदमी हैं। अर्थ नीति के बड़का विद्वान हैं। देश का कारोबार सही पटरी पर लाना चाहते हैं। लेकिन, यहां तो उन्हें कुछ करने कहां दिया जाता है? कहीं सोनिया गांधी ‘वीटो’ लगाती हैं, तो कहीं भाजपा वाले दिशाहीन हंटर भांजते नजर आते हैं। मनमोहन जी क्या करें, वह भला आदमी है। निश्चित मानिए कि इस देश में फिलहाल इतना ईमानदार दूसरा शख्स शायद ही पीएम की गद्दी तक आए? इनकी कुछ बातें मानी जाएं, तो अर्थ नीति की पटरी सही रास्ते पर आ जाएगी। लेकिन, जिसको सत्ता मिलती है वही लूटने में लग जाता है। ऐसे में, एक बंसल के लिए रोने-धोने का कोई मतलब नहीं है।
कुछ लोगों ने टोका-टाकी शुरू की। कुछ ने बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के आंदोलनों का जिक्र किया। वे बोले, बाबा रामदेव खुद को ज्यादा खुशहाल बनाने में लग गए हैं। क्या पहले के किसी ऋषि-मुनि या बाबा ने अपने को अरबपति बनाया था? अन्ना जी की इज्जत की जा सकती है। लेकिन, देश को दिशा देने की उनकी कुव्वत कहां है? उन्हें अर्थ नीति के बारे में कितना ज्ञान है?
इस पर एक सवाल उछला। तो उन्होंने बड़े खिलंदड़ अंदाज में जवाब दिया। बोले, इमरजेंसी के पहले बी.कॉम किया था। ठीक-ठाक नंबर भी थे। जब रोजगार ढूंढने गया, तो लालू की सरकार की मार पड़ गई। नौकरी के लिए जितनी ‘मोटी गठरी’ चाहिए थी, उसका जुगाड़ था नहीं। सो, अब चना बेच रहा हूं। अपनी पढ़ाई को देश की चिंता में कुछ-कुछ यूज भी कर रहा हूं। रोज यह तलाश करता हूं कि देश की जनता झांसेबाज नेता-नगरी के छलावे में हर बार कैसे फंस जाती है? सो, चना खिलाने के साथ फ्री में लोगों को लोकतंत्र का कुछ ज्ञान भी बांट देता हूं। कुछ लोगों को लगता है कि ये चने वाला बहुत बातूनी है। लेकिन, क्या करूं साहब! आखिर चने वाला भी तो इंसान होता है। मैं तो चना बेचकर अपने को देश का सच्चा ‘कर्मयोगी’ मानता हूं। मैं तो चलते-चलते रोज समझ रहा हूं कि गरीबों में गैर-बराबरी की ज्वाला धधकने लगी है।
इंतजार तो यही है कि मेरे जीते-जी सामाजिक न्याय की आग धधक जाए। ताकि, जनसेवक बने फिर रहे नेताओं को पता चल पाए कि गरीब की हाय कितनी मारक होती है? वो कुछ और बोलते, लेकिन पता नहीं क्यों अचानक चुप हो गए? किसी ने पूछा कि उनके पास कोई मोबाइल नंबर है? इस पर वे बस मुस्कुरा दिए। अपने बारे में इतना ही बताया कि वे उस
गांव के हैं, जहां कि रेल मंत्री रहे ललित नारायण मिश्र पैदा हुए थे। लेकिन न उन्होंने और न उनके भ्राता श्री (जगन्नाथ मिश्र) ने गांव पर कोई उपकार किया। बस ये लोग जाति-बिरादरी के नाम पर वोट जरूर ले लेते रहे हैं। तो समझो हम इन नेताओं के दाता हैं और ये कटोरा लेकर मांगने वाले पाता हैं। अब उनकी मंजिल आ गई थी, वे उतर गए। उनके जाने के बाद काफी सन्नाटा-सा पसर गया।
लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।






