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सुख-दुख...

चार खंभे… तीन वैधानिक और एक जबर्दस्ती का… पर हम्माम में तीन तो निर्वस्त्र हो चुके..

फेसबुक पर वरिष्ठ पत्रकार और कई अखबारों में संपादक रह चुके शंभूनाथ शुक्ला समय-समय पर अच्छी बहस चलाते रहते हैं. साथ ही वे अपनी कुत्सित निजी आलोचनाओं की परवाह न करते हुए पूरी बहस को ट्रैक पर बनाए रखते हैं. भारत में चारों खंभों को लेकर एक बहस उन्होंने शुरू की. सिर्फ एक लाइन की उनकी बात पर लोगों ने काफी अच्छे ढंग से रिएक्ट किया. शंभूनाथ शुक्ल जी ने फेसबुक पर लिखा : '''चार खंभे। तीन वैधानिक और एक जबर्दस्ती का। पर हम्माम में तीन तो निर्वस्त्र हो चुके।'' इस पर कई लोगों ने कमेंट किया, मैंने भी. मेरा कमेंट यूं है…

फेसबुक पर वरिष्ठ पत्रकार और कई अखबारों में संपादक रह चुके शंभूनाथ शुक्ला समय-समय पर अच्छी बहस चलाते रहते हैं. साथ ही वे अपनी कुत्सित निजी आलोचनाओं की परवाह न करते हुए पूरी बहस को ट्रैक पर बनाए रखते हैं. भारत में चारों खंभों को लेकर एक बहस उन्होंने शुरू की. सिर्फ एक लाइन की उनकी बात पर लोगों ने काफी अच्छे ढंग से रिएक्ट किया. शंभूनाथ शुक्ल जी ने फेसबुक पर लिखा : '''चार खंभे। तीन वैधानिक और एक जबर्दस्ती का। पर हम्माम में तीन तो निर्वस्त्र हो चुके।'' इस पर कई लोगों ने कमेंट किया, मैंने भी. मेरा कमेंट यूं है…

Yashwant Singh : आरटीआई एक्टिविस्टों, सोशल मीडिया के कई सारे यूजर्स भी बेबाक पत्रकारिता करने वाले माने जाने चाहिए क्योंकि ये लोग वो कर जाते हैं, दिखा जाते हैं, बताते हैं, खुलासा करते हैं, जिसे बड़े बड़े मीडिया हाउस व पत्रकार जानने बूझने के बाद भी दबाए छिपाए रहते हैं… चौथा खंभा सिर्फ प्रिंट टीवी रेडिया वेब ही नहीं है, यह बड़ा दायरा पा चुका है, नए दौर की तकनीक के कारण… अब इसमें मोबाइल, आरटीआई, सोशल मीडिया भी शामिल है… सबसे बड़ी बात है, चौथे खंभे के खुद के अंदर अतनी डेमोक्रेसी है कि हम आपस में ही एक दूसरे को गरिया कर, पोल खोल कर ठीक कर लेते हैं और ईममानदारी की तरफ, जन सरोकार की तरफ मीडिया की दिशा बनाए रखते हैं… लेकिन बाकी जो वैधानिक कवच वाले तीन खंभे हैं वहां तो लूट व चोरी के नाम पर जबरदस्त एका है, कोई किसी के खिलाफ नहीं बोलता… इस मामले में सच में मैं चौथे खंभे को बाकी खंभों के मुकाबले महान व प्रणाम लायक मानता हूं…. 


बाकी साथियों के कमेंट पढ़ें…

Amit Chaturvedi कागज़ के चीथड़े लपेटे चौथा थोडा सलामत …
     
Chanchal Bhu वाह पंडित जी, हम्माम में नहीं, लबे सड़क ….
      
शंभूनाथ शुक्ल एकदम सही कहा Chanchal Bhu sir
 
शंभूनाथ शुक्ल Amit Chaturvedi: श्रीमान जी, चौथा कागज के चीथड़े नहीं लपेटे बल्कि कलम की धार के चलते तीखा है और तेज है तथा अन्य तीनों से ईमानदार भी, तल्ख भी और नैतिक भी।

Amit Chaturvedi इसीलिए तो उसे सलामत लिखा है सर..हालाँकि सत्ता के दलाल उसमे भी हैं..
 
Sanjay Sharma Sahi kaha ..
 
शंभूनाथ शुक्ल चौथे खंभे के साहस का एक नमूना Sanjay Sharma हैं, Yashwant Singh हैं तथा और तमाम हैं जिनके नाम लिखने शुरू किए जाएं तो शायद समुद्र की स्याही भी कम पड़ जाए।
   
Asrar Khan शंभू जी अन्धों में कनवा राजा की तरह है ….सामंतवादी मनोवृत्ति से ग्रस्त है तथा इस जगत की सबसे ज्यादा जानी-मानी हस्तियाँ उन्हीं अन्धों के तलवे चाटती देखि जाती है …/ देश का कारपोरेट जैसा चाहे कठपुतली की तरह नाचना इनकी नियति बन गया है ….और कुछ तो सौ करोड़ की दलाली में जेल से जमानत पर रिहा होने के बाद अपने चैनल पर हीरो की तरह फैलकर ख़बरें पढते हैं …इनमें वे भी हैं जिन्हें पद्मश्री भी मिल चुका है और वे नीरारादिया के साथ दलाली करती थीं …धन्य है अपना चौर्था स्तंभ …जिस मैली गंगा में मैं भी काफी तैर चुका हों …
 
Amit Chaturvedi वैसे तो अच्छा करने वाले तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में भी हैं..कमाल खान, रविश कुमार.. अर्नब गोस्वामी और भी कई हैं..
 
Balendu Swami जी कई बार तो मुझे लगता है कि चौथा भी कच्छे बनियान में तो आ ही चुका है  
 
Siddhartha Bauddh Media aisa khamba hai jo sabse jyada jaagruk hai lekin sabse jyada pakhand aur andhvishwas failata hai fir kehta hai humare desh me pakhand aur andhvishwas phail raha hai.
 
शंभूनाथ शुक्ल Asrar Khan & Balendu Swami: फिर भी बाकी तीन से बेहतर है। उसके पास कोई वैधानिक कवच नहीं है इसके बावजूद वह बाकी तीनों के भ्रष्टाचार के खिलाफ मोर्चा खोले है।
   
Balendu Swami जी सहमत
 
Siddhartha Bauddh Media ek vaishya ke tarah hai jo rupya dega raat uski agli raat koi aur.
 
शंभूनाथ शुक्ल वैसे मित्रों जबर्दस्ती का खंभा ही सबको पानी पिला सकता है। एक अकेला बांस बगिया में सबसे अलग होता है पर बाकी को बेचैन किए रहता है।
 
Asrar Khan शम्भू जी थोड़ा-थोड़ा बदमाश और थोड़ा -थोड़ा शरीफ वाली बात मत कीजिये …उतना तो सभी जानते हैं असल बात यह है कि पत्रकारिता एक एक ऐसा पेशा बन चुका है जो वर्तमान राजनितिक चरित्र से कुप्रभावित हुए बगैर रह ही नहीं सकता …इसीलिए हम लोग कहते हैं कि पूंजीवादी व्यवस्था ने अपने साथ-साथ सबको अपने जैसा निकम्मा और बेईमान तथा धूर्त बना दिया है ….
    
शंभूनाथ शुक्ल पूंजीवाद का अपना एक प्रगतिशील चरित्र होता है। कितना भी गड़बड़ हो पूंजीवाद मगर सामंतशाही के मुकाबले प्रगतिशील है।

Ravi Shankar Singh सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती है पहरेदार की। जितनी बड़ी जिम्मेदारी उतना ही बड़ा दोष भी। अगर पहरेदार सजग होता तो क्या आज के ये हालत होते ? चारों में बेहतर तो तब माना जा सकता है, जब चारो पहरेदार ही होते !

Asrar Khan तो फिर शंभू जी प्रेस के घरानों से कह दीजिए कि वे अपने मीडिया तंत्र को सामंती कवच से मुक्त कर दें …तो शायद चौथा खम्भा कुछ प्रगतिशील भूमिका निभा सके …वरना तो जहां भी देखिये ..".रघुपति राघव राजा राम ..पतित पावन सीता राम " ही हो रहा है

शंभूनाथ शुक्ल पहरेदार नियुक्त किया जाता है। उसे सैलरी दी जाती है, सुरक्षा कवच प्रदान किया जाता है लेकिन यह पहरेदार तो ऐसा खंभा है जिसके नीचे खजहा कुत्ता भी सू-सू कर जाता है।

Siddhartha Bauddh Bharat me bahut saari samasyaye hain lekin media ya to bhavishyavaani,dhongi babao ka drama, kareena ke latke jhatke, bhoot pret,comedy me hi aadhe se jyada waqt tak busy rehta hai.
 
Jayprakash Manas तीन नहीं जनाब चोरों के चारों, पर नगें को ही कौपीन पहनाया जाता है, और इस दिशा में भी जन समाज को हर स्तर पर कुछ न कुछ करना होगा

शंभूनाथ शुक्ल बाकी तीन के खिलाफ बोलिए जो आप पर बोझ बने हैं। जो आपके पैसे से ऐश करते हैं और बदले में आपको देते हैं दंगा, झगड़ा, मंहगाई और दुत्कार। मीडिया कुछ तो सजग करता ही है।

Siddhartha Bauddh @Shambhu sir, media bhi humare hi rupyo se aish karta hai.
 
Amit Chaturvedi शम्भुनाथ सर.. अभी यहाँ कमाल खान का नाम लिखने के बाद मुझे आपके ही किसी मित्र ने बताया है की सरकार से उन्हें काफी मदद मिली है पत्रकार पुनर्वास योजना के तहत..बरखा दत्त का नाम भी इसी श्रंखला में लिया गया है..आपको कोई जानकारी हो तो कृपया शेयर कीजिये..
 
Rajeev Ranjan Upadhyay सबसे निकृष्ट पतन तो इसी चौथे खंबे का हुआ है ! इनके टुच्चेपन की सीमा नहीं ……
 
शंभूनाथ शुक्ल कितना पैसा मीडिया पर खर्च करते हो। लेकिन एक सांसद, विधायक अथवा नेता या नौकरशाह और जज पर। पहले सोचो फिर लिखो कुछ भी मत दे मारो।

शंभूनाथ शुक्ल वह भी किसी न किसी राजनेता या नौकरशाह की शह पर हो सकता है कि कुछ पत्रकारों को कोई कवच मिला हो पर बाकी तीनों के कवच भी वैधानिक हैं। फिर अब तो सोशल साइट पर हो किंतनी दलाली खाते हो सिद्धार्थ बौद्ध?

Siddhartha Bauddh humara karoro rupya media ke paas hi jata hai media ko funding ye partiya hi karti hain. mehange advt dikhake humse tax vasoolti hain companiya.
 
Ajay Kumar कुछ ही लोगों ने संभाला है वर्ना चौथा खंभा भी निर्वस्त्र होने के लिये तय्यार है।
 
शंभूनाथ शुक्ल अब तुम चुप हो जाओ। समझते-बूझते कुछ हो नहीं बस कमेंट दे मारा।

Siddhartha Bauddh Media to independent fir kyu bik jaati hai hain chand rupyo ke liye wahan to meritious log hain.yahan electronic media ki baat kar raha hu.
 
Siddhartha Bauddh Main tarkpoorna baat karta hu, bebuniyaad baate nahi.
 
Sanjay Sharma अरे सर ..आपने ऐसा कहा इसके लिए मैं आपका आभारी हूँ ..आप जैसे बड़े भाई लोग है मेरे साथ इसलिए ईमानदारी से अखबार छाप लेता हूँ ..

Siddhartha Bauddh Abhi tak asharam nirdosh the ab tak, jab se ghoos mili yahi asharam criminal ho gaya. chhole samose waale nirmal baba abhi bhi nirdosh hain.
 
Devendra Surjan Google ke mutabiq fouth estate men print media ayr fifth estate men electronic media aata hai. Choutha khambha to yahaan bhi dharashayi ho raha hai jbki paanvhwan khambha din pratidin mazboot hota jaa raha hai bina politicians ko studio men bulaaye , n…See More
    
Jai Prakash Tripathi अतीत की कड़वाहट जहन में घुलते ही सारा मिश्री जमालगोटा हो जाता है।
     
Rajeev Ranjan Upadhyay चौथे खम्बे का मुहावरा जब गढ़ा गया तब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया इतना व्यापक नहीं था ! जिसे आप पांचवें खम्बे की उपमा दे रहे हैं ! चौथे खंबे की तुलना में पांचवां खम्बा बहुत गैर जिम्मेदार, समाज में अन्धविश्वास फ़ैलाने वाला, धूर्तों -पाखंडियों को सुरक्षा कवच देने वाला तथा महिमा मंडित करने वाला है ! दूसरों को उपदेश देने वाला यह मीडिया तो टट्टी में पड़ी अठन्नी भी दांतों से उठा ले !
      
Sunil Mishra चौथा भी कौन सा अछूता है …
       
Pawan Singh चौथे के तन पर तो लाज ढँकने को लंगोटी भी नहीं श्रीमन। यह तो हम्माम के बाहर ही नंगा है

Shekhar Sawant चौथा खम्भा पूरी तरह पूंजीवाद की गटर- गंगा में लोट -पोट हो रहा है . लेकिन दंभ बना हुआ है कि देश और समाज का रखवाला वही है . चौथे खम्भे में अब सिर्फ बिकने वाला माल टंगा हुआ है . नंगा तो वह बहुत पहले हो चूका है और नंगापन अब उसका श्रृंगार ही है .

Pawan Mishra chautha bhi shuru hai

Sanjay Sharma कितनी भी कमियों हों लेकिन पत्रकारिता की आत्मा तो प्रिंट मीडिया में ही बसती है । बस कार्पोरेट का मालिकाना मिजाज़ दायरे बांध देता है । अब भी आत्मा मरी नहीं है कई पत्रकार खुददार हैं जो किसी लालच में नहीं आते ।

Kaushal Sharma lekin malik to khuddaar nahee hay. ve har haalat me apne buisness interest safe vrakhte hayaur reporter yahi mazboor ho jata hay

जय प्रकाश पाठक नमस्कार! बचा तो कोई नही.

Pawan Mishra Regional Newspaper aur kuch bade GHAG is qatar me jyada aage hain ?

Shyam Singh Rawat . . . . . और अब चौथा भी तो वैसा ही दीखने लगा है। 5,000- रुपल्ली पगार पाने वाला चैनलिया खबरची 5,000 करोड़ का मालिक कैसे बन गया? अब इस चौथे खम्भे को पूँजीवाद ने निगलना शुरू कर दिया है। हकीकतन इसे यूँ कहा जाना ज्यादा उपयुक्त होगा कि इसने खुद ही पूँजीवादी व्यवस्था के आगे न केवल घुटने टेक दिये हैं, बल्कि यह अब साष्टांग दण्डवत् की मुद्रा में है। देश और समाज का रखवाला होने के मिथ्या दंभ से कुछ हासिल होने वाला नहीं है। चौथा खम्भा गाँव-गली से नगर-महानगरों तक नग्नावस्था में नित्य-प्रति भ्रमण करता यहाँ-वहाँ मिल जायेगा।

चौथे खम्भे के पहरुओं से अधिक प्रखर तो आज कुछेक आरटीआइ एक्टिविस्ट और सोशल मीडिया के कई सारे यूजर्स हैं जो बेबाक पत्रकारिता कर रहे हैं। ये लोग सामाजिक सरोकारों को लेकर ज्यादा जागरूक हैं। ये लोग वह दिखाते-बताते और खुलासा करते हैं, जिसे बड़े-बड़े मीडियामैन व पत्रकार जानते-बूझते हुए भी दबाए-छिपाए रहते हैं। पिछले दिनों दुनिया के अनेक देशों में हुए बदलावों के पीछे इसी सोशल मीडिया की ताकत को लोग देख चुके हैं। चौथा खंभा नई तकनीक के कारण व्यापक हो चुका है। अब इसमें सोशल मीडिया ही नहीं मोबाइल व आरटीआइ भी शामिल हैं। सच है कि "आवश्यकता आविष्कार की जननी है।"

स्वयं को लोकतन्त्र का सबसे बड़ा पहरुआ समझने वाला चौथा खंभा खुद ही इसका शत्रु बना हुआ है। इसके खुद के अंदर इतनी डेमोक्रेसी नहीं है कि कोई ईमानदारी और जन-सरोकारों की बात करना तो दूर, अपने ही बीच के विरोधाभासों की पोल खोल दे। अपने से ऊपर वाले का दबाव न मानने का माद्दा अब किसी मीडिया पर्सन में दिखायी नहीं देता। जब पत्रकारिता मिशन की बजाय व्यापार बन गयी हो तब येन-केन-प्रकारेण "नोट छापने" के अलावा और किसी बात की आशा करना ही व्यर्थ है। वैधानिक कवच वाले शेष तीन खंभों की तरह यहाँ भी लूट-खसोट, चोरी-चकारी और लम्पटता भरी हुई है।
 
N Jamal Ansari Chautha bhi ho chuka hai.
 
Govind Singh Parmar चौथा भी लगभग पहले तीन की ही हालत में है ,आदरणीय
 
Shriniwas Rai Shankar चौथे…का हाल चूँकि चौथे को ही दिखाना है…इसलिए अंतःवस्त्रों में अभी दिखाई जा रही तस्वीर…बाकी.हैं सब दिगम्बरै.
 
Raveendra Pratap Singh जंग तो चारो खंबे में लग चुका है.

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