: चिट फंड एसोसिएशन ने शारदा घोटाले से नाम जोड़ने पर आपत्ति जताई : इस मामले पर चिट फंड एसोसिएशन ऑफ इंडिया के जनरल सेक्रेटरी ने दिया स्पष्टीकरण : नई दिल्ली । लोगों को झांसे में रखकर ज्यादा कमाई का चस्का लगाया जाता है। यही चस्का ज्यादा निवेशकों को आकर्षित करता है और परिणाम होता है बड़ा फ्रॉड। ऐसे तमाम मसले हमारे सामने आते रहे हैं। ऐसे में एक है वर्ष 1919 में कार्लो पोंजी से जुड़ा। पोंजी ने एक ऐसी योजना बनाई कि वह जल्दी ही बहुत मशहूर हो गया।
बहुत कम समय में निवेशकों को उनकी पूंजी का बड़ा ब्याज देकर उन्होंने बिना विज्ञापन के प्रचार पाना शुरू कर दिया। शुरू में उसने ऐसा किया कि निवेशकों का विश्वास जगता गया। उसमें अपने ही जानकारों को जोड़ा। उसके परिवार के लोग, दोस्त-यार, पुजारी और पड़ोसी। इन सबसे उसने लगभग 1250 डॉलर जमा कर लिया। 90 दिनों के बाद उसे बतौर ब्याज 750 डॉलर वापस किया। अपने धन की ऐसी वापसी से उत्साहित निवेशकों ने उसका गुणगान शुरू कर दिया। उसकी मार्केटिंग होने लगी। वह यह बात हर उस व्यक्ति को बताने लगे जो अपने धन को लगाकर मोटा कमाना चाहते थे।
एक साल में ही बोस्टन पोस्ट के पहले पेज पर इस उद्यम की वैधता पर ही सवाल उठाए गए। इस खबर के बाद निवेशकों में उत्तेजना फैल गई और सभी अपना पैसा वापस मांगने लगे। अब जो पैसा खर्च किया जा चुका था उसे वापस करना कठिन था। यह कठिनाई तब तक बनी रहती जब तक कि गलत प्रचार को रोककर नए प्रतिभागियों को शामिल नहीं कर लिया जाता। नए प्रतिभागी जुड़े और परिणाम यह रहा कि करीब 40 हजार निवेशक अपना सबकुछ गंवा चुके थे।
तब से लेकर अब तक परिस्थितियां बदली नहीं हैं। पीड़ितों को बस लूटने वाले चेहरे नए मिल गए हैं। पोंजी का नाम बदलकर मल्टी लेवल मार्केटिंग हो गया है। बेशक आज परिस्थितियों में पूरा बदलाव आ चुका है। आज के वैश्वीकरण का सबसे घृणित पहलू यह है कि अर्थव्यवस्था के बढ़ते रुख में सफेद पोशों ने नई उड़ान भरी है। इस फ्रॉड की बृहद मार्केटिंग हो रही है। संचार के हर तरीके का इस्तेमाल किया जा रहा है। लोगों को फांसने में डाक सेवा, टेलीफोन, ई-मेल, इंटरनेट, टेलीविजन, रेडियो और यहां तक कि व्यक्तिगत रूप से भी इसका प्रचार किया जाता है। इस गोरखधंधे का इन दिनों रूप बहुत व्यापक हो गया है। इनके तमाम स्थितियों के चलते पीड़ितों की संख्या में खासा इजाफा हुआ है। मल्टी लेवल मार्केटिंग के नाम पर इन दिनों कई तरह से फ्रॉड की संख्या में खासी बढ़ोतरी हो गई है।
परिणाम असहनीय और दुखद है
अनेक पीड़ित ऐसे हैं, जिनकी अपनी बचत ऐसे फ्रॉड में चली जाती है। इसके चलते उन्हें मानसिक और शारीरिक रूप से बहुत दिक्कत होती है, उन्हें अपना घर गंवाना पड़ा, वे कुंठा में आ गए और कई बार तो कुछ लोगों ने आत्महत्या तक की कोशिश की। मल्टी लेवल मार्केटिंग के नाम पर फ्रॉड के चलते उपभोक्ताओं का विश्वास डिगा है और वे खोखले हुए हैं। एमएलएम फ्रॉड स्कीम के प्रमोटर बहुत जल्दी चीजों में ढल जाते हैं और अपने तकनीकी और अन्य तरीकों से लॉ इंफोर्समेंट ऑफ डिटेक्षन के खतरों को कम कर देते हैं। और अपने मौजूदा तरीके से ग्राहकों को कारोबारी जागरूकता से परिचित करा देते हैं।
लेकिन इन घोटालों का क्या जो एक के बाद एक हो रहे हैं इससे पता चलता है कि हमने पहले की घटनाओं से कोई सबक नहीं लिया है। और हम एक दूसरे पर चीजों को थोपते हुए थोडी देर के लिए हम उसका बहुत बडा तमाशा खड़ा कर देते हैं। और बहुत जल्दी ही अगली घटना घटने तक हम फिर सब भूल जाते हैं। इसी तरह जब कोई आर्थिक घोटाला घटता है तो हम नींद से जगते हैं।
शारदा ग्रुप की बात करें तो इससे पता चलता है कि उनका ढेर सारा कारोबार है और उनके पास 100 से अधिक कंपनियां हैं, जिसमें रियालिटी, कंसस्ट्रक्षन, टूर एंड ट्रैवल, एक्सपोर्ट, एग्रो, लाइवस्टॉक, फूड, मल्टीपर्पज, एड एजेंसी, मीडिया ग्रुप, न्यूज चैनल व ढेर सारी पत्रिकाएं हैं। हालांकि यह इस बात का सुबूत है कि उन लोगों ने किसी चिट फंड को इसका माध्यम नहीं बनाया। फिर भी उनके इस असफलता का गुबार भी चिट फंड के रूप में लोगों को दिखाया जाता है।
ध्यान रखने वाली जरूरी बातें:
-चिटफंड लोगों के डिपॉजिट को स्वीकार नहीं करती हैं
-चिटफंड पूरी तरह से कानूनी है और इसे चिट फंड एक्ट 1982 के तहत संचालित किया जाता है और यह राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आता है।
-हर राज्य में एक चिटफंड रजिस्टार का ऑफिस होता है जो सारे संचालन पर हर पल नजर रखता है। कोलकाता रजिस्टार तीसरे मंजिल पर राइटर्स बिल्डिंग में, 1, केएस रोड पर स्थित है।
-चिट फंड नियामक के नियम बहुत ही सख्त हैं, यहां तक कि डिपॉजिट लेने वाली कंपनियों से भी ज्यादा ये सावधानी बरतती है।
-चिट फंड, यहां तक कि कोई बिजनेस रजिस्ट्रार/राज्य सरकार के अनुमति के बिना स्वीकार नहीं करती। और अब तक कोई ऐसा परमीशन नहीं दिया गया है।
-चिट फंड का इतिहास बहुत पुराना है और यदि इसके समय की बात करें तो इसका अस्तित्व बैंकिंग के समय से भी पहले का है। बहुत सारी कंपनियां लगभग 100 साल से भी ज्यादा पुरानी हैं और अपना कारोबार अबाध ढंग से कर रही हैं।
-यद्यपि 'फाइनेंशियल इंक्लूजन' बहुत नया है, चिट फंड अपना काम बहुत समय पहले से कर रही है और यह ग्रामीण इलाकों में व्यवस्थित अंदाज में ढलकर वहां के लोगों को विश्वसनीय ढंग से निवेश का माध्यम देती है।
-यहां तक कि भारत में बिल एंड मेलिंडा फाउंडेशन ने भी चिट फंड के चैनल को ही अपने गरीबी सुधारक कार्यक्रम के लिए चुना। और ये कंपनी बहुत ही निकटता के साथ ग्रामीण और शहरी इलाकों में सफलता पूर्वक काम कर रहे हैं।
-चिट फंड एक मजबूत माध्यम है जो किसी का पैसा नहीं डुबोती।
– क्या ये मुनासिब है किसी व्यक्ति विशेष या संस्थान को उनके बिना किसी के गलती के बदनाम कर दिया जाए, जब तक कि भुक्तभोगी किसी अलग किस्म का न हो।
– क्या ये जरूरी नहीं है कि पहले उस जड़ का पता लगाया जाए फिर उस पर कोई फैसला दिया जाए।
-क्या यह हमारे नियामकों व मीडिया की नैतिक जिम्मेदारी नहीं है कि वो वास्तविकता के तह में जाकर इसका पता लगाए फिर इस पर कार्रवाई करें।
समन्वयन के तहत कैसे हो समाधानः-
-लोगों में जागरूकता फैलाने के लिए एजूकेशन प्रोग्राम का सहारा लेकर हर किसी को फ्रॉड कंपनियों के बारे में लोगों को जागरूक करना व उनके खिलाफ एक्षन लेना बेहद जरूरी है।
-रोकथाम इलाज से बेहतर है और ये मुहावरा इस मामले में लागू होता है। बाद में पछताने से अच्छा है कि पहले ही हर चीज की जॉंच परख कर ली जाए।
-चिट फंड एवाइजरी के सुझाव द्वारा नेषनल फाइनेंषियल इन्क्लूजन प्रोग्राम जिसे डिपार्टमेंट ऑफ फाइनेंषियल सर्विसेस मिनिस्ट्री ऑफ फाइनेंस और भारत सरकार ने बनाया है।
हमारी चिंताः
हाल में घटी यह घटना काफी दुखद व भयावह है और इसे चिटफंड का नाम दिया गया है यह इस मामले को और खराब करेगा। इसके कारण चिट फंड जो कि एक स्थापित संस्थान है उसमें उथल-पुथल मचा दी है जो कि एक राष्ट्र के आर्थिक विकास में अहम योगदान दे रहा है। हमारे प्रतिनिधि इस समस्याओं का समाधान करने में और ऐसी गलत चीजों को हटाकर बहुत खुश होंगे, हमारी प्रार्थना है कि एक सीधा रिकॉर्ड बनाया जाए बिना कोई देरी किए और उदाहरण के लिए चिट फंड पर गलत रिपोर्टिंग बंद की जाए।
प्रेस विज्ञप्ति






