नैनीताल। उत्तराखण्ड में तीस जनवरी को चुनाव कराये जाने के चुनाव आयोग के फैसले को लेकर गंम्भीर सवाल उठने लगे हैं। उत्तराखण्ड के पहाडी़ इलाकों में हो रही भारी बर्फबारी और हाड़ कंपा देने वाली ठंड ने चुनाव आयोग के इस फैसले को बेतुका साबित कर दिया है। राज्य की चुनावी मशीनरी तथा चुनाव आयोग को सम्भवतः यह मालूम होगा कि जनवरी-फरवरी में उत्तराखण्ड में जबरदस्त ठंड पड़ने से यहां के पहाडी़ इलाकों का पूरा जनजीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है।
कडा़के की इस ठंड के मौसम में यहां उच्च न्यायालय समेत सभी स्कूल-कालेज बंद हो जाते हैं। अधिक ऊंचाई वाले इलाकों के लोग ठंड से बचने के लिए मैदानी क्षेत्रों को पलायन कर जाते हैं। इसके बावजूद उत्तराखण्ड में तीस जनवरी को चुनाव कराये जाने का चुनाव आयोग का निर्णय किसी को समझ नहीं आ रहा है।
इन दिनों उत्तराखण्ड के ज्यादातर पहाड़ी क्षेत्र भारी बर्फबारी की चपेट में हैं। समूचा पहाड़ चिल्ला जाडे़ से ठिठुर रहा है। बर्फबारी वाले कई ईलाकों में यातायात बाधित है। इन क्षेत्रों के लोग बिजली, पानी समेत दूसरी जरूरी चीजों के लिए तरस रहे हैं। ऐसी सूरत में चुनावी मशीनरी के साथ-साथ उम्मीदवारों को भी भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। हालत यह है कि अपना नामांकन पत्र दाखिल करने के लिए खुद प्रदेश के मुख्यमंत्री भुवन चन्द्र खंडूडी को कई किलोमीटर पैदल यात्रा करनी पडी़।
प्रत्याशियों के लिए गांव-गांव जाकर मतदाताओं से मिलना मुश्किल हो रहा है। मतदान के रोज तीस जनवरी तक मौसम ने करवट नहीं बदली तो मतदाता वोट देने के लिए शायद ही घर से बाहर निकलें। इस सूरत में मतदान का प्रतिशत कम होना लाजमी है। चुनावी मशीनरी ने मौसम खराब होने की स्थिति में पोलिंग पार्टियों को हैलीकाप्टर के जरिये मतदान केन्द्रों तक पहुंचाने का इरादा जताया है। पर असल सवाल यह है कि मतदाताओं को मतदान स्थलों तक पहुंचाने की व्यवस्था क्या होगी और कौन करेगा।
नैनीताल से प्रयाग पाण्डे की रिपोर्ट






