चीन के ग्वान्जाऊ शहर की धरती पर उतरे हुए बीस दिन हो रहे हैं. नया देश. नईसंस्कृति. खान-पान, रहन-सहन और पहनावा आदि सबकुछ अपने से बहुत कुछ भिन्न. महिलाएँ और पुरुष दोनों पैंट-शर्ट पहनते हैं. दोनों समान रूप से साइकिल, कार और मोपेड आदि चलाते हुए मिलते हैं. दोनों नौकरी, व्यवसाय और किसानी के सच्चे सहभागी. दोनों में इतनी बराबरी कि प्राकृतिक भेद के अलावा इन्हें कहीं और किसी तरह से भी अलगाना बेहद मुश्किल. यानी सही मायनों में स्त्री-पुरुष में पूरा बराबरी का दर्ज़ा.
सड़क पर चलते हुए अब तक एक भी महिला चप्पलों में नहीं दिखी. हाँ,कोई एक सप्ताह पहले एक पुरुष को ज़रूर चप्पलों में देखा था.उस दिन मैं भी कुछ खरीदने के वास्ते दो-तीन सौ मीटर की दूरी चप्पलों में ही तय कर रहा था. संभवतः यही स्थिति सामने वाली की मानते हुए मैंने बाद में चप्पलें पहन बाहर न निकलने का फैसला कर लिया. तब से निरंतर जूतों में ही बाहर निकलता हूँ. जिस देश और समाज में रहें वहाँ की लोकाभिरुचियों का ध्यान रखना भी सभ्य होने की निशानी होती है और मैं अपने को इसका हक़दार मानता रहा हूँ.
यहाँ का खान-पान ऐसा है जिसमें मिर्च मसाले चिराग लेकर भी खोजना निहायत मुश्किल काम है. चीनी बाउल में परोसे गए ज़्यादातर व्यंजन बिल्कुल तेल-फुलेल रहित. सभी प्रायः उबले हुए. अब तक चावल, नूडल्स और मूमो ही हमारे द्वारा पहचाने जा सके हैं. शेष तो अपनी समझ से परे ही हैं. चौपस्टिक के बिना कोई भी खाना खाया ही नहीं जा सकता. यहां चावल तक चौपस्टिक से उठा-उठा कर खाते देखता हूँ तो अचरज होता है. यहाँ मांस के साथ एक विशेष प्रकार का उबला हुआ साग भी खाया जाता है. उसके विषय में एक साथी से जानना चाहा तो उन्होंने बताया कि यह पोर्क को आसानी से पचाता है. एक बात और जब मैंने दूसरे साथी से पूछी कि यहाँ ज्यादातर किन जीवों का मांस खाया जाता है तो उन्होंने हँसते हुए यही जवाब दिया कि, "इंसान को छोड़कर जमीन पर चलने, पानी में तैरने और हवा में उड़ने वाले सभी जीवों का मांस खाया जाता है."
उनकी हंस कर कही गई यह बात मज़ाक भी हो सकती थी .लेकिन उनकी शैली से मज़ाक कम हक़ीकत ज़्यादा लगी. धीरे-धीरे हंस, बगुला, कबूतर, बतख खरगोश थलचर तथा नभचरों के साथ टबों-टैंकों में भरे हुए नाना जलचरों को काटने-बिकने के लिए ले जाए जाते समय उनकी मजाक को रोज़ हकीक़त में तब्दील होते हुए देखता हूँ. हाँ, बड़े जानवरों का केवल मांस दिखता है जिसे आसानी से पहचाना नहीं जा सकता. युवक-युवतियां समान रूप से कभी-कभी बिना हिचक-झिझक के साथ बैठकर अंगूरी का भी सेवन करते हैं जिसे मैंने देखा नहीं केवल सुना है.वैसे भी शराब यहाँ इतनी सस्ती है कि यह कहना कि शराब पानी के भाव मिलती है से यह कहना अधिक उचित लगता है कि यहाँ पानी शराब के भाव मिलता है.
विश्वविद्यालयी शिक्षा में लड़कियों की संख्या लड़कों की अपेक्षा बहुत अधिक देखकर यही लगता है कि इक्कीसवीं सदी नारियों की होगी. इसका असर अभी से सरकारी सेवा आदि में नई पीढी के अधिकारियों-कर्मचारियों में बढ़ती स्त्री-संख्या से दिख रहा है. अपने संख्याबल के कारण बिंदास लड़कियों की टोलियों का विचरण करना इनके निर्भय और निर्बाध विकास की ओर संकेत करता है. यह दुनिया भर के लिए एक सुखद संयोग होगा जब सारे भूमंडल पर स्त्री जाति नर्भय होगी.
परिसर में हिरनियों-से उछलते कूदते, मचलते, घूमते हुए छात्राओं के दलों को देख कर 'गर्भनाल' के ताज़ा नवम्बर अंक में पढ़ा श्रीमती सुधा दीक्षित का नारी विषयक धारदार लेख स्मरण हो आया कि नारी अब और आगे घूँघट और किसी भी तरह के परदे को सहने वाली नहीं है. उनके ही लेख में उल्लिखित यह शेर समूची स्त्री जाति की सामाजिक और राजनीतिक चेतना का घोषणा पत्र कहा जा सकता है-
"हम ऐसी सब किताबें काबिले ज़ब्ती समझते हैं
कि जिनको पढ़के मर्द औरत को खब्ती समझते हैं."
इन दलों को देखकर यह विश्वास जगता है कि कोई भी ताकत इन्हें जाति,धर्म या संप्रदाय में नहीं बाँट सकती. विश्व्विदालय परिसर में ही नहीं बाहर भी न धर्म का झंझट और न जातियों की अनावश्यक मुहांमुहीं. जातियों के नाम पर स्त्री और पुरुष नाम की दो ही जातियाँ सर्वत्र दिखती हैं. इस तरह यहाँ की पूरी सामाजिक संरचना ही प्राकृतिक कही जा सकती है. पूरे बीस दिनों से घूमते हुए इस शहर में केवल एक महिला को उसके चेहरे के ढकाव से इस्लाम से जोड़ पाया.यह जोड़-गाँठ करते समय मैंने अपने को कोसा कि इस भेद रहित समाज में भी भेद करके देखने की मेरी प्रवृत्ति क्यों नहीं गई. इसके अलावा यहाँ न कोई पूजास्थल या कोई ऐसा व्यक्ति दिखा जिसके आधार पर हमारी विभेद बुद्धि कुछ भेद कर पाती. सबकी वेशभूषा और खान-पान की एकरूपता इन्हें बाहर और भीतर दोनों तरफ (तन से भी और मन से भी) से परस्पर एकीकृत रखती है.
ग्वांगदांग प्रांत की प्राकृतिक रम्यता और उसके ह्रदय स्थल ग्वान्ग्जाऊ शहर की मनोज्ञता और वैभवशीलता उसे किसी भी महान देश की राष्ट्रीय राजधानी के लायक बनाते हैं. यहाँ की सत्तर से अस्सी मंज़िलीसचमुच की आलीशान इमारतें देख कर लगता है कि जैसे ये बड़े गर्व से सीना ताने ऊपर वाले को चुनौती दे रही हों कि क्या तुम्हारे स्वर्ग में है कोई हमसे खूबसूरत.
श्रम और तकनीक की ये जीवंत मिसालें हमें नसीहत-सी भी देती हुई दिखती हैं कि नाना संतों-असंतों और भगवानों के फेर में जाया किए जा रहे दिन,मास और दशकों के लंबे समय को यदि राष्ट्र के विकास में लगाया जाए तो अपने आप कल्याण हो जाएगा. बिना नाना पूजाघरों, घंटों, घड़ियालों, आरतियों और अजानों के देखे-सुने हुए यहाँ समय बिताते हुए कुछ भी अभाव नहीं लगता बल्कि ऐसा सुखद अहसास होता है कि जैसे हम सिर्फ़ और सिर्फ इंसानी जज़्बातों की इबादत के शहर में रह रहे हैं.
लेखक डॉ. गंगा प्रसाद शर्मा चीन के ग्वान्ग्जाऊ में स्थित गुआंगदांग अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर हैं.






