Connect with us

Hi, what are you looking for?

No. 1 Indian Media News PortalNo. 1 Indian Media News Portal
Local News Community

विविध

चुनावी फंडिंग का झमेला

चुनावी फंडिंग यानी राजनीतिक चंदा जिसको लेकर दशकों से सियासी हल्कों में बहस चली आ रही है। राजनीतिक दल इस प्रकरण में एक-दूसरे पर जमकर कीचड़ भी उछालते रहे हैं। ये तथ्य भी सामने आए हैं कि तमाम औद्योगिक घराने प्रमुख राजनीतिक दलों को गुपचुप ढंग से भारी भरकम चुनावी फंड देते हैं। अक्सर ये फंड ‘ब्लैक मनी’ के रूप में दिया जाता है। 
चुनावी फंडिंग यानी राजनीतिक चंदा जिसको लेकर दशकों से सियासी हल्कों में बहस चली आ रही है। राजनीतिक दल इस प्रकरण में एक-दूसरे पर जमकर कीचड़ भी उछालते रहे हैं। ये तथ्य भी सामने आए हैं कि तमाम औद्योगिक घराने प्रमुख राजनीतिक दलों को गुपचुप ढंग से भारी भरकम चुनावी फंड देते हैं। अक्सर ये फंड ‘ब्लैक मनी’ के रूप में दिया जाता है। 
 
संसद के भीतर और बाहर ये आरोप लगते रहे हैं कि सत्ता और विपक्ष के ‘माननीय’ इस फंड को अपनी झोली में ज्यादा से ज्यादा बटोरने के लिए वो तमाम धतकर्म करते हैं, जो उन्हें कतई नहीं करने चाहिए। कांग्रेस और भाजपा दो बड़े राष्ट्रीय दल हैं। इनके बीच तो अक्सर चुनावी फंड को लेकर कहासुनी होती ही रहती है। ताजा विवाद दिल्ली का है। चार अन्य राज्यों के साथ यहां भी विधानसभा के चुनाव होने जा रहे हैं। नया राजनीतिक दल, आम आदमी पार्टी (आप) पहली बार दिल्ली के चुनावी मैदान में उतरा है। इसको मिले चुनावी चंदे को लेकर एक नया राजनीतिक बखेड़ा शुरू हुआ है। 
 
पिछले महीनों में अन्ना आंदोलन के चलते देशभर के युवाओं में एक ‘क्रांति’ जैसी हवा चल पड़ी थी। इसके चलते यूपीए सरकार भी महीनों तक भारी दबाव में रही है। अन्ना हजारे और उनके साथियों ने अपने आंदोलन में चुनावी फंडिंग को भी एक बड़ा मुद्दा बनाया था। यही कहा कि राजनीतिक चंदे के बहाने ही पूरी सियासी व्यवस्था में भ्रष्टाचार का कोढ़ फैल रहा है। अन्ना के आंदोलन से ही अरविंद केजरीवाल निकले हैं। इन्होंने राजनीतिक व्यवस्था की नई डगर बनाने के लिए ‘आप’ का गठन किया है। इनकी पार्टी अपना पहला चुनावी प्रयोग दिल्ली विधानसभा से कर रही है। 
 
पहले प्रयास में ही ‘आप’ के चुनावी नगाड़े ने अपनी धूम मचा दी है। चर्चा यही हो रही है कि इस चुनाव में कहीं ‘आप’, भाजपा और कांग्रेस का पूरा चुनावी खेल न बिगाड़ दे। क्योंकि, इस पार्टी के साथ हजारों युवाओं की टोलियां जुट गई हैं। इस पार्टी के कार्यकर्ता ‘अन्ना टोपी’ लगाकर मैदान में नजर आते हैं। ये उत्साही कार्यकर्ता सबको बताते हैं कि कैसे भाजपा और कांग्रेस जैसे दलों ने लूट का राज बना दिया है? ऐेसे में, जरूरी है कि व्यवस्था में बदलाव के लिए इन दलों को चुनाव में सबक सिखा दिया जाए। 
 
कांग्रेस और भाजपा के रणनीतिकारों को शायद पहले यही अनुमान रहा होगा कि चुनाव में बगैर संसाधनों वाली यह पार्टी उनके मुकाबले कहीं टिक नहीं पाएगी। लेकिन, चुनाव अभियान शुरू होते ही ‘आप’ ने पोस्टरों से लेकर रैलियों तक में बढ़चढ़ कर होड़ लेनी शुरू कर दी है। इससे दोनों दलों के रणनीतिकारों की बेचैनी बढ़ी है। माना जा रहा है कि इसी बेचैनी के चलते ही ‘आप’ को किसी न किसी कानूनी झमेले में फंसाने की कोशिशें तेज हुई हैं। अरविंद केजरीवाल कहते भी हैं कि जानबूझकर उनकी पार्टी को विदेशी फंडिंग के नाम पर उलझाया जा रहा है। जबकि, उनकी पार्टी चुनावी चंदे के मामले में पूरी पारदर्शिता से काम कर रही है। वे लोग किसी भी जांच के लिए तैयार हैं। लेकिन, यह भी चाहते हैं कि भाजपा और कांग्रेस भी अपने चुनावी चंदे का खुलासा देश के सामने करें। 
 
पिछले दिनों केंद्रीय गृहमंत्री सुशील शिंदे ने ‘आप’ की विदेश फंडिंग के मामले में जांच के आदेश दिए हैं। उन्होंने बताया है कि इस पार्टी को जो फंड मिला है, उसमें विदेशों से प्राप्त धन के नियमन का उल्लंघन किया गया है। इसी मामले की जांच कराई जा रही है। ‘आप’ के राष्ट्रीय सचिव पंकज गुप्ता का दावा है कि उनकी पार्टी को ऐसे भारतीय प्रवासियों से ही धन मिला है, जिनके पास भारतीय पासपोर्ट हैं। ऐसे में, इन्हें महज तकनीकी रूप से ही विदेशी कहा जा सकता है। ‘आप’ ने अपनी वेबसाइट पर भी ब्यौरा दिया है कि इस श्रेणी के लोगों ने अब तक करीब 6 करोड़ रुपए की सहायता दी है। जबकि, कुल मिलाकर पार्टी गठन के बाद अब तक करीब 19 करोड़ रुपए का फंड मिला है। ये फंड करीब 63 हजार लोगों ने दिया है। इनका भी ब्यौरा वेबसाइट पर डाल दिया गया है। केजरीवाल कहते हैं कि इतनी पारदर्शिता के बाद भी कांग्रेस और भाजपा के लोग ‘आप’ पर गलत फंडिंग का सवाल उठा रहे हैं। जबकि, चुनावी फंडिंग के मामले में इन दोनों के दामन दागों से ही भरे हैं। 
 
अरविंद केजरीवाल के लोगों ने चुनावी अभियान में फंडिंग के विवाद को भी एक मुद्दा बना दिया है। इस पार्टी के कार्यकर्ता अब जगह-जगह जाकर यह बता रहे हैं कि कैसे-कैसे बड़े औद्योगिक घरानों से अरबों रुपए की ‘ब्लैक मनी’ चुनावी चंदे के नाम पर ली जाती है? इसीलिए संसद से लेकर विधानसभाओं तक अमीरों के पक्ष में कानून बनते रहते हैं। जनवरी महीने में एक गैर-सरकारी संगठन ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ (एडीआर) ने दिल्ली हाईकोर्ट में एक याचिका डालकर भाजपा और कांग्रेस के राजनीतिक चंदे की जांच कराने की मांग की है। इसमें कहा गया है कि गैर-कानूनी ढंग से कांग्रेस ने ब्रिटेन की ‘वेदांता’ कंपनी से करोड़ों रुपए का चुनावी फंड लिया है। जबकि, नियमानुसार कोई राजनीतिक दल किसी विदेशी कंपनी से इस तरह का धन नहीं ले सकता। ऐसा करने पर उसकी चुनावी मान्यता रद्द की जा सकती है। अब इस मामले की सुनवाई उच्च न्यायालय में अगले साल जनवरी में होनी तय हुई है। 
हाल में, भाजपा में शामिल हुए चर्चित नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी ने दावा किया है कि ‘आप’ ने अमेरिका सहित कई देशों के लोगों से धन लिया है। इनमें से कई का भारतीय मूल से कोई संबंध नहीं है। इनमें से कुछ मामलों के उनके पास पक्के सबूत हैं। समय आने पर वे इनका खुलासा करेंगे। केजरीवाल कहते हैं कि वे स्वामी जैसे नेताओं की चुनौती स्वीकार कर रहे हैं। लेकिन, यह भी चाहते हैं कि भाजपा और कांग्रेस दोनों के चुनावी फंडों की जांच भी की जाए ताकि, देश को जमीनी हकीकत का पता चल जाए। 
 
पिछले दिनों गैर-सरकारी संगठन ‘एडीआर’ और ‘नेशनल इलेक्शन वॉच’ की एक रिपोर्ट जारी हुई थी। इसमें बताया गया था कि 2004-12 के बीच कांग्रेस को चंदे के रूप में 2365 करोड़ रुपए मिले हैं। जबकि, इसमें से 1951 करोड़ रुपए चंदा देने वालों का कोई ब्यौरा पार्टी ने नहीं दिया है। इस तरह से कांग्रेस के राजनीतिक फंड में 82.5 प्रतिशत धन अज्ञात स्रोतों से मिला है। इसी अवधि में भाजपा को भी 1304 करोड़ रुपए की रकम मिली है। लेकिन, पार्टी ने इसमें से 952 करोड़ रुपए का चंदा देने वालों का ब्यौरा नहीं दिया है। इस तरह से अलग ‘चाल-चरित्र-चिंतन’ का दावा करने वाली भाजपा को भी 73 प्रतिशत राजनीतिक फंड अज्ञात स्रोतों से मिला है। लगभग यही हाल प्रमुख क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का भी रहा है। इसी तरह बसपा ने अपने मिले फंड में 61.8 प्रतिशत रकम के स्रोतों का खुलासा नहीं किया है। जबकि, एनसीपी ने अपने चंदे के 91.58 प्रतिशत रकम देने वालों का कोई ब्यौरा नहीं दिया है। इस मामले में केंद्रीय सूचना आयोग ने एक महत्वपूर्ण पहल की थी। इसी साल जून में सभी छह राष्ट्रीय दलों के लिए यह व्यवस्था की थी कि इन्हें सूचना के अधिकार (आरटीआई) कानून के तहत लाया जाए। ताकि, जनता यह जान सके कि इनके पास कहां से धन आ रहा है और कहां जा रहा है? लेकिन, इस मामले में सभी दलों ने एकजुटता दिखाते हुए इसका विरोध किया है। हैरान करने वाली बात यह है कि राजनीति में पारदर्शिता की दुहाई देने वाले तमाम दलों का राजनीतिक रुख भी इस मामले में अलग नहीं रहा। वे भी नहीं चाहते कि राष्ट्रीय दल आरटीआई कानून के दायरे में आ जाएं। आखिर, इन दलों को आरटीआई से इतना डर क्यों लगता है?
 
       लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।
Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

… अपनी भड़ास [email protected] पर मेल करें … भड़ास को चंदा देकर इसके संचालन में मदद करने के लिए यहां पढ़ें-  Donate Bhadasमोबाइल पर भड़ासी खबरें पाने के लिए प्ले स्टोर से Telegram एप्प इंस्टाल करने के बाद यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia 

Advertisement

You May Also Like

विविध

Arvind Kumar Singh : सुल्ताना डाकू…बीती सदी के शुरूआती सालों का देश का सबसे खतरनाक डाकू, जिससे अंग्रेजी सरकार हिल गयी थी…

विविध

: काशी की नामचीन डाक्टर की दिल दहला देने वाली शैतानी करतूत : पिछले दिनों 17 जून की शाम टीवी चैनल IBN7 पर सिटिजन...

विविध

पहली बार चुनाव हमने 1967 में देखा था. तेरह साल की उम्र में. और अब पहली बार ऐसा चुनाव देख रहे हैं, जो इससे...

विविध

राजस्थान, कांग्रेस और सेक्स. ये तीन शब्द लगता है आपस में अच्छे से घुल मिल गए हैं. भंवरी कांड में ये तीनों शब्द जुड़े...