चार राज्यों में विधानसभा चुनावों की राजनीतिक गहमा-गहमी ने जोर पकड़ा है। छत्तीसगढ़ में तो पहले चरण का मतदान कल हो भी गया। माओवादियों की तमाम चुनौतियों के बावजूद बस्तर इलाके में 60 प्रतिशत से ऊपर मतदान हो गया। इसको लेकर कहा जा रहा है कि बैलेट, बुलेट पर भारी पड़ा। तमाम धमकियों को ठेंगा दिखाकर स्थानीय आदिवासियों ने मतदान करने का जज्बा दिखाया है। इस अद्भुत साहस की सबको मिलकर सराहना करनी चाहिए। लेकिन, जान हथेली पर लेकर वोट डालने की हिम्मत दिखाने वालों को मिलकर सलाम करने की बजाए, भाजपा और कांग्रेस में इसका खुद श्रेय लेने की होड़ लग गई है।
भाजपा के नेताओं ने दावा करना शुरू किया है कि उनकी सरकार के पुख्ता प्रबंधन के चलते ही स्थानीय मतदाता गोलीबारी के बीच भी मतदान करते रहे। जबकि, कांग्रेसियों ने अलाप लगाया है कि केंद्र सरकार ने यहां चुनाव के लिए करीब 1 लाख केंद्रीय सुरक्षा बल लगाए थे। इसी के चलते इतने बड़े पैमाने पर मतदान हो पाया है। हौसला स्थानीय आदिवासियों ने दिखाया, लेकिन इसकी वाहवाही लूटने के लिए राजनीतिक बेशर्मी शुरू हो गई है। इस बीच भाजपा के ‘पीएम इन वेटिंग’ नरेंद्र मोदी और कांग्रेस के नेताओं के बीच जुबानी जंग भी तेज होने लगी है। एक-दूसरे के खिलाफ तीर-तुक्के ‘मिसाइलों’ की तरह छोड़े जा रहे हैं।
प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने पिछले दिनों छत्तीसगढ़ की एक चुनावी रैली में मोदी की तरफ कटाक्ष किया था। उन्होंने कहा था कि भाजपा के कुछ नेता तो अब इतिहास-भूगोल को भी तोड़-मरोड़ कर पेश करने लगे हैं। उल्लेखनीय है कि पटना की रैली में मोदी ने देश का गौरवशाली इतिहास बताने के चक्कर में कुछ तथ्यात्मक गलतियां की थीं। इनको लेकर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मोदी को अज्ञानी साबित करने की कोशिश की। इस मामले को लेकर कांग्रेसी नेता भी तीखे कटाक्ष करते रहे हैं। इसी संदर्भ में मनमोहन सिंह ने भी मोदी पर निशाना साध लिया। अपने तेज-तर्रार तेवरों के लिए चर्चित हो चुके मोदी ने खेड़ा (गुजरात) के एक कार्यक्रम में जमकर पलटवार किया। उन्होंने प्रधानमंत्री से सवाल किया कि 26 सितंबर 1932 में वे जिस गांव में पीएम जी पैदा हुए थे, उस दौर में यह इलाका हिंदुस्तान में था। लेकिन, अब पाकिस्तान का हिस्सा है। आप देश को बताइए कि किन लोगों की राजनीति के चलते देश का यह भूगोल बदला?
मोदी ने सवाल किया कि स्वतंत्रता के आंदोलन में ऐतिहासिक योगदान करने वाले पहले गृहमंत्री सरदार बल्लभभाई पटेल को उनकी मृत्यु के 41 साल बाद ‘भारत रत्न’ से नवाजा गया, ऐसा क्यों? जबकि, जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी को उनके जीवनकाल में ही यह सम्मान दे दिया गया। आखिर, कांग्रेस को यह भी बताना पड़ेगा कि यह किस किस्म का इंसाफ है? मोदी ने यह भी सवाल उठाया कि संविधान के निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर को आजादी के 33 सालों बाद ‘भारत रत्न’ से क्यों नवाजा गया? इतिहास के साथ क्या यह छल कांग्रेस ने नहीं किया? यहां तक कि आजादी के आंदोलन के नायक रहे ‘लाल-बाल-पाल’ (लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक व विपिन चंद्र पाल) को किसने भुलाने की कोशिश की? यदि आजादी के आंदोलन के इन नायकों को भाजपा सम्मान देना चाहती है, तो कांग्रेस को क्यों अखर रहा है?
केंद्रीय कानून मंत्री एवं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल कह रहे हैं कि कई मौकों पर देश को पता चल गया है कि भाजपा के ‘पीएम इन वेटिंग’ मोदी कितने अधकचरे ज्ञान वाले हैं? उन्हें तो इतिहास-भूगोल की तमाम ऐसी जानकारियां भी सही-सही नहीं हैं, जो कि हाईस्कूल में पढ़ने वाले किसी छात्र को हो जाती हैं। सिब्बल ने कहा है कि मोदी को देश के सामने बताना चाहिए कि शिक्षा, आर्थिक व विदेश नीति के प्रमुख मामलों में उनका क्या खास राजनीतिक दृष्टिकोण है? यदि वे इन मुद्दों पर देश को कुछ खुलकर बताएं, तो जनता अच्छी तरह समझ लेगी कि ‘भाजपा के पीएम’ सचमुच में कितने ज्ञानी हैं? सिब्बल के इस कटाक्ष को लेकर भाजपा के कई नेताओं ने आक्रामक निशानेबाजी शुरू कर दी है।
उल्लेखनीय है कि मोदी इन दिनों देश के विभिन्न हिस्सों में जोरदार रैलियां करते घूम रहे हैं। उनका खास जोर चुनावी राज्यों पर है। चूंकि, विधानसभा के ये चुनाव लोकसभा चुनाव के महज चंद महीने पहले हो रहे हैं। इसीलिए, ये चुनाव भाजपा और कांग्रेस के बीच खास प्रतिष्ठा का मुद्दा बन गए हैं। मोदी के सिपहसालार दावा कर रहे हैं कि इन चारों राज्यों में भाजपा, कांग्रेस को चुनावी शिकस्त देने जा रही है। 8 दिसंबर को चुनाव परिणाम आने हैं। इसके बाद देश की चुनावी तस्वीर बदली नजर आएगी। कांग्रेस प्रवक्ता मीम अफजल कहते हैं कि किसी दल के नेता ‘मुंगेरीलाल के हसीन सपने’ देखना चाहते हैं, तो भला उन्हें कौन रोक सकता है? उनका सवाल है कि आखिर, मोदी जैसे नेता के हाथ में देश की एकता कैसे कायम रह सकती है? क्योंकि, ये महाशय खुद पिछले दिनों ‘रायटर’ से एक इंटरव्यू में कह चुके हैं कि वे हिंदू राष्ट्रवादी नेता हैं। इस पर उन्हें गर्व है। भला, इस तरह की संकीर्ण सोच वाला शख्स सभी को साथ लेकर कैसे चल सकता है?
भाजपा नेतृत्व इस दौर में नरेंद्र मोदी की छवि को संवारने के अभियान में जुट गया है। इसी रणनीति के तहत पार्टी के कई नेता मीडिया से लेकर उन नेताओं की खबर लेते हैं, जो कि मोदी को गुजरात दंगों के हवाले से ‘दंगाई पुरुष’ साबित करने की कोशिश करते हैं। 6 नवंबर को अंग्रेजी के प्रतिष्ठित अखबार ‘द हिंदू’ में वरिष्ठ पत्रकार एन. राम का एक लेख छपा था। इसमें उन्होंने लिखा था कि कैसे 2002 के दंगों से मोदी मुक्त नहीं हो सकते? उन्हें क्यों देश का एक वर्ग तमाम सफाई के बावजूद सेक्यूलर नेता के रूप में स्वीकार नहीं कर सकता? इन धारदार तर्कों से शायद भाजपा का नेतृत्व काफी आहत हुआ है। ऐसे में, इसी अखबार में कल एक लेख भाजपा प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर का छपा है। इसमें उन्होंने मोदी के मुकाबले कांग्रेसियों को ज्यादा बड़ा दंगाई साबित करने की कोशिश की है।
जावड़ेकर ने सवाल किया है कि 2002 के गुजरात दंगों की बहुत बात की जाती है। लेकिन, ऐतिहासिक सच्चाई यह है कि 1969 में कांग्रेसी सरकार के दौरान अहमदाबाद में भयानक दंगे हुए थे। इनमें करीब 1500 मुसलमान मारे गए थे। इसी तरह कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में ही 1987 में भागलपुर (बिहार) में हुए दंगों में करीब 1000 मुसलमान मारे गए थे। 1984 में सिख विरोधी दंगों में 8000 से ज्यादा सिखों का नरसंहार हुआ। इस कुकृत्य में तो मुख्य हिस्सेदारी कांग्रेस के दिग्गज नेताओं की थी। कांग्रेसियों को ये तथ्य क्यों नहीं याद आ रहे? जावड़ेकर ने अपने इस लेख में इस बात का भी उल्लेख किया है कि 2002 में गुजरात दंगों के दौरान पुलिस और सेना ने दंगाइयों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की थी। इसी के चलते 170 दंगाई सुरक्षाबलों के हाथ मारे गए थे। जबकि, सिख विरोधी दंगों में तो उनकी जानकारी के मुताबिक पुलिस के हाथों एक भी दंगाई नहीं मारा गया। ऐसे में, किस मुंह से यह आरोप लगाया जा रहा है कि मोदी सरकार ने दंगाइयों को गुजरात में खुली छूट दी थी?
भाजपा प्रवक्ता ने यह भी तर्क दिया है कि कांग्रेस के लोग और कुछ बुद्धिजीवी अपने पूर्वाग्रहों के चलते मोदी सरकार को मुस्लिम विरोधी साबित करने की कोशिश करते रहते हैं। जबकि, सच्चाई यह है कि गुजरात में मुस्लिम आबादी महज 10 प्रतिशत के आसपास है। लेकिन, इस राज्य में पुलिस के अंदर मुसलमानों की भागीदारी करीब 12 प्रतिशत है। जबकि, पश्चिम बंगाल में जहां मुस्लिम आबादी करीब 25 प्रतिशत है, वहां पर सरकारी नौकरियों में मुसलमानों की हिस्सेदारी महज 3 प्रतिशत है। जबकि, इस राज्य में 35 सालों तक वाम मोर्चा की सरकार रही है। इस समय भी खांटी सेक्यूलर तेवरों वाली तृणमूल कांग्रेस का राज है। ऐसे में, सवाल है कि मुसलमानों के साथ नाइंसाफी कहां हो रही है? यह सोचने का विषय है।
पिछले दिनों नरेंद्र मोदी ने छत्तीसगढ़ की एक रैली में लोगों को अगाह किया था कि वे कांग्रेस के ‘खूनी पंजे’ से सावधान रहें। यदि इसके साये से बचना है, तो भाजपा के चुनाव चिन्ह कमल का बटन दबा दें। मोदी की इस टिप्पणी की शिकायत कांग्रेस नेतृत्व ने चुनाव आयोग में की है। जबकि, इसके पहले राहुल गांधी की एक बहुचर्चित ‘आईएसआई’ वाली टिप्पणी पर भाजपा ने ऐतराज जताया था। उसने भी इसकी शिकायत चुनाव आयोग में की थी। अब इन दोनों मामलों पर आयोग ने अपनी कार्रवाई शुरू की है। इस बीच कांग्रेस के अंदर यह बहस भी तेज हुई है कि मोदी, पार्टी के लिए कितनी बड़ी राजनीतिक चुनौती हैं? जून में मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया गया था। शुरुआती दौर में कांग्रेस ने यही रणनीति बनाई थी कि मोदी को ज्यादा भाव न दिया जाए। यही जताया जाए कि कांग्रेस उन्हें अपने लिए कोई बड़ी चुनौती नहीं मानती। क्योंकि, पार्टी उन्हें महज क्षेत्रीय नेता मानती है। इसी रणनीति के तहत शुरुआती दौर में मोदी के उठाए गए सवालों का जवाब कांग्रेस अपने गुजरात के नेताओं से दिलाती थी। लेकिन, यह रणनीति मोदी के बढ़ते राजनीतिक तूफान के आगे टिक नहीं पाई है, तो कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने अब सामूहिक रूप से मोदी की खबर लेनी शुरू की है। लेकिन, इस बात को लेकर अभी बहस जारी है कि वाकई में मोदी, कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती बने हैं या नहीं? पिछले दिनों केंद्रीय वित्तमंत्री पी. चिदंबरम ने गोवा के एक समारोह में कह दिया कि नरेंद्र मोदी कांग्रेस के लिए एक बड़ी चुनौती बन गए हैं। वे इस बात को स्वीकार कर रहे हैं। लेकिन, कल केंद्रीय गृहमंत्री सुशील शिंदे के सुर-ताल इस प्रकरण में एकदम बदले नजर आए। उन्होंने मीडिया से यह तक कह डाला कि वे मानते हैं कि मोदी, कांग्रेस के लिए कतई चुनौती नहीं हैं। उन्होंने चिदंबरम की टिप्पणी के बारे में तो चुप्पी साधी। लेकिन, यह जरूर जोड़ा कि वे जो कुछ कह रहे हैं, यही पार्टी की आधिकारिक लाइन है। बहरहाल, इस चुनावी दौर में जेर-ए-बहस का मुख्य मुद्दा मोदी के आसपास घूमने लगा है। दोनों दल एक-दूसरे की जमकर खबर लेने के चक्कर में शब्दों की मर्यादा का पालन करना भी जरूरी नहीं समझ रहे।
लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।