: मुसलमानों के कदमों में कांग्रेस के दिग्गज : नाम के मुसलमान हैं कांग्रेसी मुस्लिम लीडर : नई दिल्ली। आजादी के बाद से ही कांग्रेस मुसलमानों को मात्र सत्ता में आने का माध्यम समझती आ रही। बात उन दिनों की है जब हमारा देश आजाद हो चुका था और 1951 के पहले आमचुनावों की घोषणा हो चुकी थी। उस वक्त भी मुसलमानों के वोट के कारण भारतीय कांग्रेस सत्ता पर काबिज हो पाई थी और आज तक मुसलमानों के रहमों करम पर कांग्रेस की नैया डूबने से बची हुई है। 25 अक्तूबर 1951 में हुए आम चुनावों में कांग्रेस को 489 में से 364 सीटें प्राप्त हुई थी और इसका मुख्य कारण था मुस्लिम उलेमाओं के कदमों की धूल चाटना। पंडित नेहरू, सरदार बल्लभ भाई पटेल और महात्मा गांधी ने देवबंद के वरिष्ठ उलमा मौलाना हुसैन अहमद मदनी (रह.) को जाकर यह आश्वासन दिया कि कांग्रेस को मुसलमानों का वोट मिल जाए तो हम यानि कांग्रेस मुसलमानों को सरकार और प्रशासन में बराबर की भागीदारी देंगे और इसे संवैधानिक दर्जा देंगे।
कांग्रेस के दिग्गजों की बात पर यकीन करते हुए मौलाना हुसैन अहमद मदनी (रह.) ने मुसलमानों से कांग्रेस को जिताने की अपील की ताकि मुसलमानों को भी सरकार व प्रशासन में संवैधानिक दर्जा मिल सके। 21 फरवरी 1952 को जब आम चुनाव का परिणाम घोषित किया गया। कांग्रेस मुसलमानों के वोटों के कारण सत्ता पर पूर्णता काबिज हो गई। कांग्रेस को कुल वोट का 45 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए, यानि चार करोड़ छिहत्तर लाख पैंसठ हजार आठ सौ पचहतर वोट प्राप्त हुए (47,665,875)।
मौलाना हुसैन अहमद मदनी (रह.) खुशी-खुशी इन कांग्रेसी नेताओं के पास मुसलमानों का हक मांगने गए तो पंडित जवाहर लाल नेहरू, सरदार बल्लभ भाई पटेल और श्यामा प्रसाद मुखर्जी (जो कि थे तो कांग्रेसी मगर जनसंघ व भारतीय जनता पार्टी के जन्मदाता माने जाते हैं) ने मुस्कुराते हुए मौलाना हुसैन अहमद मदनी (रह.) से कहा कि राजनीति में भी कभी सच बोला जाता है। इस बात को मौलाना हुसैन अहमद मदनी बर्दाशत नहीं कर सके और उन्हें दिल का दौरा पड़ गया था। बिहार में एक समारोह में मुसलमानों ने मौलाना हुसैन अहमद मदनी को कांग्रेस का पैरोकार कहा था और उन पर मुसलमानों का सौदा करने का आरोप भी लगा दिया गया था। यहां तक कि बिहार में कुछ शरारती तत्वों ने मौलाना हुसैन अहमद मदनी के गले में जूतों का हार भी डाला था। क्योंकि मुसलमान यह समझ रहे थे कि मौलाना ने हमारे वोट तो कांग्रेस को दिलवा दिये लेकिन मुसलमानों को सरकार व प्रशासन में कोई भी हिस्सा नहीं दिया गया।
यह है कांग्रेस की असली हकीकत जिससे आज का मुसलमान अनभिज्ञ है। अपने इन्हीं पूर्वजों के नक्शेकदम पर आज राहुल गांधी भी चल रहे हैं। कभी राहुल गांधी लखनऊ के नदवातुल उलूम में टोपी लगाकर और हल्की सी दाढ़ी बढ़ाकर जाते हैं तो कभी देवबंद में दारूल उलूम में जाकर उलमाओं के कदमों में घंटों बैठे रहते हैं और कहते हैं कि वह यहां वोट के लालच में नहीं अपिुत उलमाओं के पैरों की धूल चाटने आया हूं।
जिस प्रकार कांग्रेस ने 1951 में मुसलमानों को बराबरी का हिस्सा देने की बात की थी इसी तरह अब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी, सोनिया गांधी, सलमान खुर्शीद, दिग्गी राजा, मोहसिना किदवई, अहमद पटेल भी यही कह रहे हैं। ये सभी धूर्त नेता अपने आप को मुसलमानों का सच्चा हितैषी बताने में कोई भी कसर बाकी नहीं छोड़ रहे हैं। अगर बात करें कानून मंत्री सलमान खुर्शीद की जो कि अपने आप को मुसलमानों का पैरोकार व एक सच्चा मुसलमान कहते हैं तो उन्हें शर्म आनी चाहिये कि अपने घर में क्रिसमस डे पर दावत का आयोजन करते हैं। इस दावत में शराब के जाम छलकाए जाते हैं। क्या शराब पीने वाला और पिलाने वाला कभी मुसलमानों का हितैषी हो सकता है। ज्ञात हो कि खुर्शीद अपने आप को भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति डा. जाकिर हुसैन का पुश्तैनी बताते हैं और स्वयं को मुसलमानों का हमदर्द लीडर बताते हैं। क्या जनाब सलमान खुर्शीद मुसलमानों के नाम पर एक बदनुमा दाग हैं?
हिंदुस्तान में 160 मिलियन मुसलमान हैं यहां मुसलमानों की जनसंख्या 13.4 फीसदी है, लेकिन कई लोग यह मानते हैं कि मुसलमानों की संख्या 15 से 18 फीसदी के बीच है। भारत में रहने वाले मुसलमानों की 52.13 फीसदी आबादी सिर्फ उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल में ही सीमित है। उत्तर प्रदेश में चुनाव होने वाले हैं, इसलिए मुस्लिम आरक्षण का मामला एक बार फिर से गरमा गया है। सच्चाई यह है कि कांग्रेस मुलसमानों की चिंता सिर्फ चुनाव के दौरान करती है। हर बार यही होता है कि सेकुलर पार्टियां मुसलमानों का वोट बटोरने के लिए चुनाव के दौरान मुसलमानों से जुड़े मुद्दों को उठाती हैं और चुनाव के बाद भूल जाती हैं। मुसलमान ठगा सा महसूस करते हैं। राजनीतिक दलों की अपनी मजबूरी हो सकती है, लेकिन समझना जरूरी है कि क्या मुसलमानों को आरक्षण की जरूरत है? क्या धर्म को आधार बना कर नीतियां बनाई जा सकती हैं?
मुसलमानों के नेता पार्टी हाईकमान के इशारे पर नाचने वाले नेता बन गए हैं। आरक्षण की बात उठती है तो कोर्ट यह कह कर खारिज कर देती है कि धर्म के नाम पर आरक्षण या नीति नहीं बनाई जा सकती। राजनीतिक दलों का हाल यह है कि कुछ सीधे विरोध में खड़े हैं। और जो साथ होने का दावा करते हैं, वे गिद्ध की तरह मुसलमानों के वोट को नोचने-खसोटने में लगे हैं। कहने का मतलब यह है कि मुसलमानों की सुनवाई कहीं भी नहीं है।
लेखक आदिल हुसैन दिल्ली के स्वतंत्र पत्रकार हैं.






