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चोटी, बाल, बवाल और जान

Vikas Mishra : नौवीं में मेरा एडमिशन गोरखपुर के महात्मा गांधी इंटर कॉलेज में हुआ था। परंपरावादी ब्राह्मण परिवार में जन्म हुआ था। वाह्य और आंतरिक दोनों संस्कार उसी के थे। सिर पर करीब एक फुट लंबी और मोटी चोटी (शिखा, चुरकी कुछ भी कह सकते हैं) हुआ करती थी। उसे बांधकर घुमाकर बालों के बीच करीने से रखते थे, गांव के स्कूल तक तो कोई बात नहीं थी, लेकिन गोरखपुर में पहले दिन से दिक्कतें शुरू हो गईं।

Vikas Mishra : नौवीं में मेरा एडमिशन गोरखपुर के महात्मा गांधी इंटर कॉलेज में हुआ था। परंपरावादी ब्राह्मण परिवार में जन्म हुआ था। वाह्य और आंतरिक दोनों संस्कार उसी के थे। सिर पर करीब एक फुट लंबी और मोटी चोटी (शिखा, चुरकी कुछ भी कह सकते हैं) हुआ करती थी। उसे बांधकर घुमाकर बालों के बीच करीने से रखते थे, गांव के स्कूल तक तो कोई बात नहीं थी, लेकिन गोरखपुर में पहले दिन से दिक्कतें शुरू हो गईं।

साथी बच्चे मेरी चोटी खींच दिया करते थे। उस चोटी के चलते प्रिंसिपल और सारे अध्यापक मुझसे बहुत अच्छा व्यवहार करते थे, कुछ अलग सा, लेकिन मुसीबत होती थी साथियों के साथ। अक्सर चोटी खिंचाई के चलते स्कूल में रो देता था। घर आया, शिकायत की, गुजारिश की-क्या मैं चोटी कटवा सकता हूं। जवाब में थप्पड़ पड़े।  इंटरमीडिएट में वाराणसी आ गया। यहां दिक्कत तो नहीं हुई, लेकिन दोस्त कहते थे कि यार ये सब क्या है, कटवा डालो। दोस्तों के मम्मी पापा की राय उनसे जुदा थी। वो अपने बच्चों को डांटते थे-देखो इसे कहते हैं संस्कार, इसमें संस्कार हैं तुम लोग संस्कारहीन हो चुके हो।

दोस्त इस पर भी बुरा मानते थे कि लो तुम्हारी वजह से हमें डांट पड़ती है। बहरहाल नफा-नुकसान दोनों मिलता था। ग्रेजुएशन के लिए इलाहाबाद विश्वविद्यालय पहुंचा। वहां भी कमोबेश यही हाल था। लंबी चोटी एक अलग पहचान दिलवाती थी, लेकिन दोस्तों के साथ बड़ी मिली जुली प्रतिक्रिया रहती थी। दोस्त मेरे साथ मेरी चोटी को बड़ी मुश्किल से पचा पाते थे। दिल्ली आया, आईआईएमसी में एडमिशन लिया। यहां की दुनिया ही अलग थी। महीने भर मैंने बाद चोटी कटवा दी। यहां तो कुछ नहीं हुआ, लेकिन घर में हाहाकार मच गया। एक भइया ने तो बातचीत बंद कर दी। खैर नौकरी लगी, चार साल बाद मेरठ में फिर से चोटी आ गई। फिर दो तरह की विचारधारा। कुछ चोटी के मुरीद तो कुछ चोटी के दुश्मन।

चोटी मेरी ईमानदारी और सच्चाई को और भी मजबूती देती थी, बल्कि ये कहें कि छवि चमकाती थी। खैर 2005 में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में आने से पहले मेरठ में ही चोटी साफ करवा दी। मेरे डायरेक्टर समेत तमाम मित्र, हितैषी, घर परिवार में फिर हाहाकार। जैसे मैंने किसी का वध कर दिया हो। बहरहाल तब से चोटी नदारद है। मुझे और मेरे जानने वालों को कभी-कभी याद आता है कि सिर पर कभी एक फीट की चोटी थी। और अब 'चोटी का पत्रकार' बनने की संभावनाएं कम ही हैं। आज सुबह का अखबार देखकर मुझे अपनी चोटी की कहानी याद आई। कल दिल्ली में अरुणाचल प्रदेश के एक लड़के के बालों के अंदाज पर लोगों ने पहले उसे जी भरकर चिढ़ाया, फिर पीटा। इतना पीटा कि बेचारे की मौत हो गई। बाल पर बवाल ने एक मासूम की जान ले ली।

आजतक न्यूज चैनल में कार्यरत पत्रकार विकास मिश्रा के फेसबुक वॉल से.

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