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दिल्ली

चौबे से छब्बे बनने के चक्कर में कहीं दुबेजी बनकर न रह जाए ‘आप’

‘आप’ पार्टी ने जो चमत्कार दिल्ली में किया है, वह अन्य प्रांतों में पहले भी हो चुका है। आंध्र में 1983 में ‘तेलुगु देशम’ और असम में ‘अगप’ ने 1985 में इतनी सीटें और वोट प्राप्त कर लिए थे कि अनुपात की दृष्टि से देखा जाए तो वे ‘आप’ से भी आगे निकल गई थीं। इन दोनों पार्टियों के पास ऐसे सुनिश्चित और उत्तेजनात्मक मुद्दे थे कि उनके कारण उनकी विजय होनी ही थी। लेकिन ‘आप’ बिना किसी खास मुद्दे के ही इतनी सीटें और वोट ले आई। इसका मूल कारण था, जनता की थकान। 
‘आप’ पार्टी ने जो चमत्कार दिल्ली में किया है, वह अन्य प्रांतों में पहले भी हो चुका है। आंध्र में 1983 में ‘तेलुगु देशम’ और असम में ‘अगप’ ने 1985 में इतनी सीटें और वोट प्राप्त कर लिए थे कि अनुपात की दृष्टि से देखा जाए तो वे ‘आप’ से भी आगे निकल गई थीं। इन दोनों पार्टियों के पास ऐसे सुनिश्चित और उत्तेजनात्मक मुद्दे थे कि उनके कारण उनकी विजय होनी ही थी। लेकिन ‘आप’ बिना किसी खास मुद्दे के ही इतनी सीटें और वोट ले आई। इसका मूल कारण था, जनता की थकान। 
 
जनता कांग्रेस के भ्रष्टाचार और भाजपा की भेड़चाल से ऊब गई थी। यदि यही ‘आप’ राजस्थान में लड़ लेती तो शायद अपनी सरकार बनाने में भी सफल हो जाती। लेकिन दिल्ली में हुई उसकी जीत ने उससे बहुत-सी आशाएं पैदा कर दी हैं। सबसे पहले तो उसे सारे भारत में फैलना होगा। कम से कम शहरों में तो वह अब आसानी से अपने पांव जमा ही सकती है। दूसरा, उसे यह तय करना होगा कि वह एक चुनावबाज़ पार्टी बनेगी या कोई परिवर्तनकारी पार्टी बनेगी? यदि सत्ता-परिवर्तन ही उसका लक्ष्य बन गया तो तेलुगु देसम और अगप की तरह वह कांग्रेस की कार्बन कॉपी बन जाएगी।
 
दिल्ली में पैदा हुई ‘आप’ दिल्ली में ही अपनी कब्र सजा लेगी। जरुरी यह है कि वह व्यवस्था-परिवर्तनवाली पार्टी बने। वोट लेने में उसने अद्भुत महारत दिखाई है। क्या जनता की मांगों के लिए उतने ही जोरदार तरीके से वह लड़कर भी दिखाएगी? जो रुप कांग्रेस का आजादी के पहले था और समाजवादी पार्टी का डॉ. लोहिया के जीवित रहते था, क्या वह रुप ‘आप’ का बन सकता है? तीसरा, अब वह प्रतिपक्ष में बैठेगी तो क्या दिल्ली में फिर से चुनाव नहीं होंगे? अगर होंगे तो ‘आप’ कहीं चौबे से छब्बे बनने के चक्कर में दुबेजी बनकर न रह जाए? चौथा, क्या यह संभव नहीं है कि ‘आप’ सरकार से बाहर रहकर भाजपा को समर्थन दे और उससे अपने घोषणा-पत्र के प्रावधानों को यथासंभव लागू करवाए? वह एक रचनात्मक प्रतिपक्ष की आदर्श भूमिका क्यों न निभाए? पांचवा, वह चाहे तो कांग्रेस के समर्थन से अपनी सरकार बना सकती है लेकिन तब लोकसभा के चुनाव में उसकी भूमिका धूमिल हो सकती है। 
 
चुनाव के पहले और बाद के माहौल में जमीन-आसमान का फर्क होता है। चुनाव के बाद दुश्मन को भी गले लगाकर उसका दम निकाला जा सकता है लेकिन उसके लिए जबर्दस्त दमगुर्दे की जरुरत है। अब दिल्ली में दुबारा चुनाव होंगे या कोई सरकार बनेगी, यह तय करने का अधिकार सिर्फ ‘आप’ को है। भाजपा को टेका लगाकर ‘आप’ दिल्ली में खुद को ‘रचनात्मक विपक्ष’ बना ही सकती है, साथ-साथ वह अगले आम चुनाव में राष्ट्रीय स्तर पर सबल विपक्ष की तरह भी उभर सकती है। उसे जो भी कदम अगले दो-तीन दिन में उठाना है, वह बहुत फूंक-फूंक कर उठाना है। यह बड़ा नाजुक समय है।
 
लेखक डॉ. वेद प्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार हैं.
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