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छत्तीसगढ़ में बेबस हैं चांउर बाबा

इस बार चांउर बाबा बेबस हैं। देश के लोग छत्तीसगढ के मुख्यमंत्री को डा0 रमण सिंह के नाम से जानते हैं लेकिन छत्तीसगढिया डा0 साहब को चांउर बाबा ही कहते है। चांउर बाबा इनका नाम कैसे पड़ गया, इसकी एक लंबी कहानी हैं। उस कहानी में हास्य भी है, ब्यंग्य भी है और कर्मफल भी। शार्टकाट में यही जान जाइए कि पिछले 2003 के चुनाव के बाद डा0 साहब ने प्रदेश वासियों को भले ही कुछ दिया हो या न दिया हो लेकिन सबके घर के दरवाजे पर चावल की पोटली रखवा दी। चावल को इस प्रदेश में चांउर कहते है। 2 रुपए किलो चावल की राजनीति इस प्रदेश में ऐसी चली कि गरीब को कौन कहे, अपने को अमीर कहने वाले लोग भी चांउर मय हो गए।

इस बार चांउर बाबा बेबस हैं। देश के लोग छत्तीसगढ के मुख्यमंत्री को डा0 रमण सिंह के नाम से जानते हैं लेकिन छत्तीसगढिया डा0 साहब को चांउर बाबा ही कहते है। चांउर बाबा इनका नाम कैसे पड़ गया, इसकी एक लंबी कहानी हैं। उस कहानी में हास्य भी है, ब्यंग्य भी है और कर्मफल भी। शार्टकाट में यही जान जाइए कि पिछले 2003 के चुनाव के बाद डा0 साहब ने प्रदेश वासियों को भले ही कुछ दिया हो या न दिया हो लेकिन सबके घर के दरवाजे पर चावल की पोटली रखवा दी। चावल को इस प्रदेश में चांउर कहते है। 2 रुपए किलो चावल की राजनीति इस प्रदेश में ऐसी चली कि गरीब को कौन कहे, अपने को अमीर कहने वाले लोग भी चांउर मय हो गए।

क्या गरीब  और क्या अमीर सबके बीच चांउर पहुंचा कर डा0 साहब चांउर बाबा कहलाने लगे। इसी चांउर की राजनीति ने बाबा को 2008 का चुनाव जीता दिया और सत्ता की कुर्सी दे दी। लेकिन इस बार उस चांउर की राजनीति फीकी पर गई है। उस चांउर में अब वह बात नहीं रही कि बाबा को फिर सत्ता दिला सके। बाबा इसीलिए परेशान है। लाचार से दिख रहे है। कोई करामात करने को सोंच रहे हैं लेकिन करामात सूझ नहीं रहा है। लगुए भगुए से भी चांउर बाबा ने कुछ करामात करने पर विचार किया लेकिन बात नहीं बनी। पिछले सप्ताह बाबा ने अपने अंतरंगों के साथ बैठक की और चुनाव कैसे जीते इस पर बात की। कोई नया  जीत का फार्मूला गढने की बात की लेकिन कोई निदान नहीं निकला। बाबा दुखी हो गए। बोल भी गए कि इस बार चांउर नहीं चलेगा। जितना मजा मार लिए हो अब भूल जाओ। वो लोग इस बार छोड़ेंगे नहीं। एक वरिष्ठ मंत्री ने सवाल किया कि साहब वो लोग कौन है? बाबा बिफर गए। बोलने लगे कि ‘सब पता चल जाएगा। इतना मासूम मत बनिए। चुनाव हो रहा है और आप इतना भी नहीं समझ रहे हैं कि विपक्षी दल आपको घेरने की पूरी तैयारी कर ली है। जाइए अपना इलाका देखिए। इस्त्री वाले कपड़ों से राजनीति नहीं चमकती है। लोगों के बीच में जाइए।’ बेचारे मूंह लटकाए चले निकल गए।

आप कह सकते हैं कि इस बार के चुनाव में चांउर बाबा के नाम से प्रसिद्ध मुख्यमंत्री रमण सिंह की चुनावी राजनीति सांसत में फंसी हुई हैं। उनको लग रहा है कि उनकी सरकार के विरोध में अंडर करंट चल रहा है। इस सत्ता विरोधी लहर में कांग्रेस को क्या लाभ मिलेगा इसकी कल्पना अभी नहीं की जा सकती लेकिन भाजपा को भारी नुकसान होने की संभावना बताई जा रही है। भाजपा ने अभी हाल में ही एक कंपनी के जरिए गुप्त सर्वे के आंकउ़े इकट्ठा करवाई है। इस सर्वे का रसायन जानने के बाद भाजपाइयों की नींद हराम हैं। सर्वे ने खुलासा किया है कि आसन्न विधान सभा चुनाव में 4 मंत्री तो हर हाल में चुनाव हार जाऐंगे। बाकी के 16 विधायकों की विधायकी भी जाने के संकेत मिले है। ये सर्वे रिपोर्ट पहले तो कुछ दिनों तक पार्टी के बड़े नेताओं तक ही घूमती रही लेकिन जब इस रपट को आम नेताओं के बीच रखी गई तो इस पर राजनीति शुरू हो गई।

जिन विधायकों के नाम हारने वालों की सूची में रखी गई थी उन्होने इस रपट को बकवास बताया और कहा कि पार्टी के लोग पहले से ही  उन्हे टिकट देना नहीं चाह रहे थे  इसीलिए उनके विरोध में इस तरह की रिपोर्ट बनवाई गई है। अब इसके पीछे की राजनीति चाहे जो भी हो लेकिन चांउर बाबा के माथे पर इस रपट के बाद बल पड़ गए है। आडवाणी, राजनाथ सिंह और मोदी से लेकर भाजपा के तमाम केंद्रीय नेताओं ने  चांउर बाबा का गुणगान भले ही  खूब किया हो लेकिन रमण सिंह हकीकत को समझ रहे है। वे मान रहे हैं कि जिस विकास की बात कही जा रही है उसकी सच्चाई कुछ अलग ही है। विकास की कहानी रच कर इस बार चुनाव जितना उतना आसान नहीं है जितना दो चुनावों में चांउर बेचकर वोट उगाहे गए।

तो सच्च ये है कि इस बार के राज्य चुनाव में चांउर और विकास के मुद्दे कारगर सावित नहीं हो रहे है। अब चांउर किसी को नहीं भा रहा और विकास लोग ढ़ूंढते फिर रहे है। राज्य के लोग कहते फिर रहे हैं कि केवल भूखमरी की समस्या राज्य में नहीं रही लेकिन विकास की बात तो सौ फीसदी बेकार है। जब लोगों के जीवन में कोई बदलाव ही नही आए तो विकास किस बात की? आज भी राज्य के बहुत सारे गांव विकास से कोसों दूर है और बेरोजगारी इतनी है कि राज्य की एक बड़ी आवादी माइग्रेशन की शिकार है। अजीत जोगी कहते हैं कि ‘भाजपा झूठ बोलने में माहिर है और उसे भाजपा शासित राज्यों में ज्यादा ही विकास दिखाई पड़ती है लेकिन राज्य के लोग विकास ढूढ रहे है। चुनाव के बाद भाजपा के लोगों को पता चल जाएगा कि विकास की कहानी कितनी खोखली थी। जनता को ज्यादा दिनों तक ठगा नहीं जा सकता। अब केंद्र की खाद्य सुरक्षा योजना के सामने भाजपा की चाडर योजना  कही की नहीं रही।’

चांउर बाबा इस बार कांग्रेसी राजनीति से भी परेशान है। बाबा को लग रहा था कि कांग्रेस की आपसी झगड़े से फिर उनका कल्याण हो सकता है। इस झगड़े को बढाने में कई भाजपाइ नेताओं को भी बाबा ने लगा रखा था। अजीत जोगी को कांग्रेस के विराध में जाने के लिए भाजपा के कई नेताओं ने कई कांग्रेस के कई लगुए भगुए को सिखाया कि जोगी को कांग्रेस से अलग कराओ। इसके लिए कई तरह के लालच भी दिए गए। लेकिन राजनीति के चुतुर खिलाड़ी जोगी और कांग्रेसी सब समझ गए। हालत ये है कि पिछले एक दशक से खंडों में बंटी कांग्रेस पहली दफा एक हो गई है। कांग्रेस की यह एकता रमण सिंह की राजनीति के लिए किसी ग्रहण से कम नहीं है। इस बार भाजपा को अपनी इज्जत बचाने में भी परेशानी हो सकती है। बस्तर जोन में 12 सीटे आती है। पिछले विधान सभा चुनाव में भाजपा ने 11 सीटों पर बाजी मार ली थी। कांग्रेस के कवासी लखवा ही केवल इस जोन से चुनाव जीत पाए थे। लेकिन इस बार की तस्वीर कुछ और ही है। झीरम घाटी हत्याकांड में कई कांग्रेसी नेताओं की मौत के बाद बस्तर की राजनीति बदलती जा रही है। माना जा रहा है कि इस बार के चुनाव में इस जोन से कांग्रेस को कम से कम 6 सीटे मिलने की गुंजाइश है। ऐसा हो गया तो भाजपा की लंका लग सकती है। और ऐसा केवल कांग्रेसी एकता की वजह से हो रहा है।

चांउर बाबा को इस बार एक और परेशानी से सामना हो गया है। सरकार में फैले भ्रष्टाचार और नौकरशाहों की मनमानी की वजह से रमण सरकार विपक्ष के निशाने पर तो हैं ही पांच क्षेत्रिय दलों का साझा मंच ने बाबा की राजनीति पर मानों ब्रेक ही लगा दी है। आदिवासी इलाके से लेकर कई अन्य इलाकों में कुछ जातियों और समुदाओं के बीच राजनीति करने वाली छोटी छोटी पार्टियों ने साझा मंच बनाकर भाजपा की राजनीति को रोक देगी ऐसा लग रहा है।  हलाकि कांग्रेस के पास भ्रष्टाचार के मसले के अलावा अभी कोई बड़ा मुद्दा नहीं है लेकिन कांग्रेस ऐकता और राज्य में हुए भ्रष्टाचार की वजह से भाजपा कमजोर दिख रही है। आगामी चुनाव में भाजपा क्या करेगी या फिर मोदी की राजनीति यहां कितनी सफल होगी यह देखने की बात है लेकिन तय मानिए इस बार चांउर बाबा उस तेवर में नहीं है जिस तेवर में पिछले चुनाव में थे। चांउर ने बाबा को जीत दिलाया था अब वही चांउर बाबा को डर दिखा रहा है।

लेखक अखिलेश अखिल वरिष्ठ पत्रकार हैं और 'हम वतन' अखबार से जुड़े हुए हैं.

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