लोकतंत्र में न्याय पालिका, कार्यपालिका और विधायिका का अपना-अपना महत्वपूर्ण योगदान रहता है… लेकिन कभी-कभी लोकतंत्र के इन स्तंभों के बीच टकराव की स्थिति भी निर्मित होती है.. कुछ ऐसे ही टकराव की स्थिति इन दिनों छत्तीसगढ़ में भी देखने को मिल रही है.. जहां न्याय पालिका और विधायिका के बीच विवाद की स्थिति निर्मित हुई है.. छत्तीसगढ़ विधानसभा की विलोपित कार्यवाही को एक अखबार 'पत्रिका' द्वारा प्रमुखता से छापे जाने के बाद अध्यक्ष के समाचार पत्र पर कार्रवाई को लेकर विधायिका और न्याय पालिका के बीच टकराव की स्थिति बनी हुई है.
छत्तीसगढ़ विधानसभा अध्यक्ष धरमलाल कौशिक ने हाईकोर्ट से प्राप्त नोटिस पर कोई प्रतिवाद प्रस्तुत नहीं करने का फैसला किया है.. उन्होंने कहा है कि चूंकि सभा एवं आसंदी में विधानमंडल में प्रक्रिया या कार्य संचालन का विनियमन करने की या व्यवस्था बनाए रखने की शक्तियां निहित है.. तथा यह कोर्ट की अधिकारिता के अधीन नही है.. इसलिए वे प्रदेश के विधि मंत्री से अनुरोध करेंगे कि वे हाईकोर्ट को संवैधानिक स्थिति और सभा की प्रक्रिया से अवगत कराएंगे.. सोमवार को अध्यक्ष धरम लाल कौशिक कौशिक ने इस संबंध में व्यवस्था देते हुए सदन में बताया कि समाचार पत्र पत्रिका के पत्रकारों को छत्तीसगढ़ विधानसभा सचिवालय द्वारा सभा की पत्रकार दीर्धा के लिए जारी किए गए प्रवेश पत्रों को निरस्त करने संबंधी उनकी 24 मार्च की व्यवस्था को आधार बनाकर हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई थी.
इस याचिका के आधार पर 30 मार्च को रात्रि 8 बजे उन्हें विधानसभा सचिव के जरिए से हाईकोर्ट के डिप्टी रजिस्ट्रार की ओर से एक सूचना प्राप्त हुई, जिसमें यह अपेक्षा की गई है कि रिट पिटीशन को ग्राहृय करने अथवा अंतरिम राहत पर वकील के माध्यम से प्रतिवाद प्रस्तुत किया जाए.. अन्यथा याचिका एक तरफा निर्णित की जाएगी.. विधानसभा अध्यक्ष ने सदन को बताया कि सभा एवं आसंदी में विधानमंडल में प्रक्रिया या कार्य संचालन का विनियमन करने की या व्यवस्था बनाए रखने की शक्तियां निहित हैं.. तथा यह न्यायालय की अधिकारिता के अधीन नहीं है.. उन्होंने कहा है कि वे यहां पर संविद्यान के अनुच्छेद 212 का उल्लेख करना चाहेंगे.. जिसमें कहा गया है कि राज्य के विधानमंडल की किसी कार्यवाही की विधि मान्यता को प्रक्रिया की किसी अभिकथित अनियमितता के आधार पर प्रश्नगत नहीं किया जाएगा.
राज्य के विधानमंडल का कोई अधिकारी या सदस्य जिसमें इस संविद्यान द्वारा इसके अधीन उस विधानमंडल में प्रक्रिया या कार्य संचालन का विनियमन करने की अथवा व्यवस्था बनाए रखने की शक्तियां निहित हैं, उन शक्तियों के अपने द्वारा प्रयोग के विषय में किसी न्यायालय की अधिकारिता के अधीन नहीं होगा.. अध्यक्ष ने कहा है कि उक्त परिपेक्ष्य में याचिका का प्रतिवाद प्रस्तुत नहीं करते हुए वे विधि मंत्री से अनुरोध करेंगे कि उच्च न्यायालय को संवैधानिक स्थिति और सभा की प्रक्रिया से अवगत कराएं.. वे समझते हैं कि सभा इससे सहमत है.. अक्सर न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका में टकराव की नौबत आती है.. जहां एक दूसरे के लक्ष्मण रेखा पार करने को लेकर बहस भी होती है.. लेकिन कौन किसका लक्ष्मण रेखा पार करता है.. इस पर आने वाले दिनों में भी शायद बहस जारी रहे.
आरके गांधी की रिपोर्ट.





