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‘जनता के रंगमंच की नायक स्‍वयं जनता होती है’

सामाजिक सरोकारों से जुड़कर कला कैसे उस सांस्कृतिक आंदोलन में तब्दील हो जाती है, जो हर दौर में सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक रूप से एक बेहतर दुनिया के निर्माण में सतत प्रयत्नशील रहता है, यह भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) के 70 वर्ष के इतिहास में बखूबी दिखाई देता है। ‘जनता के रंगमंच की नायक स्वयं जनता होती है’ सूत्रवाक्य के साथ चलने वाले इप्टा ने इस 25 मई को ‘जन संस्कृति दिवस’ के रूप में अपना 70वाँ स्थापना दिवस मनाया। इस अवसर पर हिन्दी भवन में इप्टा की दिल्ली राज्य समिति द्वारा आयोजित कार्यक्रम में शामिल संस्कृतिकर्मियों में इप्टा की सांस्कृतिक-वैचारिक विरासत को आगे बढ़ाने का जज़्बा दिखाई दिया।

सामाजिक सरोकारों से जुड़कर कला कैसे उस सांस्कृतिक आंदोलन में तब्दील हो जाती है, जो हर दौर में सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक रूप से एक बेहतर दुनिया के निर्माण में सतत प्रयत्नशील रहता है, यह भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) के 70 वर्ष के इतिहास में बखूबी दिखाई देता है। ‘जनता के रंगमंच की नायक स्वयं जनता होती है’ सूत्रवाक्य के साथ चलने वाले इप्टा ने इस 25 मई को ‘जन संस्कृति दिवस’ के रूप में अपना 70वाँ स्थापना दिवस मनाया। इस अवसर पर हिन्दी भवन में इप्टा की दिल्ली राज्य समिति द्वारा आयोजित कार्यक्रम में शामिल संस्कृतिकर्मियों में इप्टा की सांस्कृतिक-वैचारिक विरासत को आगे बढ़ाने का जज़्बा दिखाई दिया।

कार्यक्रम की शुरुआत हुई दिल्ली में इप्टा की संस्थापक सदस्य सुश्री सरला शर्मा से बातचीत की वीडियो प्रस्तुति के साथ। 93 वर्षीय सरला शर्मा स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों के कारण कार्यक्रम में शामिल नहीं हो सकीं थीं। इप्टा के राष्ट्रीय महासचिव जितेन्द्र रघुवंशी व दिल्ली इप्टा के प्रतिनिधिमंडल ने उन्हें घर जाकर सम्मानित किया और दिल्ली में इप्टा की शुरुआत व गतिविधियों पर बातचीत की। जन संस्कृति दिवस के अवसर पर सुश्री शर्मा ने देशभर के सभी साथियों को शुभकामना संदेश देते हुए कहा कि जनगीत शुरुआत से ही जनता के बीच पहुँचने और संवाद स्थापित करने का सशक्त माध्यम रहे हैं, जो इप्टा की पहचान भी हैं। आज गीत-संगीत में जिस तरह का सतहीपन और फिल्मीपना लोगों के बीच मौजूद है, उससे बचते हुए ऐसे गीत रचे जाने की ज़रूरत है, जो लोगों को अपनी बात लगें और लोग उन्हें विचार की तरह लें।

उन्होंने कहा कि आज जबकि जन संस्कृति के इस आंदोलन को आगे बढ़ा रहे तमाम संस्कृतिकर्मियों पर मौकापरस्त ताक़तें कई तरह से हमले कर इसे ख़त्म करने की कोशिश में लगी हुई हैं, ऐसे में ज़रूरी है कि हम वह हर संभव प्रयास करें जो इन कोशिशों को नाकाम कर इस आंदोलन को आगे बढ़ाएं। इसके लिए हमारे बीच के लेखक, गीतकार, संगीतकार, रंगकर्मी सभी को सम्मिलित रूप से प्रयास करना होगा। सुश्री सरला शर्मा के हुई बातचीत के महत्वपूर्ण अंश वीडियो माध्यम द्वारा प्रदर्शित किए गए। कार्यक्रम को आगे बढ़ाते हुए इप्टा के बिल्कुल नये साथियों ने विपुल पचौरी के निर्देशन में ‘कांधे धरी है पालकी’, ‘बता मोरे रामा बता मोरे अल्ला’, ‘अब मचल उठा है दरिया’ व ‘हल्ला हो, मन में हमारे हल्ला हो’ आदि जनगीतों की प्रस्तुति दी। इप्टा की वार्षिक पत्रिका ‘इप्टानामा’ के पहले अंक का विमोचन भी इस कार्यक्रम में किया गया।

यह वर्ष इप्टा की शुरुआत के समर्पित साथी और मशहूर अभिनेता बलराज साहनी का जन्म शताब्दी वर्ष भी है। बलराज साहनी के इप्टा से जुड़ाव और उनकी भूमिका को रेखांकित करते हुए अर्थशास्त्री व इप्टा मध्य प्रदेश की अध्यक्ष मण्डल सदस्य डॉ. जया मेहता ने एक आलेख पढ़ा। बीबीसी की नौकरी छोड़कर पूरी तरह इप्टा का सक्रिय कार्यकर्ता बन जाना, मज़दूर वर्ग के साथ काम, बंगाल के अकाल और नाविक विद्रोह के दौरान की उनकी गतिविधियों और ‘धरती के लाल’, ‘दो बीघा ज़मीन’ आदि फिल्मों से जुड़े संदर्भों का ज़िक्र करते हुए डॉ. जया मेहता ने बलराज साहनी के जीवन के कई ऐसे पहलुओं पर रोशनी डाली, जो उन्हें महज़ एक अभिनेता होने के अलावा सामाजिक सरोकारों से जुड़े रंगकर्मी, राजनीतिक कार्यकर्ता, विचारक और जन पक्षधरता के सिपाही के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं। दिल्ली इप्टा के प्रांतीय सचिव मनीष श्रीवास्तव ने इप्टा की गतिविधियों व वैचारिक धरातल की बात करते हुए कहा कि इप्टा से जुड़कर चीजों को देखने का जो नज़रिया हमें मिला है, जो अनुभव हमने साझा किए हैं और सरला जी व बलराज साहनी जैसे तमाम साथियों की गतिविधियों और अनुभवों से जो सीख और ऊर्जा हमें मिली है, उससे लगता है कि हमारा अपना जीवन 70 वर्ष का हो गया है और यही अनुभव व ऊर्जा हमें निरंतर आगे बढ़़ते रहने की समझ व हौसला दोनों देते हैं।

वरिष्ठ आलोचक व प्रलेसं के राष्ट्रीय अध्यक्ष मंडल सदस्य विश्‍वनाथ त्रिपाठी ने सांस्कृतिक आंदोलन की परंपरा पर अपनी बात रखते हुए कहा कि कला का कोई भी रूप हो वह जीवन से जुड़ा है। जिस तरह किसी गीत की धुन सृजन में गुनगुनाई जाती है, कोई नाटक या कहानी लिखते हुए उसके पात्रों के जीवनानुभवों से गुज़रा जाता है उसी तरह जीवन की बेहतर परिस्थितियों के निर्माण और बदलाव का प्रयास होता है। जब कला इस प्रयास से जुड़ जाती है तो सांस्कृतिक आंदोलन की शुरुआत होती है और आंदोलन की परंपरा बनती है। आंदोलन की यही परंपरा इप्टा है। इसी बात को आगे बढ़ाते हुए इप्टा के राष्ट्रीय महासचिव जितेन्द्र रघुवंशी ने कहा कि 1943 के शुरू हुए इप्टा के बारे में कुछ लोगों का मानना है कि 1960 के दशक तक यह समाप्त हो गया। इस धारणा के चलते इप्टा का इतिहास 60 के दशक तक सीमित कर दिया जाता है, लेकिन ऐसा है नहीं।

वैचारिक धरातल पर जन्में सांस्कृतिक आंदोलन इस तरह समाप्त नहीं हो जाते। भले ही बीच में कुछ समय के लिए हमारी गतिविधियाँ कुछ धीमी गति से आगे बढ़ी हों, लेकिन 80 के दशक से आज तक पूरे देश में मौजूद इप्टा की इकाईयाँ निर्बाध रूप से सक्रिय हैं और अपनी गतिविधियों को पूरी गति से अंजाम दे रही हैं। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज जब हम इप्टा का 70वाँ स्थापना दिवस मना रहे हैं, तब कई राज्यों में इप्टा की इकाईयों में नाट्य शिविर संचालित हैं, जिनमें जनता के सरोकारों से जुड़े रंगकर्म की बुनियाद मजबूत की जा रही है। उन्होंने कहा कि आज के इस आयोजन में शामिल इप्टा व इप्टा के सरोकारों से जुड़े तमाम साथियों की मौजूदगी इस बात को स्पष्ट करती है कि हमारे इस वैचारिक-सांस्कृतिक आंदोलन का भविष्य भी हमारे इतिहास की तरह ही सार्थक और गौरवपूर्ण होगा। इप्टा के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य अमिताभ पाण्डे ने दिल्ली में इप्टा की आगामी गतिविधियों के बारे में संक्षिप्त जानकारी दी और कहा कि अनुभवी साथियों का मार्गदर्षन और नये साथियों की ऊर्जा देखकर हम आष्वस्त हैं कि इप्टा की जनपक्षधरता की परंपरा को आगे बढ़ाने में हम सफल होंगे।

कार्यक्रम के अंतिम चरण में भारतीय महिला फेडरेशन की साथी सुश्री दीप्ति ने कविता पाठ किया और इप्टा जामिया के साथी फैयाज़ द्वारा मोहम्मद वसीम के निर्देशन में माइम (मूकाभिनय) प्रस्तुत किया गया। इसके उपरांत इप्टा के साथी और फिल्मकार एम. एस सथ्यू के जीवन और कलाकर्म पर मसूद अख़्तर निर्मित वृत्तचित्र ‘कहाँ-कहाँ से गुज़रे’ प्रदर्शित किया गया। कार्यक्रम का समापन करते हुए दिल्ली इप्टा के प्रांतीय सचिव मनीष श्रीवास्तव ने कार्यक्रम में शामिल हुए सभी साथियों का धन्यवाद ज्ञापन किया। कार्यक्रम में इप्टा की जेएनयू, जामिया व केन्द्रीय इकाई के साथियों के अलावा कई अन्य रंगकर्मी, चित्रकार, फिल्मकार व पत्रकार भी सम्मिलित हुए।

रजनीश साहिल की रिपोर्ट.

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