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सुख-दुख...

जनसंदेश टाइम्‍स की किश्ती डूबती रही और हम कामयाब होते रहे

विगत 20 मार्च को अपने अख़बार के प्रधान संपादक सुभाष राय जी का मुख्य पृष्ठ पर लिखा एक लेख पढ़ा "हम होंगे कामयाब"…..तब से मन में कहीं कुछ छटपटा रहा था। दरअसल सुभाष जी पिछले वर्ष इस संस्था को छोड़कर जाने के बाद अब पुनः लौटे है, आप एक महान पत्रकार है और आपके आने से संस्था गौरवान्वित होगी इसमें मुझे और किसी भी व्यक्ति को कोई संदेह नहीं होगा, परन्तु मुझे आपका लिखा ये लेख खटका जरुर …क्यों ??

विगत 20 मार्च को अपने अख़बार के प्रधान संपादक सुभाष राय जी का मुख्य पृष्ठ पर लिखा एक लेख पढ़ा "हम होंगे कामयाब"…..तब से मन में कहीं कुछ छटपटा रहा था। दरअसल सुभाष जी पिछले वर्ष इस संस्था को छोड़कर जाने के बाद अब पुनः लौटे है, आप एक महान पत्रकार है और आपके आने से संस्था गौरवान्वित होगी इसमें मुझे और किसी भी व्यक्ति को कोई संदेह नहीं होगा, परन्तु मुझे आपका लिखा ये लेख खटका जरुर …क्यों ??

इस पर जरुर दो लाईन लिखूंगा और उम्मीद करूँगा कि ये लाईनें यदि आप तक पहुचेंगी तो आप "क्षमा बड़न को चाहिए.." वाली कहावत मेरे ऊपर चरितार्थ करेंगे। "हम होंगे कामयाब ….." हिन्दीभाषियों को सर्वाधिक "प्रेरित" करने वाली कुछ लाईनों में एक है। हर व्यक्ति जब कुछ नया शुरू करता है, कुछ कठिन करने का प्रयास करता है या ये मान ले कि लक्ष्य कठिन है और उसकी प्राप्ति और भी कठिन तो ये लाईनें उसे "पाजिटिव-विचारों" से भर देती है। सच्चाई सब जानते है लेकिन भारतीय होने के नाते "भ्रम" में रहना और रखना इस देश के शीर्षस्थ लोगों की आदत है और ये लाईनें उनकी इस भ्रम-जाल का बेहतरीन आवरण बनती है।

मैंने सोचा कि आखिर कौन है वो महान भारतीय, जिसने इन जादुई लाईनों की रचना की, तो पता चला कि साहब!! इसकी कल्पना तो पश्चिमी देशों से आयातित है यानि इसकी मौलिक सोच भी अपने देश की नहीं है। अमेरिका में मार्टिन लूथर किंग ने अपने प्रसिद्ध भाषण "I have a Dream" में "we shall overcome …" के रूप में इसे एक अंग्रेजी कविता के रूप में गाया और गिरिजा कुमार माथुर ने उसका हिंदी अनुवाद किया "हम होंगे कामयाब"….फिल्म 'जाने भी दो यारो (1983)" से यह भारत में घर-घर तक पंहुचा ….अब सोचिये जब सोच ही मौलिक नहीं है तो इन जादुई लाईनों का प्रभाव हम पर क्या पड़ेगा ….हम भी आयातित भ्रम-जाल के ही शिकार भर रह जायेंगे। रोजी-रोटी के फेर में पिछले लगभग डेढ़ वर्ष के दौरान मेरे और आप (सुभाष जी) के बीच जो कामन अख़बार है और जिसके भविष्य के संदर्भ मे आपने इन लाईनों को लिखा उसके बारे में मैं इतना तो कह ही सकता हूँ …आप शायद एक वर्ष के अन्तराल पर आये इसलिए अपने लेख के लिए आप को ये लाईनें आकर्षित कर गयी।

जनसंदेश टाईम्स गोरखपुर में काम करते हुए और अब आप का लेख पढ़ने के बाद कोई मुझे इस पर संसोधन करने को कहे तो वो शायद कुछ ऐसा होगा ……."किश्ती डूबती रही और हम कामयाब होते रहे।"…. सुभाष जी!! अंग्रेजी में एक शब्द है "मोराल", आज 24 मार्च को अगर ईमानदारी से कहूँ तो काम करने का मोराल अब टूट रहा है। समस्या क्या है इस खुले मंच से नहीं कह सकता ….क्योंकि अभी भी कहीं एक जिम्मेदार कर्मचारी मेरे अन्दर जिन्दा है, जिसका संस्थान में होना किसी भी संस्थान द्वारा शोषण करवाने के लिए एक जरूरी फैक्टर है। दुनिया को शोषण और अनीति से बचाने के लिए हमेशा खड़ा रहने वाले मीडिया-कर्मी भी इन्सान है और इन्हें इंसानी कमियों का शिकार देख कर "फील-गुड" हुआ, वरना (पिता चूँकि आकाशवाणी के बहुत बड़े अधिकारी थे इसलिए) यही सुन-सुन कर बड़ा हुआ था कि आह मीडिया की नौकरी में कितना "चार्म" है। वो "चार्म" भी देख लिया। होली आने वाली है ….तीन माह बीतने वाली है …..इस सबके बाद कुछ कमी रह गयी थी तो अब आपका "हम होंगे कामयाब" गाना भी बजने लगा है ……. देखिये आगे-आगे होता क्या क्या है…. भगवान् करें सब शुभ हो और मेरे संदेह गलत साबित हो, इससे मुझे ख़ुशी मिलेगी, वैसे भी संस्कार ऐसे नहीं मिले कि बड़ों की आलोचना में सुख मिलता हो।

अजीत कुमार राय के फेसबुक वाल से साभार.

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