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जनसंपर्क विभाग हुआ सख्‍त, पांच पत्रकारों की मान्‍यता निरस्‍त

'देर आयद, दुरुस्त आयद' की उक्ति को बैतूल जनसंपर्क विभाग ने अमल में लाते हुए उन लोगों को सबक सिखाया है जिन्होंने येन- केन- प्राकरेण  सेटिंग से अधिमान्यता हासिल कर ली थी और कार्ड टांग कर उन लोगों को चिढ़ाते थे, जो नियम से इसकी लालसा लिए बैठे थे. ऐसे पांच लोगों के अधिमान्यता कार्ड निरस्त करने की कार्रवाई की गयी है. इस कार्रवाई का पत्रकारों ने स्वागत किया है.

'देर आयद, दुरुस्त आयद' की उक्ति को बैतूल जनसंपर्क विभाग ने अमल में लाते हुए उन लोगों को सबक सिखाया है जिन्होंने येन- केन- प्राकरेण  सेटिंग से अधिमान्यता हासिल कर ली थी और कार्ड टांग कर उन लोगों को चिढ़ाते थे, जो नियम से इसकी लालसा लिए बैठे थे. ऐसे पांच लोगों के अधिमान्यता कार्ड निरस्त करने की कार्रवाई की गयी है. इस कार्रवाई का पत्रकारों ने स्वागत किया है.

एक समय में अधिमान्यता देने की तो दुकान जनसंपर्क विभाग भोपाल में खुली थी. बस पांच हजार का खर्च आता था. ऐसे कई लोग हैं, जिन्होंने पांच हजार देकर कार्ड लिया. जनसंपर्क सूत्रों की माने तो अपनी पहुँच और अधिमान्यता सेल में चढ़ावा चढ़ा कर अधिमान्यता हासिल करने वालों को मुंह की खानी पड़ी. जिन पांच लोगों के अधिमान्यता पर ग्रहण लगा है उनमें दीपक मेहर्न्वर, हरिओम शुक्ल, राजेंद्र मिश्र, अनिल मिश्र, अनिल वर्मा हैं.

हालाँकि अनिल मिश्र ने ये खबर मिलते ही भोपाल जाकर मन्त्र मारा और गोटी फिट कर फिर से कार्ड हासिल कर लिया है. बाकी लोगों के कार्ड रीन्‍यूवल नहीं हुए. वैसे जिन लोगों के कार्ड रीन्‍यूवल होने से अटके हैं उनका मुख्य पेशा पत्रकारिता है भी नहीं. अब जान लीजिये इनके कामों को. पहले दीपक की कुंडली. दीपक खुद लिखता नहीं है. उसका संकल्प है कि हर उस व्यक्ति को अखबार का मालिक बना दूंगा जो भीख मांगकर गुजारा करता है. यकीनन वो अपने मकसद में कामयाब भी हो रहा है. पांच हजार में अखबार का शीर्षक दिलाया जा रहा है.

दूसरा नाम हरिओम, ये महाशय एनजीओ की दुकान चलाते और चलवाते हैं. बड़ा काम है इनका. धन की कमी नहीं है. इसलिए अधिमान्यता लेने में खर्च आसानी से कर देते हैं. अब राजेन्द्र मिश्र, खुद एक पम्‍पलेटनुमा पेपर चलाते थे. आजकल वो भी बंद है. इन्हें एनजीओ का ज्ञान है और जिला पंचयत की मेहरबानी से काम मिला हुआ है. ऐसे ही अनिल मिश्र हैं. एक्सपोर्ट का काम है. और अनिल वर्मा अखबारों के फोटो खींचते रहे. फिर वीडियो मैगजीन से काम चलाते रहे.

विभाग ने इस तरह से पत्रकारिता को दीमक मुक्त करने की शुरुआत की है. ये बात जुदा है कि अधिमान्यता उस समय कैसे दे दी गयी जब ये लोग नियम में कहीं से शायद ही फिट बैठते होंगे. ऐसे और अधिमान्यता कार्डधारी हैं जिन्होंने पत्रकारिता का केवल नाम ही सुना है, इसकी तपन महसूस नहीं की. बस मज़े लेने के लिए इस पेशे में आ गये हैं. जनसंपर्क विभाग के इस कार्रवाई के बाद ऐसे पत्रकारों में हड़कम्‍प मचा हुआ है. 

दिलीप सिकरवार

बैतूल

9425002916

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