Sanjay Sinha : बॉस पर लिखना आसान काम नहीं है। एक तरह से मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डालने की तरह है। खास तौर पर तब जब Sanjaya Kumar Singh ने मेरे बॉस होने का मुझे अहसास करा दिया है। लेकिन फिर लगता है कि सर ओखल में देने के बाद मूसल की परवाह नहीं करनी चाहिए। ऐसे में मैं बतौर बॉस कैसा हूं, इस बारे में मैं क्यों चिंता करूं?
मैं तो अपने पुराने वरिष्ठ को याद कर रहा हूं, उनकी आंखों की चमक को बयां करने जा रहा हूं। आईए आज आपको एक ऐसे वरिष्ठ से मिलाता हूं जिनके बारे में मैं इसलिए टिप्पणी नहीं कर रहा कि वो बुरे थे, और ना ही इसलिए कर रहा हूं कि वो अच्छे थे। वो जो भी थे अद्भुत थे। अगर फिल्मी भाषा में उन्हें मुझसे कहने का मौका मिलता तो मेरे लिखे पर वो यही कहते, "मुन्ना, लिखना बच्चों का खेल नहीं है…।"
मैं जनसत्ता में उपसंपादक बन चुका था, और 'वो' मानने को तैयार ही नहीं थे कि हमारे जैसे तुच्छ उपसंपादक की संपादकीय पन्ने पर लिखने लायक कोई राय भी हो सकती है। वो दुनिया जहान के लोगों से लिखवा लेते, लेकिन घर की मुर्गी उनके लिए दाल बराबर भी नहीं थी। लेकिन उनकी एक खासियत थी। वो लिखने के लिए कभी मना नहीं करते, और ना ही ये कहते कि नहीं छापूंगा। लेख ले लेते, और कुछ दिनों तक टहलाते और फिर कहते कि अरे यार तुम्हारा लेख पता नहीं कहां रख दिया, मिल ही नहीं रहा। जब चार बार ऐसा हो गया तो मुझे बुरा लगने लगा, लेकिन थे मुझसे बहुत सीनियर ऐसे में कहता भी क्या और करता भी क्या?
उन्हीं दिनों इंडियन एक्सप्रेस के हमारे एक साथी शेखर झा की दिल्ली में ही आईटीओ के पास एक सड़क हादसे में मौत हो गई। उनकी मौत से मैं बहुत व्यथित हुआ और मैंने एक लेख लिखा कि आज सिर्फ शेखर झा नहीं मरा है, आज उसके माता-पिता, उसकी पत्नी और उसकी एक छोटी बेटी भी मर गई है। शेखर की उम्र बहुत कम थी। उन दिनों दिल्ली में 'लाल बसों' का कहर था, ऐसे में मैंने लिखा कि पुलिस रिकॉर्ड में बेशक एक मौत दर्ज है, लेकिन हकीकत में शेखर जैसों की मौत के बाद उनके बूढ़े मां-बाप को, उनकी पत्नी को और दुधमुही बेटी को भला ज़िंदा कौन मान सकता है?
मैं चाहता था कि लेख जनसत्ता के संपादकीय पन्ने पर छप जाए इसलिए मैंने उन संपादक जी से बात की। उन्होंने कहा लिख दो। लिख कर ले गया तो बहुत भावुक होते हुए उन्होंने लेख रख लिया। लेकिन चार दिन बीत गए, लेख पुराना पड़ने लगा तो मैं उनके पास चला गया। बहुत देर तक वो इधर-उधर की बातें करते रहे, फिर मेरे याद दिलाने पर उन्होंने सारे कागज छान मारे, लेकिन लेख नहीं मिला। उन दिनों हाथ से लिखा जाता था, कोई फोटो कॉफी करा कर रखता नहीं था, और उस 'बॉस जी' ने मुंह हिला कर बोल दिया कि यार कहीं उड़ गया तुम्हारा लेख।
मुझे कुछ सूझा ही नहीं। भाग कर अपने टेबल तक गया, पांच-छह पेपरवेट उठा कर लाया और उनके सामने रख दिया। उन्होंने पूछा कि ये क्या है? मैंने सपाट भाव में कहा कि सर पेपरवेट।अब कागज़ इससे दबा कर रखिएगा, ताकि उड़े नहीं। वो चुप रह गए। लेकिन लेख ना मिला, ना छपा। खैर, मोबाइल फोन बाजार में आ गए थे और मैं प्रिंट से निकल कर इलेक्ट्रानिक में जा चुका था। एकदिन मैंने एक फोन का विज्ञापन देखा- ये नोकिया के किसी फोन का विज्ञापन था, जिसमें एक नौजवान हाथ में स्मार्ट सा फोन लिए नौकरी पाने की उम्मीद में इंटरव्यू के लिए एक दफ्तर में पहुंचता है। इंटरव्यू लेने वाला बॉस जब उसके हाथ में उस 'नए' फोन को देखता है तो उसे लगता है कि अगर इसे नौकरी मिल गई तो इस फोन के बूते दफ्तर की सारी लड़कियां इसी की दीवानी हो जाएंगी, ये बहुत लोकप्रिय हो जाएगा, और हो सकता है कि ये बॉस बन जाए और उनकी नौकरी चली जाए। जाहिर है स्मार्ट फोन की जलन में उन्होंने कहा, "सॉरी, अभी जगह नहीं है।"
आधे मिनट के इस विज्ञापन के बहुत मायने थे। मैं समझ रहा था कि बात फोन की नहीं है, बात ये है अगर आप अपने बॉस से ज्यादा स्मार्ट होंगे तो आप उसकी आंखों में खटक सकते हैं, और तब उन आंखों में रिश्ते तलाशने का मंत्र मेरे पास नहीं। हां, मैं ये कह सकता हूं कि अच्छा काम करने वालों से हर बॉस जले जरुरी नहीं, लेकिन अगर कोई जले तो यही सोच कर खुश होना चाहिए कि जब एक 'बल्ब' जलता है तो कितनी रोशनी होती है, जाहिर है जब कोई आदमी आपसे जलेगा…तो यकीनन आपकी ज़िंदगी भी रौशन होगी।
आजतक न्यूज चैनल में कार्यरत पत्रकार संजय सिन्हा के फेसबुक वॉल से.






