Sanjay Sinha : जनसत्ता छोड़ कर ज़ी न्यूज़ ज्वायन कर चुका था। कागज़-कलम और कम्यूटर की जगह कैमरा और वीडियो मशीन पर काम करने लगा था। रिपोर्टिंग में था, रोज शूट करके लाता। बॉस को बताता कि ये शूट किया, वो शूट किया, इस तस्वीर को देखिए, उस तस्वीर को देखिए… लेकिन बॉस मेरे दिखाए विजुअल से खुश नहीं होते। बहुत परेशान रहता कि बॉस को कौन से विजुअल दिखाऊं कि उनका दिल जीत सकूं।
बहुत मेहनत करता। कई तरह के प्रयोग करता, कैमरे से खेलता, लेकिन बात बनती ही नहीं थी। उसमें भी सबसे दुखद बात ये थी कि मेरे शूट किए विजुअल को मेरा एक जूनियर उसी बॉस को दिखाता और बॉस उसे देख कर कहते, 'वाह! यही वो विजुअल है जो मैं चाहता था।'
मैं बहुत हैरान होता कि आखिर मेरे दिखाने और बताने में क्या कमी रह जाती है? और मेरा वो जूनियर ऐसा कौन सा जादू करता है जो उसके दिखाए विजुअल को वाहवाही मिलती है।
बहुत परेशानी के बीच एकदिन अपने उस जूनियर को मैं चाय पिलाने ले गया। बातचीत में उससे पूछना चाहा कि यार जिस सीन को मैं दिखलाता हूं उस पर बॉस खुश नहीं होते, कभी वाह नहीं कहते, लेकिन तुम जो विजुअल दिखाते हो उसे देख कर उनके मुंह से निकलता है वाह! आखिर तुमने कौन सी घुट्टी पिला रखी है, जो तुम्हें वाहवाही मिलती है और मुझे नहीं।
मेरा जूनियर थोड़ा झेंपता रहा। बात टालने की कोशिश करता रहा, फिर उसने बहुत मन मार कर सच बता दिया।
आईए आपको बिना लाग लपेट के उस सच को बता देता हूं-
मेरा जूनियर मुझे बता रहा था कि सर आप बहुत शानदार स्टोरी करके लाते हैं। लेकिन आप अपनी कहानियां जब बॉस को दिखा रहे होते हैं तो आपका ध्यान विजुअल और कहानी पर होता है, जबकि मैं जब वही विजुलअल बॉस को दिखाता हूं तो मेरा ध्यान बॉस के चेहरे पर होता है। बॉस विजुअल देख रहे होते हैं, और मैं उनकी आंखें।
जिस तस्वीर पर मैं बॉस की आंखों में चमक देखता हूं, वहीं रुकता हूं और कहता हूं कि सर यही है वो खास विजुअल। और बॉस मान जाते हैं, कि हां यही है वो खास विजुअल…और मुझे मिल जाता है वाह!
तो सर कल से आप भी अपना ध्यान कहानी और तस्वीर से ज्यादा बॉस की निगाहों पर केंद्रित कीजिए। बॉस की पसंद को पहचानिए, उनकी आंखों की चमक को पढ़ना सीखिए, और देख लीजिएगा कि आपको वाहवाही मिलती है या नहीं?
बहुत संक्षेप में समझाए गए इस फॉर्मूले को मैंने कई बार इस्तेमाल किया। और जब-जब किया वाह-वाह सुना।
आज की इस कहानी का अर्थ इतना ही है कि बॉस की आंखों को अगर आप पढ़ने लगे तो फिर नौकरी में हां, हां है…और अगर सिर्फ अपने काम पर मुग्ध होते रहे तो ना – ना है। आजमा कर देखिए, दादी-नानी के नुस्खे की तरह कारगर होगा।
आजतक न्यूज चैनल में कार्यरत पत्रकार संजय सिन्हा के फेसबुक वॉल से.






