नए साल की शुरूआत में ही फिल्म 'नया पता' की स्क्रीनिंग नई खुशी लेकर आने वाली है. 'नया पता' भोजपुरी में बनने वाली ऐसी पहली फिल्म है जिसका निर्माण crowd funding (जन सहयोग) से किया गया है.
इस फिल्म को रिलीज करने के लिए पिछले 2 साल से प्रयास किये जा रहे थे. 'नया पता' भोजपुरी फिल्मों से काफी अलग है. 'नया पता' बस एक फिल्म न होकर एक सपनों की एक यात्रा है और यह सपना है-पवन भाई का. मुझे खुशी है कि मैं उनका मित्र हूं.
पवन भाई से मेरी दोस्ती 3 साल पहले फेसबुक पर हुई थी लेकिन जल्द ही यह फेसबुक की दुनिया से असल दुनिया में पहुंच गई और यह दिनों-दिन गाढ़ी होती गयी. फिल्म बनाने को लेकर पवन भाई शुरू से सपने देखा करते थे. जीवन के उतार-चढाव के बीच संयोग ने दस्तक दी और पवन भाई मुंबई पहुंच गए. वहां वे नितिन चंद्रा के सहयोगी के रूप में काम करने लगे. इस बीच फोन पर हमारी बातचीत होते रहती थी. कुछ दिनों बाद अचानक एक दिन रात के २ बजे के करीब पवन भाई का फोन आया. मैं उस समय पढ़ रहा था. पवन भाई ने फोन उठाते ही कहा कि -'पुनीत, मैंने अभी-अभी एक कहानी लिखी है', मैंने कहा-तो जल्दी सुनाइए. पवन भाई ने पूरी कहानी फोन पर सुनाई.
कहानी का अंत तब तक नहीं लिखा गया था. पहली बार में ही कहानी दिलो-दिमाग में छा गई. इसके अंत को लेकर हमने बहुत देर तक विचार-विमर्श किया. उस समय इस कहानी पर फिल्म बनाने का कोई इरादा नहीं बना था. थोड़े दिनों के बाद जब यह कहानी थोड़े फेरबदल के बाद पूरी हुई तो लगा कि इस पर फिल्म बन सकती है. कुछ समय बाद मैं गांव गया था, उस दौरान पवन भाई भी छपरा अपने घर आये हुए थे. पूरी कहानी सुनने की योजना बनी और पवन भाई छपरा से दरौंदा (मेरे गांव से नजदीक का स्टेशन) पहुंचे मुझे कहानी सुनाने के लिए. वहीं प्लेटफार्म पर बैठकर कहानी सुनी मैंने. फिर योजना पर बहुत देर तक विचार हुआ कि कैसे फिल्म बनाई जा सकता है. धीरे-धीरे मन बनता जा रहा था फिल्म बनाने को लेकर. स्क्रिप्ट तैयार की पवन भाई ने लेकिन अभी आत्मविश्वास तैयार होना बाकी था. पवन भाई ने फिल्मी दुनिया के लोगों से मिलना-जुलना शुरू किया और कहानी पर उनसे राय लेनी शुरू की. जिसने भी कहानी सुनी, उसकी तारीफ की और फिल्म बनाने के बारे में अपने अमूल्य सुझाव दिए. इस तरह धीरे-धीरे आत्मविश्वास का भी निर्माण होने लगा था. जब इंसान कोई काम करने की शुरुआत करता है तो संशय के बादल उसे घेरे रहते हैं लेकिन जैसे ही उस काम के बारे में सकारात्मक प्रतिक्रियाएं या तारीफ मिलनी शुरू होती है तो संशय के बादल छंटते जाते हैं और वह दुगुने उत्साह से खुले आसमान के सफर पर निकल पड़ता है.
पवन भाई फिल्म बनाने का पक्का निर्णय ले चुके थे और दोस्तों का समर्थन इस निर्णय को मजबूत बनाता जा रहा था. लेकिन फिल्म बनाना इतना आसान होता तो न जाने कितनी फिल्में और कितने फिल्मकार होते. मूलभूत जरूरत 'पैसा' मूलभूत समस्या के रूप में सामने खड़ा था. और हमारे पास कोई समाधान नहीं था. हम मध्यवर्गीय परिवार के लोग सपनें तो बड़े-बड़े देखते हैं, उसको पूरा करने की काबिलियत, हौसला और जुनून भी रखते हैं पर संसाधनो की कमी हमें वापस जमीन पर ला पटकती है.
जन सहयोग से फिल्म बनाने की बात दिमाग में थी तो लेकिन लगता था कि हमें कोई पैसा क्यों देगा? वो भी तब जब वापस मिलने की कोई गारंटी भी न हो?
उसी बीच पवन भाई की मुलाकात ' I AM ' फिल्म के निर्देशक ओनीर से हुई, जिन्होंने I AM का निर्माण जन सहयोग से ही किया था. ओनीर ने पवन भाई का हौसला बढ़ाया और अपने बहुमूल्य सुझाव दिए. फिर शुरू हुआ चंदा मांगने का काम. फेसबुक और जीमेल ने इस काम में बहुत साथ दिया और लोगों ने पवन भाई पर विश्वास जताते हुए फिल्म बनाने के लिए चंदा देना शुरू कर दिया. इसी दौरान पवन भाई ने अपनी जमा-पूंजी लगाकर काम धीरे-धीरे शुरू कर दिया था.
फिल्म बनाने के लिए कलाकार और actors और technicians की खोज हो चुकी थी और खुशी एवं उत्साह बढाने वाली बात यह थी कि लगभग सभी लोग फ्री में काम करने के लिए तैयार हो गए थे. फिर भी अन्य इंतजामों के लिए पैसा तो लगना ही था. लाइट और बाकी उपकरणों एवं अन्य जरुरी चीजों का प्रबंध पटना से ही हुआ था. पटना में इकट्ठा होकर टीम रोहतास के लिए रवाना हुई जहां शूटिंग शुरू होनी थी. जैसे-जैसे पैसा आता था वैसे-वैसे काम होता था. कई बार बीच में रुकना भी पड़ा. जेनरेटर के तेल तक के लिए पैसा जुटाना बहुत बड़ी समस्या थी. लेकिन लोगों के सहयोग ने इसे संभव बनाया. 150 से ज्यादा लोगों ने अपना-अपना सहयोग देकर इस सपने को साकार बनाया. रोहतास और छपरा की शूटिंग के बाद एक हिस्सा दिल्ली में भी शूट करना था. दिल्ली में भी कई मुश्किलों के बाद अंततः यह पूरा हुआ.
शूटिंग पूरी होने के बाद पैसा की समस्या फिर खड़ी हो चुकी थी. साउंड रिकॉर्डिंग और एडिटिंग में मोटा पैसा लगना था. खैर,पैसे का तो इंतजाम हुआ लेकिन समय बहुत लग गया. इस बीच पवन भाई कई बार परेशान-हताश भी हुए. लेकिन दोस्तों का सहारा उन्हें हौसला देता रहा. उनका व्यवहार और व्यक्तित्व उन्हें मित्रों की कमी नहीं होने देता, उनकी मित्र सूची बहुत लंबी है. इस दौरान 'नया पता' को मीडिया अटैंशन भी मिलता रहा. यह बहुत उत्साहवर्धक था. लंबी मेहनत, धैर्य और लोगों के सहयोग से यह फिल्म पूरी हुई. इनमे से बहुत सारे लोगों को मैं जानता हूं लेकिन बहुत लोगों को नहीं भी जानता हूं.
नए साल 2014 में आज शाम 7 बजे इंडिया हैबीटेट सेंटर के स्टेन ऑडिटोरियम में इसकी पहली स्क्रीनिंग होने जा रही है.
फिल्म की कहानी के बारे में जान-बूझकर चर्चा नहीं कर रहा हूं क्योकि मैं चाहता हूं कि आप आज इस फिल्म को जरुर देखें और अपनी कीमती राय देकर पवन भाई और उनकी टीम का उत्साह बढ़ाएं.
पुनीत पुष्कर