Connect with us

Hi, what are you looking for?

No. 1 Indian Media News PortalNo. 1 Indian Media News Portal
Local News Community

सुख-दुख...

जब कुछ मर्द टीवी एंकरों को मुंबई दिल्ली की घटनाओं पर बकते देखता हूं तो सोचता हूं…

: मुंबई क्यों शर्मसार हो? : मुंबई की एक फोटो पत्रकार के साथ बलात्कार की घटना ने हमें उसी दिसंबर जनवरी में लाकर छोड़ दिया है जहाँ हम निर्भया को लेकर मर्दों के सामाजिकरण पर बहस किया करते थे । उन बहसों में क़ानून का डर समाज की कायरता से बड़ा होता चला गया था और जिसे क़ायम करने के लिए जस्टिस वर्मा ने एक वाजिब क़ानूनी ढाँचा भी पेश किया । बात दिल्ली और मुंबई के शर्मसार होने की नहीं है । मुंबई हो या दिल्ली इन शहरों ने कब औरतों के लिए एक आदर्श शहरी सामाजिक वातावरण बनाने में सक्रियता दिखाई ।

: मुंबई क्यों शर्मसार हो? : मुंबई की एक फोटो पत्रकार के साथ बलात्कार की घटना ने हमें उसी दिसंबर जनवरी में लाकर छोड़ दिया है जहाँ हम निर्भया को लेकर मर्दों के सामाजिकरण पर बहस किया करते थे । उन बहसों में क़ानून का डर समाज की कायरता से बड़ा होता चला गया था और जिसे क़ायम करने के लिए जस्टिस वर्मा ने एक वाजिब क़ानूनी ढाँचा भी पेश किया । बात दिल्ली और मुंबई के शर्मसार होने की नहीं है । मुंबई हो या दिल्ली इन शहरों ने कब औरतों के लिए एक आदर्श शहरी सामाजिक वातावरण बनाने में सक्रियता दिखाई ।

सुना था कि मुंबई औरतों के लिए बेहतर शहर है । ऐसा ही कोलकाता के बारे में सुना था । नब्बे के दशक में जब सार्वजनिक स्थलों पर औरत विहीन बिहार से दिल्ली आया था तो कार चलाती महिलाओं और बाइक पर पीछे बैठी लड़कियों की तादाद देखकर हैरान और ख़ुश होता था कि वाह ये शहर तो अच्छा है । पटना जैसे शहर में छोटी बहन घर में ही क़ैद सी हो गई क्योंकि आर्ट और कोचिंग तक जाने के लिए रिक्शे के पीछे चलने वाले पहरेदार भाई दिल्ली जा चुके थे ।

अब हम लगभग हर बड़े शहर को लेकर शर्मनाक हो चुके हैं । समझना मुश्किल है कि हम शहर और पीड़िता को कैसे और कब एक मान कर शर्मसार होने लगते हैं । नारीवादी सोच ने तो यही सिखाया है और सहमत भी हूँ कि पीड़िता क्यों शर्मसार हो बलात्कारी क्यों नहीं । उसी लिहाज़ से शहर क्यों शर्मसार हो । ऐसी घटनाओं के बाद हम शहर को भाई की तरह 'ट्रीट' करने लगते हैं जैसे भाई के रहते बहन के साथ ऐसा क्यों हुआ । मुंबई और दिल्ली को मर्द बना दिया जाता है ताकि वो ऐसे वक्त में शर्मसार हों । जब हमारी अभिव्यक्तियाँ नहीं बदल पा रही हैं तो सोचिये समाज की क्या हालत होगी ।

दरअसल बलात्कार की मानसिकता शहर के अंधेरे कोनों और ख़ाली पड़े कारख़ानों के एकांत में नहीं पनपती है । वो पनपती है लाखों घरों में जहाँ हम और आप बड़े होते हैं । आए दिन दफ्तर से घर लौटता हूँ तो पत्नी से बेटी के साथ घटी कहानियों को सुनता हूँ । हर दिन उसके साथ कोई लड़का ताक़त आज़मा चुका होता है । दस साल की उम्र में सामाजिकरण का ये अनुभव है कि वो अक्सर पूछती है पापा ये लड़के ऐसे क्यों होते हैं । उनकी आधुनिक मम्मियों को जब सुबह शाम जागिंग वाकिंग करते देखता हूँ तो लगता है कि कितना अच्छा है ये । सेहत को प्राथमिकता दे रही हैं । लेकिन जैसे ही उनके बेटों के बारे में फ़ीडबैक दीजिये तुरंत ऐसे प्रतिक्रिया देती हैं जैसे हमने उनके  ख़ानदान की नाक छेड़ दी हो । बेटी की शिकायत कीजिये तो मम्मी डैडी थोड़े ना- नुकर के साथ सुन लेते हैं मगर बेटे के बारे में बिल्कुल ही नहीं । उनका बेटा हमेशा ही अच्छा होता है । एक चार साल का लड़का है वो अपने से छह साल बड़ी बहन को मार देता है । उसकी दोस्तों पर हमला कर देता है । उसके मां बाप को कुछ भी गलत नहीं लगता । बचपन से ही ऐसी हिंसक प्रवृत्तियाँ को हम कृष्ण लीला समझ आहलादित होते रहते हैं । धीरे धीरे इन लालों में ताक़तवर होने का यह गुमान लड़कियों के बरक्स पनपता रहता है ।

दुनिया में इस पर तमाम शोध हो चुके हैं लेकिन इन्हें पढ़ा कौन है । कोई नहीं । आज कल के साफ्टवेयर कंपनियों के माँ बाप अपनी जीवन शैली को ही सोच समझ लेते हैं । मान लेते हैं कि वो जागरूक हैं । लेकिन नारी विमर्श की संवेदनशीलता से जितने उनके पढ़े लिखे और लफ़ंगे पति अनजान हैं उतनी ही वेस्टसाइड स्टोर से सेल में खरीद कर कैपरी टीशर्ट पहनने वाली उनकी पत्नियाँ । उनकी जागरूकता की परिभाषा उपभोक्ता विकल्पों के चयन से आगे नहीं जा पाती । कुछ लोग बदले भी हैं तो सिर्फ संयोग से । समझदारी को बदलने में हम सब आलसी होते हैं । यह सबसे बड़ा मिथक है कि एक माँ अपने बच्चे को नहीं समझेगी तो कौन समझेगा । बेटी का बाप है तो ऐसा नहीं होगा । इसी तरह से हम शहर को लेकर एक मिथकीय संसार में जीने लगे हैं । मुंबई में ऐसा नहीं हो सकता । और यह भी एक मिथक है कि यह सब आधुनिक जीवन की देन है । भारत के किसी स्वर्ण युग में ऐसा नहीं होता था । संयुक्त परिवार में नहीं होता था । बहुत सारे मूर्ख इस मिथक में जी रहे हैं ।

अच्छा है कि औरतों के ख़िलाफ़ होने वाली हिंसा को लेकर पब्लिक स्पेस में लड़कियों ने आवाज़ बुलंद की है । मगर यह आवाज़ टीवी चैनल से गूँजती हुई ट्विटर के टाइमलाइन पर पस्त हो जाती है । शुक्र है कि निलांजना राय, अनुषा रिज़वी, सुप्रिया, नम्रता, शुभ्रा गुप्ता, रेवती लाल खुलकर इन सवालों को उठा रही हैं मगर काश ये आवाज़ उन सामाजिक फैक्ट्रियों में पहुँचती जिसे हम घर कहते हैं । टीवी एक फ़ेल माध्यम है । उससे होगा नहीं । वो ' कौन है ज़िम्मेदार ' टाइप की बहसों से आगे नहीं देख सकेगा । जे एन यू की घटना भी कम दर्दनाक नहीं थी मगर हमारी प्रखर मेधा उसे छोटे शहर और बड़े शहर की चिरकुट प्रस्थापनाओं में सिमट कर रह गई । हम लगातार नाकाम हो रहे हैं ।

दरअसल मुझे पजेरो चलाते हुए जाकी पहनने वाला और रूपा पहनकर ट्रैक्टर चलाने वाला मर्द एक ही लगता है । पटना की मेरी पड़ोसी वर्णिका पांडे एम्स में डाक्टर थी । प्रेम विवाह किया था । पिछले हफ़्ते उसने ख़ुदकुशी कर ली । घर वाले बताते हैं कि उसका डाक्टर प्रेमी मारने लगा था । छह महीने की शादी शोक में बदल गई । वो लड़की घर तोड़ने की सामाजिक उलाहनाओं के भय में क़ैद हो गई । उसे लगा कि इससे अब नहीं निकल सकती है । ज़िंदगी ख़त्म कर ली ।  काश हम अपनी बेटियों को यह सीखाते कि शादी के पहले ही हफ़्ते में प्रेमी या पति में यह तत्व दिखे तो तोड़ दो रिश्ते को । तब तो और जहाँ इसमें सुधार की गुज़ाइश न बची हो । लड़की हो एक नहीं चार शादी करना ।

हाल ही में मेरी स़ासू माँ ने एक क़िस्सा सुनाया । उनकी एक मित्र ने कहा कि शादी करके आई थीं लेकिन उनके पति जब तब चांटा मार देते थे । शुक्र है भगवान ने बेटा जैसा प्रसाद दे दिया । बहू के सामने भी मार देते हैं तो बेटा इतना अच्छा है कि अपनी बीबी को समझा देता है कि पापा न ऐसे ही है । तभी हमारे मर्द चाहे किसी शहर में हों ऐसे ही रहेंगे । किसी भी गाँव में रहते हों । वो रोज़ ऐसे किस्से सुन कर घर आती हैं । पर शायद यह एक बदलाव होगा कि उम्र के इस मोड़ पर औरतें इसे साझा कर रही हैं । लड़के कब साझा करेंगे कि वो कितनी हिंसा करते थे ।

मेरा नारीवादी मूल्यों के प्रशिक्षण में घोर विश्वास है । जिन सामंतवादी और मर्दवादी मूल्यों के सामाजिक वातावरण में पला बढ़ा था उनके बारे में लगातार पढ़ने और समझने से काफी फ़र्क पड़ा । शुक्रगुज़ार हूँ अपनी पत्नी और उन तमाम महिला दोस्तों का जिनके साहचर्य में मैंने इन मूल्यों को सीखा । दोस्ती के दिनों में मेरी पत्नी नायना मेरे वाक्यों से एक एक शब्द निकाल कर घंटों बोला करती थी कि ये है प्रोब्लम । कई बार लगता था कि इश्क़ की जगह किसी फेमिनिस्ट स्कूल में भर्ती हो गए हैं । मुझे यकीन हो गया था कि 'अनफिट' हूं लेकिन आज लगता है वो ट्रेनिंग काम आई । हमारी भाषा हमारी सोच से निकलती है । शब्द अनायास किसी अनजान जगह से नहीं निकलते । इसी तरह एक रात इंदिरा विहार अपने दोस्तों के घर रुका था । सिमोन द बोवुआर की किताब 'द सेकेंड सेक्स' पढ़ने लगा । सुबह तक काफी कुछ बदल चुका था । उस किताब ने झकझोर दिया । जब यह पता चला कि मर्दों की सोच स्वाभाविक नहीं है । उन्हें समाज और परिवार अपने साँचे में गढ़ता है जिसे हम एक दिन प्राकृतिक मानने लगते हैं । आज जब कुछ मर्द टीवी एंकरों को मुंबई दिल्ली घटनाओं पर बकते देखता हूँ तो सोचता हूँ कि ये भाई साहब कैसे हैं । इनके जीवन में 'घोर मर्द' होने से एक सामान्य मर्द होने की कोई प्रक्रिया रही होगी या ये पैदाइश प्रोडक्ट है 'अच्छे लड़के हैं' !

एक दिन एनडीटीवी में पत्रकार महुआ चटर्जी ने जब यह पूछा कि 'गुड टच' और 'बैड टच' समझते हो तो मैं ही पूछने लगा कि ये क्या होता है । महुआ चाहती थीं कि बेटी को सीखाऊं । लेकिन इससे तो बाप ही अनजान था । तब से मैं जब भी किसी लड़के को किसी लड़की के कंधे पर हाथ रखते देखता हूं मेरी नज़र छूने वाले की आंख पर होती है । कई लोगों को ठीक ठीक समझ पाया हूं कि ये उदार और सहज बनने की आड़ में ' बैड टच ' है । एक दिन नताशा ने अपनी किसी दोस्त के साथ हुए वाक़ये को सुनाते हुए कुछ ऐसा कहा ' ही ट्रायड टू फ़ेल्ट हर अप ' यू नो रवीश । नो आय डोंट नो । ये क्या होता है । ' फेल्ट हर अप ' । बाद में जब उसे लगा कि 'यू नो ' और ' आय मीन'  से मैं नहीं समझ पा रहा हूं तो उसने साफ साफ शब्दों में कह दिया । मेरे पांव के नीचे से ज़मीन खीसक गई । इसलिए कि पहली बार ऐसी अभिव्यक्ति सुनी । शा़यद अंग्रेजी के पास मर्दाना हिंसा के इतने बारीक और चालाक रूप को अभिव्यक्त करने के लिए कई वाक्य हैं । एकदम सटीक । कहने का मतलब है कि आप ऐसे प्रसंगों से विशेष रूप से सचेत होते हैं । मेरी दोस्तों ने मुझे काफी बदल दिया और यह प्रक्रिया आज भी जारी है ।  

ये ज़रूर था कि स्वभाव से मैं छेड़ छाड़ करने वाला हिंसक लड़का नहीं था फिर भी अच्छे कहे जाने वाले लड़कों की सोच में नारीवादी मूल्यों की समझ हो यह ज़रूरी नहीं है । बस इतना कहना चाहता हूँ कि हमारा सबसे ख़राब सामाजिक उत्पाद मर्द है । इस प्रोडक्ट को बदल दीजिये । जो अच्छे हो गए हैं उनके ऊपर एक लेबल लगा दीजिये । चेंज्ड । और जो लड़के और मर्द मुंबई की घटना को लेकर उत्तेजित हैं वो अपने मर्द होने की सामाजिक प्रक्रिया के बारे में लिखें । लड़कों का लिखना ज़्यादा ज़रूरी है । बलात्कार एक मानसिकता है और इस मानसिकता का शहर है हमारा घर न कि मुंबई ।

लेखक रवीश कुमार चर्चित टीवी न्यूज एंकर हैं और एनडीटवी से जुड़े हुए हैं. उनका यह लिखा उनके ब्लाग कस्बा से साभार लिया गया  है.

Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

… अपनी भड़ास [email protected] पर मेल करें … भड़ास को चंदा देकर इसके संचालन में मदद करने के लिए यहां पढ़ें-  Donate Bhadasमोबाइल पर भड़ासी खबरें पाने के लिए प्ले स्टोर से Telegram एप्प इंस्टाल करने के बाद यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia 

Advertisement

You May Also Like

विविध

Arvind Kumar Singh : सुल्ताना डाकू…बीती सदी के शुरूआती सालों का देश का सबसे खतरनाक डाकू, जिससे अंग्रेजी सरकार हिल गयी थी…

विविध

: काशी की नामचीन डाक्टर की दिल दहला देने वाली शैतानी करतूत : पिछले दिनों 17 जून की शाम टीवी चैनल IBN7 पर सिटिजन...

विविध

पहली बार चुनाव हमने 1967 में देखा था. तेरह साल की उम्र में. और अब पहली बार ऐसा चुनाव देख रहे हैं, जो इससे...

विविध

राजस्थान, कांग्रेस और सेक्स. ये तीन शब्द लगता है आपस में अच्छे से घुल मिल गए हैं. भंवरी कांड में ये तीनों शब्द जुड़े...