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जब मीडिया हाउसेज के भी स्वार्थ होते हैं, तो ओपिनियन पोल्स पर बैन क्यों ना लगे

Nadim S. Akhter : बहुत-बहुत अच्छा होगा, अगर बेसिर-पैर के टेढ़े-मेढ़े ओपिनियन पोल पर पाबंदी लग जाए. इस लोकतंत्र का भला होगा. हां, ऐसे सर्वे कराने वाले बहुत से संस्थानों की दुकानदारी बंद हो जाएगी, टीवी चैनलों पर एक high profile TRP मसाला कम हो जाएगा, उनकी 'Bargaining' की ताकत कम हो जाएगी, टीवी स्क्रीन पर चुनाव परिणाम का ज्ञान देने वाले विद्वतजनों की कमाई थोड़ी घट जाएगी और टीवी से लेकर प्रिंट मीडिया तक किसी पार्टी-व्यक्ति विशेष को चुनाव में आगे दिखाकर मतदाताओं को गुमराह करने की प्रवृत्ति पर रोक लगेगी.

Nadim S. Akhter : बहुत-बहुत अच्छा होगा, अगर बेसिर-पैर के टेढ़े-मेढ़े ओपिनियन पोल पर पाबंदी लग जाए. इस लोकतंत्र का भला होगा. हां, ऐसे सर्वे कराने वाले बहुत से संस्थानों की दुकानदारी बंद हो जाएगी, टीवी चैनलों पर एक high profile TRP मसाला कम हो जाएगा, उनकी 'Bargaining' की ताकत कम हो जाएगी, टीवी स्क्रीन पर चुनाव परिणाम का ज्ञान देने वाले विद्वतजनों की कमाई थोड़ी घट जाएगी और टीवी से लेकर प्रिंट मीडिया तक किसी पार्टी-व्यक्ति विशेष को चुनाव में आगे दिखाकर मतदाताओं को गुमराह करने की प्रवृत्ति पर रोक लगेगी.

ये opinion poll भी टीवी के TRP Meter की तरह ही फ्रॉड होते हैं. महज कुछ हजार लोगों की 'राय' जानकर ये करोड़ों-लाखों लोगों द्वारा दिए जाने वाले वोट का रूझान बता देते हैं. यानी सैम्पल साइज इतना छोटा कि पूरा का पूरा सर्वे ही निरस्त किए जाने लायक है. यही हाल TRP बताने वाले method का भी है. लेकिन चालबाजी देखिए कि शुतुरमुर्ग की तरह मुंडी बालू में घुसाकर शान से TRP & Opinion Polls को ऐसे प्रोजेक्ट किया जाता है, जैसे भाई लोगों ने एक-एक घर जाकर पूछा हो. उनके दिमाग-टीवी सेट को स्कैन किया हो. हद होती है बेशर्मी की भी.

लेकिन इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता. ये बहुत बड़े वाले बेशर्म हैं. गालथेथर हैं. गालबजाऊ हैं. इस अवैज्ञानिक सर्वे को वो ऐसे आपके सामने पेश करते हैं, जैसे बस चुनाव होने की देर है. सरकार उसी पार्टी की बनेगी, जिसकी वो बात कर रहे हैं. इनकी पोल तो उसी समय खुल गई थी, जब 2004 में सारे ओपिनियन पोल्स ने एनडीए की सत्ता में वापसी का बिगुल बजा दिया था. अटल बिहारी वाजपेयी के 'करिश्मे' और इंडिया शाइनिंग के नारे के साथ बीजेपी को कॉरपोरेट्स-बाजार-ओपिनियन पोल्स ने दुबारा गद्दी मिलने की बात कही थी. लेकिन हुआ इसके ठीक उलट. कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए ने एनडीए को बुरी तरह पछाड़ दिया. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने और Opinion Polls की ऐसी पोल-पट्टी खुली की पूछिए मत. फिर भी ये ऐसे छिछोरे हैं कि अब तक जमे हुए हैं. हर इलेक्शन से पहले इन्हें अपनी तिजोरी भरनी होती है. राजनीतिक पार्टियों और मीडिया हाउसेज के एजेंडे को implement करना होता है. और बहाना होता है opinion polls का.

सबसे गंभीर चर्चा का विषय ये है कि जिन media houses के मार्फत ये opinion polls दिखाए-छापे जाते हैं, ये देखना बहुत जरूरी है कि उन media houses का मालिकाना हक किनके पास है? कुछ चैनलों और अखबारों का मालिकाना हक तो सीधे-सीधे किसी पार्टी के नेताजी के पास है. तो क्या यह संभव है कि अपने चैनल या अखबार के माध्यम से नेताजी जो opinion polls दिखाएंगे या छापेंगे, उसमें वह अपनी पार्टी की हार दिखा दें और विरोधी की जात दिखा दें. ऐसा ना आज तक हुआ है और ना होगा. तो इसका मतलब है कि सीधे-सीधे वह अखबार या चैनल संबंधित पार्टी का मुखपत्र बन जाता है, जिसे -एक निष्पक्ष मीडिया हाउस का सर्वे- बताकर opinion polls बाजार में बेचे जाते हैं. इसके द्वारा जनता की राय को प्रभावित करने की कोशिश की जाती है. यानी हींग लगे ना फिटकरी और रंग भी चोखा. संबंधित पार्टी के घोषित मुखपत्र के अलावा यह एक ऐसा -अघोषित मुखपत्र- होता है, जिसे निष्पक्ष मीडिया का लबादा ओढ़ाकर राजनीतिक पार्टीयां पर्दे के पीछे से खेल करती हैं.

अब बात उन मीडिया हाउसेज की, जिनके मालिक किसी राजनीतिक पार्टी से नहीं जुड़े हैं. लेकिन यहां भी पूंजी निजी हाथों में केंद्रित है. कुछ मालिकों के मीडिया बिजनेस के अलावा भी कई तरह के लंबे-चौड़े बिजनेस होते हैं. साथ ही कुछ मीडिया हाउसेज के शेयरों को देश की नामी-गिरामी कंपनियों के मालिकों ने खरीद रखे हैं. सो खेल यहां भी होता है. कभी पेड न्यूज की शक्ल में तो कभी…. जब आपके business interests होंगे तो जाहिर है, सरकार आपको प्रभावित कर सकती है. करती भी है. साथ ही कुछ media houses के मालिक किसी खास पार्टी के प्रति वफादार देखे गए हैं. उनकी यह वफादारी अखबार में उनके संपादकीयों और टीवी में खबरों के सेलेक्शन-प्रसारण तथा कुछ खास खबरों को drop करके उन्हें ना दिखाने की policy के तहत देखने-जानने को मिलती रहती है. ऐसी स्थिति में इस बात का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है कि ये तथाकथित —स्वतंत्र और निष्पक्ष– मीडिया संस्थान अगर opinion poll दिखाएंगे या छापेंगे तो किस पार्टी का पक्ष लेंगे?? वह भी तब, जब ऐसे opinion polls को दिखाने-छापने की कोई जवाबदेही नहीं होती. मतलब कि opinion poll गलत साबित होता है तो सर्वे करने वाली एजेंसी या छापने-प्रसारण करने वाले मीडिया हाउसेज पर किसी तरह को ना तो कोई जुर्माना लगता है और ना ही उनके खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई की जा सकती है. जिस पार्टी या व्यक्ति को opinion polls में हारता दिखाया जा रहा था, अगर वह जीत जाता है तो ऐसा नहीं देखा गया है कि उन्होंने सर्वे करने वाली एजेंसी या उसे दिखाने-छापने वाले मीडियाहाउस के खिलाफ कोई मानहानि का मुकदमा भी किया हो.

तो पूरा मैदान खुला है opinion polls के इस फर्जीवाड़े को करने के लिए. जो जिसे चाहता है, जिस पार्टी को चाहता है, अपने सर्वे के माध्यम से उसे जीतने वाला बता देता है. इस पर भी एक व्यपाक रिसर्च की जरूरत है कि इन opinion polls का वोटरों पर क्या असर पड़ता है? क्या इसे देखकर वह भी अपनी राय बनाते या बदलते हैं और उस कैंडिडेट-पार्टी को वोद दे देते हैं, जिसे opinion poll में जीतता हुआ बताया जा रहा है?

इन opinion polls में निष्पक्षता और पारदर्शिता का आभाव तो होता ही है, साथ ही जवाबदेही की पूर्णतः कमी होने के कारण लोकतंत्र के एक महत्वपूर्ण उत्सव यानी वोटिंग प्रक्रिया को हाईजैक करने की ये पूरी-पूरी कोशिश करते हैं. सबके अपने एजेंडे हैं और अपने निहित स्वार्थ. सो भारतीय लोकतंत्र पर कुठाराघात करने वाले इन अवैज्ञानिक opinion polls पर चुनाव आयोग को जल्द से जल्द पाबंदी-बैन लगाना चाहिए. हम वोटिंग से पहले छद्म रूप में आकर जनता-जनार्दन की राय को प्रभावित करने का मौका किसी को नहीं दे सकते. किसी को भी नहीं.


इसे भी पढ़ें: मीडिया की काली कमाई का एक बड़ा जरिया ओपीनियन पोल हुआ करते हैं


लेखक नदीम एस. अख्तर युवा और तेजतर्रार पत्रकार हैं. वे कई अखबारों और न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. नदीम से संपर्क 085 05 843431 के जरिए किया जा सकता है.


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