भड़ास4मीडिया न्यूज पोर्टल ने चार साल पूरा कर लिया। खुशी की बात है। हमारी तरफ से हार्दिक शुभकामनाएं। पोर्टल ने अपनी साख बनाई। इसकी बुलंदी दिनोंदिन प्रखर और तेज हुई। निश्चितरूप से यह यशवंत सिंह, उनकी टीम जिसमें अनिल भाई समेत कई काबिल लोग शामिल हैं, उन सबकी लगन-मेहनत का परिणाम है। इसमें कोई संदेह नहीं कि भड़ास4मीडिया न्यूज पोर्टल देश-विदेश में लाखों-करोड़ों लोगों में मजबूत आवाज बन चुका है। जानकारी का खजाना है। यह सब लिखना इसलिए जरूरी लगा जब भड़ास4मीडिया न्यूज पोर्टल के चार साल पूरा करने पर कई लोगों की भांति-भांति की टिप्पणी देखी।
यह बिल्कुल सच है कि ‘कबिरा इस संसार में भांति-भांति के लोग… पर क्या करिएगा भाई, पूरी आजादी है। देश आजाद है बोलने की पूरी छूट है। सो, लिखिए-बोलिए, जो भी मन में आए कह डालिए। यशवंत सिंह ऐसे हैं, यशवंत सिंह वैसे हैं, करते रहिए छिद्रान्वेषण। यह सोचने-जानने की कोई जरूरत नहीं कि एक आदमी किस तरह एक जज्बा लेकर मैदान में उतरता है अकेला, और दिन रात एक कर अनेकों झंझावात झेलता हुआ मिशन में सफल हो जाता है। निश्चितरूप से यह बड़ा काम है। उस जज्बे को सलाम।
यशवंत सिंह से जिसे रिश्तेदारी-नातेदारी करनी हो, वह उनका गोत्र देखे, कुंडली दिखवाए। यशवंत सिंह के पर्सनल बिहैव से क्या लेना-लादना। अपन तो इतना जानते हैं कि बंदे ने बड़ा काम ठान लिया है। आज की तारीख में यह न्यूज पोर्टल आम आदमी से लेकर बड़े-बड़े उन तोपचियों की भी आवाज साबित हो चुका है, जो रिपोर्टर फील्ड में तो बड़का तोप बन कर घूमते हैं, और मालिक-संपादकों के सामने जमूरा की भूमिका में होते हैं। नौकरी बचाने के लिए साहूकारों के एक इशारे पर सादे कागज पर दस्तखत कर देते हैं। किसी की नौकरी की बलि लेकर उसे बेरोजगार तक बना देते हैं।
अरे साहब, अपनी इन आंखों से हमने कई ‘जीएम, मैनेजर साहबों’ को डायरेक्टरों की अंडर-वीयर धोते और पांव चांपते देखा है। खुद को विश्व के नंबर वन प्रचारित कर अपनी पीठ ठोंकने वाले एक अखबार के तथाकथित कवि और उदारमना का बोर्ड पीठ पर लगाकर घूमने वाले एक ‘मोहनजी’ तो जब भी कानपुर से इलाहाबाद आते यहां के मैनेजर साहब उनकी ऐसी टहलुवाई करते कि उसका जिक्र नहीं किया जा सकता। ऐसे ही कितनी महान आत्माओं और उन मीडिया हाउसों की अमानवीय मनमानी को भड़ास ने ही नंगा किया। इतना ही नहीं, शासन-प्रशासन, तमाम मीडिया हाउस, देश के भाग्य विधाता बने इन नेताओं की मनमानी को लेकर जब सुनवाई के सारे रास्ते बंद दिखे तब भड़ास ने मंच का ही काम नहीं किया बल्कि पूरी शिद्दत से साथ भी खड़ा हुआ। कई उदाहरण सामने हैं।
हां, कुछ ऐसे लोगों को यशवंत सिंह के नाम से एलर्जी जरूर हो सकती है, जिसे उनके पोर्टल ने सरेआम नंगा कर दिया या जिनके लेख आदि न छप पाते हों। जब छपने लायक नहीं रहेंगे तो कोई काहे को छापेगा। कानपुर में अमर उजाला में नौकरी के दौरान रूम पार्टनर संतोष सिंह, विवेक तिवारी और देव कुमार के बीच एक लैपटॉप था। जहां तक याद है, शायद देवभाई लैपटॉप खरीद लाए थे। पत्रकारों की उस ‘घुड़साल’ में आई एक नई चीज ने तब राहत दिया था। वहीं पहली बार भड़ास देखा। ठीक-ठाक लगा। ऐसा महसूस हुआ कि अब पढ़ने की बेहतर खुराक मिला करेगी। दूसरे-तीसरे दिन आधी रात ऑफिस से रेलवे स्टेशन व्हीलर बुकस्टाल पर जाकर, पूरी रात वहां मैगजीन, अखबार देखने पलटने में परेशानी का झंझट खत्म।
हालांकि वहां अपने छाबड़ा अंकल और बाबाजी मामा पूरा ख्याल रखते, फिर भी मेहनत मजे की हो जाती। दिनरात की थकान से शरीर चूर-चूर हो जाता। उधर, आधी रात कानपुर सेंट्रल स्टेशन जाने को लेकर दफ्तर के यार-दोस्तों अनिल बिज, राकेश भाई, दिनेशजी, अपने दरोगाजी यानि बड़े भाई शुक्लाजी, बलिया वाले बाबू साहब आदि के बीच हंसी-ठट्ठा होता। बाबू साहब दो हाथ और आगे। बलिया वाला टोन-‘तब पांडेयजी, ई आधी-आधी रात को टेशन में का खोजने जाते हैं, सुधर जाइए नाहीं घर शिकायत पहुंची तो अपने आप बुझा जाएगा सब। बाप रे बाप, कैरेक्टर तक पर शक-सुबहा…। ऐसा कर्रा मजाक। हंसी के ठहाकों के बीच कई मलाल, तनाव फुर्र हो जाते।
सच, यह सभी लोग अच्छे इंसान थे। दोस्ती निभाना जानते थे। इन सबकी नीयत और नीति केवल चुहलबाजी होती। खुशनुमा माहौल पूरी तरह लोकतांत्रिक। फलों की पहचान, कनपुरिया स्टाइल, आंख मूंद पचास तक की गिनती, पतिव्रता स्त्री, गांधी बाबा, शहर के पार्क सरीखे एक से बढ़कर एक आयटम। बात-बात पे लेटेस्ट आयटम बन जाता। अनिल बिज में गजब की प्रतिभा। कभी-कभी कोफ्त होती कि राजू श्रीवास्तव कॉमेडियन के शहर में ऐसी प्रतिभा यहां काहे को झक मार रहा है ये? खैर, यह फिर कभी। यह कहने में कोई गुरेज नहीं कि भड़ास ने इस कदर प्रभावित किया कि आर्थिक तंगी के दौर में लैपटॉप खरीद भड़ास देखने का शौक पूरा किया। देश-विदेश के लाखों लोगों की तरह अब तो यह हमारा भी नशा बन चुका है। यह उन लोगों की आवाज बन चुका है, जिसे अखबार छापना नहीं चाहता, चैनल दिखाने में गुरेज करता है। कहीं सुनवाई नहीं होती। मनमानी करने वाले मनबढ़ हो जाते हैं।
यशवंतजी, आलोचक, नहीं-नहीं, … (इन्हें गंड़जरा कहना ज्यादा उचित होगा)। सच जानों साहब, यह हर जगह पाए जाते हैं। ये आरा मशीन की वो ब्लेड है जिनका काम ही होता है सामने आ गए लकड़ी को काटना। भाई, इनकी परवाह छोड़ मिशन में जमे रहिए। आप कितना बड़ा काम कर रहे हैं, यह इन चूतियों को क्या मालूम। इस पुनीत कार्य में हम सब पूरी तरह आपके साथ हैं।
इलाहाबादी शिवाशंकर पांडेय वरिष्ठ पत्रकार हैं. दैनिक जागरण, हिंदुस्तान, अमर उजाला जैसे अखबारों में काम करने के बाद सक्रिय रूप से स्वतंत्र पत्रकारिता में जमे हुए हैं. इनसे संपर्क 09565694757 के जरिए किया जा सकता है.
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