: प्रेस काउंसिल, मानवाधिकार आयोग, मुख्यमंत्री एवं जागरण के संपादकों को भेजा पत्र : दैनिक जागरण के पूर्व डिप्टी न्यूज एडिटर विनोद भारद्वाज ने न्याय पाने और लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाने के लिए अब चौतरफा मोर्चा खोल दिया है। हालांकि हाईकोर्ट के दिशा-निर्देश पर उनकी हत्या के प्रयास और मेंटल डिसऑर्डर में पहुंचाने की साजिश का मुकदमा तो पुलिस ने मजबूरी में दर्ज कर लिया है, लेकिन दैनिक जागरण के आगरा कार्यालय में बैठे षड्यंत्रकारियों और उनके आकाओं के दबाव में पुलिस हाथ पर हाथ रखे बैठी हुई है।
सिर्फ इतना ही नहीं, दैनिक जागरण के उन सभी पत्रकारों पर काउंटर एफीडेबिट देने के लिए बेजां दबाव डाला जा रहा है, जिन्होंने विनोद भारद्वाज के पक्ष में दिसम्बर 2010 में एफीडेबिट दिये थे। मुकदमा दर्ज हो जाने के बाद विनोद भारद्वाज ने दैनिक जागरण के प्रबंध संपादक-निदेशक महेन्द्र मोहन और संपादक संजय गुप्त को ई-मेल भेजकर अब तक के घटनाक्रम से अवगत करा दिया है। उन्होंने जागरण प्रबंधन के इन दोनों महत्वपूर्ण शीर्ष पदाधिकारियों से अनुरोध किया है कि षड्यंत्रकारियों को संस्थान का दुरुपयोग करने से रोकने के लिए इन्हें बाहर का रास्ता दिखायें ताकि हाईकोर्ट में बहस होने पर दैनिक जागरण की बदनामी न हो। साथ ही उन्होंने उनसे ये अपील की है कि घटना के समय मैं दैनिक जागरण में कार्यरत था और घटनास्थल भी दैनिक जागरण कार्यालय है। अतः नैतिकता के आधार पर न्याय दिलाने में व्यक्तिगत रूप में उनकी सहायता की उम्मीद करते हैं।
श्री विनोद भारद्वाज ने उप्र के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और प्रमुख सचिव को भी ई-मेल भेजने के साथ ही रजिस्टर्ड पत्र भेजकर इस मुकदमे में त्वरित प्रभावी कार्रवाई कराने का अनुरोध किया है। उन्होंने अपने पत्र में यह भी स्पष्ट कर दिया है कि प्रदेश में अब समाजवादी पार्टी की सरकार है और दैनिक जागरण के प्रबंध संपादक-निदेशक महेन्द्र मोहन सपा से राज्यसभा के सदस्य हैं। अतः अब प्रदेश की किसी भी एजेंसी से उन्हें निष्पक्ष कार्रवाई की उम्मीद नहीं है। इसलिये उन्होंने राज्य सरकार से अनुरोध किया है कि इस मुकदमे की जांच सीबीआई से कराने की संस्तुति करना ही न्याय उचित होगा।
इस पूरे मामले में एक और महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए विनोद भारद्वाज ने दैनिक जागरण प्रबंधन की सरपरस्ती में हुई आपराधिक साजिश और सशर्त इस्तीफे की गैरकानूनी मंजूरी का मामला भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष पूर्व जस्टिस मार्कण्डेय काटजू के सामने ई-मेल और रजिस्टर्ड पत्र के जरिये उठाया है। उन्होंने श्री काटजू को सभी महत्वपूर्ण दस्तावेजों की कॉपी भेजने के साथ ही स्टष्ट किया है कि मई 1998 में दैनिक जागरण की आगरा में यूनिट में हुई नौ दिन की हड़ताल का नेतृत्व मैंने किया था। जागरण प्रबंधन ने एक सोची-समझी साजिश के तहत उन्हीं के सहायक रहे आनंद शर्मा को लालच का चारा डालकर उनके खिलाफ हथियार की तरह इस्तेमाल किया और डेढ़ साल से षड्यंत्रकारियों को अखबार की ताकत के दम पर संरक्षण देकर कानूनी कार्रवाई नहीं होने दी जा रही है। उन्होंने जस्टिस काटजू से मीडिया हाउस के अंदर हुई इस शर्मनाक आपराधिक घटना का संज्ञान लेकर न्याय दिलाने की अपील की है।
सिर्फ इतना ही नहीं यह पूरा मामला श्री भारद्वाज ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष को भी ई-मेल और रजिस्ट्री के जरिये भेजा है। उन्होंने आयोग से इस पूरे मामले की विस्तृत और निष्पक्ष जांच कर न्याय दिलाने की अपील की है। श्री भारद्वाज ने आगरा के डीआईजी और एसएसपी को भी ई-मेल के जरिये शिकायत की है कि मुकदमे का जांच अधिकारी दैनिक जागरण में बैठे षड्यंत्रकारियों के निरंतर संपर्क और दबाव में हैं। जांच अधिकारी द्वारा उन्हें अपराध के सबूत मिटाने के पर्याप्त अवसर दिये जा रहे हैं।
मीडिया जगत के लोग दैनिक जागरण कार्यालय में हुई इस शर्मनाक आपराधिक साजिश के हैरतअंगेज कारनामे पर मूकदर्शक बने रह कर चोरी-चोरी अपनी नजरें जमाये हुए हैं। पीड़ितों को न्याय दिलाने का दम्भ भरने वाला मीडिया मुकदमा दर्ज हो जाने के बाद भी बेशर्मी के साथ चुप्पी साधे हुए है और एक अकेले पत्रकार द्वारा इस नंबर वन मीडिया हाउस के अन्याय के खिलाफ लड़ी जा रही कानूनी जंग को हैरत से देख रहा है।
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