दैनिक जागरण इलाहाबाद के संपादकीय प्रभारी ने एक रिपोर्टर को अकारण, बिना किसी पूर्व सूचना के पैदल कर दिया। 18 जनवरी को दिनभर फील्ड में भागदौड़ के बाद रेलवे बीट के रिपोर्टर सचिन शुक्ला शाम को दफ्तर पहुंचे। वह काम शुरू करने की तैयारी में थे, इसी बीच संपादकीय प्रभारी का फरमान आ पहुंचा। प्रभारी अवधेश गुप्ता का फरमान 'कल से दफ्तर आने की जरूरत नहीं है', सुनते ही सचिन शुक्ला के पैरों तले जमीन खिसक गई।
दफ्तर में हड़कंप मच गया। हर कोई, एक दूसरे से वजह जानने में जुट गया। अकारण निकाले जाने से सचिन शुक्ला की आंखों में आंसू आ गए, पर उन्हे निकाले जाने की वजह नहीं बताई गई। दैनिक जागरण इलाहाबाद में रिपोर्टर्स को ऐसे निकाला जा रहा है, जैसे दूध में गिरी मक्खी को निकालकर फेंक दिया जाता है। यह सिलसिला पिछले सात माह से चल रहा है। अकारण और बिना पूर्व सूचना के निकाले जाने वालों की सूची में सचिन शुक्ला अकेले नहीं हैं। इसके पहले यहां के वरिष्ठ पत्रकार पीयूष उपाध्याय, शांतनु मिश्र, कौशलेंद्र मिश्र, विपिन त्रिवेदी और संजय गुप्ता को भी बाहर का रास्ता दिखाया जा चुका है। इस सूची में एक नाम महिला पत्रकार सोमा राय का भी है। बिना वाजिब कारण के निकाले जाने पर सचिन शुक्ला ने जागरण के समूह संपादक व डायरेक्टर को ई-मेल भेजकर जानकारी दी है।
दैनिक जागरण इलाहाबाद में रिपोर्टरों को निकाले जाने से हड़कंप मचा हुआ है। पिछले सात माह से चल रहा अंतहीन सिलसिला कब थमेगा, यह तो जागरण प्रबंधन और यहां के संपादकीय प्रभारी ही बता सकते हैं, पर आंतरिक सूत्र यह बताते हैं कि यहां पर कलह और गुटबाजी चरम पर है। जो रिपोर्टर खुद को इसमें फिट नहीं कर पाता, वह बलि का बकरा बना दिया जाता है।
एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.






