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जागरण में रिपोर्टरों का टोटा, फोरमैन की खबर छापी पहले पेज पर!

: कानाफूसी : विश्व के तथाकथित नंबर एक अखबार दैनिक जागरण के रांची कार्यालय में यह क्या हो रहा है। अब यहां रिपोर्टर नहीं फोरमैन की रिपोर्ट पेज नंबर एक पर छपती है। विश्वास नहीं हो तो दैनिक जागरण के 21 दिसम्‍बर का रांची संस्‍करण देख सकते हैं. पहले पन्‍ने पर अनुज मिश्रा की रिपोर्ट छपी है – ''1 शिक्षक पढ़ा रहे 446 छात्राओं को''। अब शायद जागरण प्रबंधन इतना असहाय हो गया है कि उसे फोरमैन की सेवाएं लेनी पड़ रही हैं।

: कानाफूसी : विश्व के तथाकथित नंबर एक अखबार दैनिक जागरण के रांची कार्यालय में यह क्या हो रहा है। अब यहां रिपोर्टर नहीं फोरमैन की रिपोर्ट पेज नंबर एक पर छपती है। विश्वास नहीं हो तो दैनिक जागरण के 21 दिसम्‍बर का रांची संस्‍करण देख सकते हैं. पहले पन्‍ने पर अनुज मिश्रा की रिपोर्ट छपी है – ''1 शिक्षक पढ़ा रहे 446 छात्राओं को''। अब शायद जागरण प्रबंधन इतना असहाय हो गया है कि उसे फोरमैन की सेवाएं लेनी पड़ रही हैं।

अनुज मिश्रा दैनिक जागरण, रांची में फोरमैन के रूप में ही कार्यरत हैं। बुराई इसमें नहीं है कि फोरमैन ने खबर लिखी, दिक्‍कत यह है कि खबर का स्‍तर प्रथम पेज लायक नहीं है, इसके बावजूद उसे पहले पेज पर छापा गया है। जागरण प्रबंधन अब क्‍या इतना गया गुजरा है कि एक रिपोर्टर का गला फोरमैन बनाकर घोंट रहा है या इसके पीछे कुछ खेल है। दरअसल गलती कहीं से भी बेचारे अनुज मिश्रा की नहीं है। अनुज के चाचा पुरूषोत्तम मिश्रा दैनिक जागरण, रांची कार्यालय के कैशियर सह अघोषित मुख्य महाप्रबंधक हैं। वैसे तो लिखा-पढ़ी में मुख्य महाप्रबंधक सरोज अवस्थी हैं लेकिन सिर्फ कहने को। जलवा पुरूषोत्तम मिश्रा और इनके चिरकुट चेले-चपाटियों का है। इनके सामने बेचारे अदना रिपोर्टर की क्या औकात।

अब बात करें रांची संस्करण के स्थानीय संपादक शशि भूषण की तो, वो भी दरअसल उप समाचार संपादक हैं और दैनिक जागरण में इस स्तर के लोग संपादकीय प्रभारी के पद पर बिठा दिए जाते हैं। शशि भूषण दैनिक जागरण, पटना में संवाददाता हुआ करते थे। भैया-बाबा-बाबू कहते-कहते अब रांची के स्थानीय संपादक बन गए हैं। वे दैनिक जागरण, रांची के तथाकथित मुख्य महाप्रबंधक पुरूषोत्तम मिश्रा को खुश करने के लिए उनके भतीजे अनुज मिश्रा की रिपोर्ट अपने निर्देशन में लिखवाते हैं। अभी तक तो अनुज भीतर छपते थे। जाहिर है रिपोर्टरों की जलती थी। पर अब तो हद हो गई। एक नंबर पेज पर पुरुषोत्तम के भतीजे की रिपोर्ट छपी है। रिपोर्टरों में इसे लेकर नाराजगी हो तो हो, कौन फिक्र करता है। अपनी रोजी-रोटी चलनी चाहिए।

पुरूषोत्तम मिश्रा और उनके चेले पेशाब करने भी जाते हैं तो गाड़ी लेकर, लेकिन मजाल है कि कोई रिपोर्टर देर रात आफिस से बाहर जाने के लिए गाड़ी मांग ले। जागरण, रांची कार्यालय के गाड़ी की सेवा पुरूषोत्तम मिश्र सपरिवार उठाते हैं। शशि जी उनके कृपापात्र बनने के लिए उनके भतीजे को प्रमोट कर रहे हैं। अब तक तो आप समझ गए होए कि जागरण में स्थानीय संपादक से बड़ी हैसियत अदना कैशियर रखता है। आइए, अब रिपोर्टर भाई अपनी पीड़ा किससे कहे। रांची, कार्यालय से शिक्षा संवाददाता राहुल पराशर ने टाटा बाय बाय कर दिया।

दरअसल राहुल को यहां का माहौल रास नहीं आ रहा था। सच भी है कि दैनिक जागरण के रांची कार्यालय में अब काम करने का माहौल रह भी नहीं गया है, चापलूसी और चमचागिरी करने वालों का ही बोलबाला और चांदी है। राहुल को प्रबंधन के कुछ कदम नागवार गुजरे और उन्‍होंने अपना इस्‍तीफा इन लोगों के मुंह पर दे मारा। अब वे जमशेदपुर में हिंदुस्‍तान से जुड़ गए हैं। नीचे अनुज की रिपोर्ट देखिए :- 

                 1 शिक्षक पढ़ा रहे 446 छात्राओं को

अनुज मिश्रा, रांची : एक शिक्षक 446 छात्राएं। इसे सुशिक्षित समाज की कल्पना कहें या शिक्षा के नाम पर सिर्फ कागजी आंकड़ों की नुमाइश। एक बानगी भर प्रोजेक्ट बालिका उच्च विद्यालय, तमाड़ की। जहां शिक्षा के साथ यह खिलवाड़ हो उस राज्य में बदलाव की बयार बहे भी तो कैसे? आखिर सुधार के लिए और कितना वक्त चाहिए झारखंड को। यह तस्वीर तो सिर्फ रांची जिले की है। पूरे राज्य की हालत हांडी के इस एक चावल से समझी जा सकती है। कहीं 17 छात्रों पर एक शिक्षक तो कहीं चार सौ छात्रों पर एक। इतना असमान वितरण क्यों? शिक्षकों की कमी है तो सरकार नियुक्ति क्यों नहीं कर रही? यह सवाल आम आदमी का है, शिक्षित बेरोजगारों का है। तमाड़ में 446 छात्राओं पर सिर्फ एक शिक्षक हैं। राजकीय उच्च विद्यालय, बाजरा में 301 छात्रों की पढ़ाई एक शिक्षक के जिम्मे। जबकि, छोटानागपुर विद्यालय थड़पखना में 472 बच्चों के लिए 27 अध्यापक। शेख भिखारी बालिका उच्च विद्यालय में 670 विद्यार्थियों पर हैं सिर्फ तीन शिक्षक। अपर बाजार स्थित मारवाड़ी बालिका उच्च विद्यालय में 127 छात्राओं पर एक शिक्षक। मानक के हिसाब से 40 विद्यार्थियों पर एक शिक्षक होना चाहिए। सर्वाधिक दयनीय स्थिति तो है प्रोजक्ट विद्यालयों की। 15 विद्यालयों में 83 शिक्षकों के जिम्मे है 6873 बच्चों का भविष्य। औसतन 82 विद्यार्थियों पर एक शिक्षक। प्रोजेक्ट बालिका उच्च विद्यालय, बेड़ो में 943 छात्राओं के लिए सिर्फ 7 शिक्षक। रांची के राजकीय विद्यालयों में 67 विद्यार्थियों पर औसतन एक अध्यापक हैं। बाजरा विद्यालय सिर्फ एक शिक्षक के भरोसे है। अल्पसंख्यक उच्च विद्यालय व कस्तूरबा विद्यालय की स्थिति थोड़ी बेहतर है। कस्तूरबा में 38 छात्राओं पर एक तो अल्पसंख्यक विद्यालयों में 48 छात्रों पर एक शिक्षक हैं।

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