लखनऊ : न हम बदले हैं, न हमारी सोच बदली है। हमें तो जातिवाद का ही सहारा है। एम (मुस्लिम) वाई (यादव) फैक्टर के सहारे दिल्ली के तख्तो ताज पर कब्जा करने की हसरत पाले सपा प्रमुख की यही सोच उनके सामने चट्टान की तरह अवरोधक बन कर खड़ी हो गई है,लेकिन न तो मुलायम को कुछ दिखाई दे रहा है न सुनाई। किसी की सुनने को भी वह तैयार नहीं है। उनकी हठधर्मी से पार्टी के भीतर ही विरोध के सुर सनाई पड़ने लगे हैं।
प्रधानमंत्री पद की दौड़ में शामिल मुलायम के पास राष्ट्रीय विजन का अभाव है। मुलायम का समाजवाद जातिवाद और क्षेत्रवाद की राजनीति में ही उलझा हुआ हैं,जबकि अन्य दलों में बदलाव साफ देखने को मिल रहा है। 2014 के लिये प्रधानमंत्री पद के तीन प्रबल दावेदारों भाजपा के नरेन्द्र मोदी, कांग्रेस के अघोषित राहुल गांधी और समाजवादी पार्टी के स्वयंभू उम्मीदवार मुलायम सिंह यादव की राजनीति में जमीन आसमान का फर्क नजर आ रहा है।
आश्चर्यजनक है कि करीब-करीब सभी राजनैतिक दलों और उनके आकाओं ने समय के साथ अपने में बदलाव कर लिया है लेकिन मुलायम हैं कि बदलने को तैयार ही नहीं हैं, इतना ही नहीं सपा प्रमुख ने अपने पुत्र और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को भी अपने रंग में रंग कर उनके राजनैतिक जीवन पर ग्रहण लगा दिया है। दंगें के नामजद आरोपी और मदरसा संचालक मौलाना नजीर को अखिलेश सरकार ने जिस तरह से सरकारी मेहमान का दर्जा देते हुए उन्हें विशेष विमान से पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लखनऊ बुलाकर मुलाकात की उससे भाजपा तमतमा गई है। भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता विजय पाठक ने कहा कि अखिलेश सरकार ने सत्ता में रहने का अधिकार खो दिया है। जनता इसका जबाव चुनावी मैदान में देगी।
बात बदलाव की कि जाये तो भारतीय जनता पार्टी अब ‘राम लला हम आयेंगे मंदिर वहीं बनवायेंगे’ ‘जो हिन्दू हित की बात करेगा,वह ही देश पर राज करेगा’ जैसे नारे नहीं लगाती है। भाजपा साम्प्रदायिकता का दाग धोने के लिये भगवान राम से तक से दूर चली गई है। उसके नेताओं ने अयोध्या की तरफ देखना ही बंद कर दिया है। भाजपाई सवा सौ करोड़ भारतीयों की बात करने लगे हैं। मोदी के सुर बदल गये हैं। बदली-बदली सी लग रही भाजपा के हौसले इतने बुलंद हैं कि 2014 के लोकसभा चुनाव में वह बहुमत के साथ केन्द्र में सरकार बनाने का सपना देखने लगी है।
बात बसपा की कि जाये तो बसपा ने अपने उभार के समय (जब कांशीराम का बोल बाला था)‘तिलक-तराजू और तलवार इनको मारों जूते चार। ’का नारा खूब उछाला था,इस नारे ने चमत्कारी परिणाम दिये। दलित मायावती का मुरीद हो गया, इस नारे के बदौलत माया सीएम तक बनी लेकिन 2007 आते-आते माया और उनकी पार्टी बदल गई। वह सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय की बात करने लगीं। बदला हुआ नारा बसपा को इतना रास आया कि 2007 के विधान सभा चुनाव में बसपा को पूर्ण बहुमत मिल गया। ब्राहमण,क्षत्रियआदि तमाम जातियां बसपा में अपना भविष्य तलाशने लगीं। 2012 में भी माया की सत्ता गई तो इसकी वजह यह नहीं थी कि उनके ऊपर से किसी कौम का विश्वास उठ गया था,बल्कि माया का अहंकार और पत्थरों पर बेतहाशा पैसा बहाना मतदाताओं को रास नहीं आया था।
समय की नजाकत और जनता की आवाज को भांप कर जो संभल और बदल जाये उसे ही नेता कहते हैं। इस बात का अहसास कांग्रेस के अघोषित प्रधानमंत्री पद के दावेदार राहुल गांधी को भी होने लगा है। उत्तर प्रदेश के 2012 के विधान सभा चुनाव में राहुल गांधी ने कांग्रेस की तरफ से ‘ वन मैन आर्मी’ की तरह प्रचार किया था। दलितों के घर जाकर खाना खाया, सोये, चौपाल लगाई। मौलानाओं के दरवाजों पर दस्तक दी, लेकिन सब बेकार रहा। उनके सारे दांवपेंच धरे के धरे रह गये। नतीजे आये तो राहुल के चेहरे का रंग उड़ गया। उन्हें जमीनी हकीकत का अहसास हो गया। इसके बाद तो जैसे राहुल पूरी तरह ही बदल गये।
दलितों के चक्कर लगाने की बजाये, उन मुद्दों को पकड़ने लगे जिससे जनता परेशान थी। अब उनकी जुबान पर भूमि अधिग्रहण बिल को केन्द्र सरकार से हर झंडी मिलना,दागी जनप्रतिनिधियों की सदस्यता बचाने के लिये लाये गये अध्यादेश का विरोध, केन्द्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना खाद्य सुरक्षा बिल रहते हैं। वह अपनी छवि बचाने के लिये प्रधानमंत्री तक के खिलाफ मुखर हो जाते हैं। राहुल आलोचनाओं से अधिक विकास की बात करते हैं। गरीबों का मुद्दा उठाते हैं। आदिवासियों के दर्द बांटते हैं, लेकिन जातिवाद की राजनीति से परहेज करते हैं। तब जबकि उनकी ही सरकार कई ऐसे निर्णय ले रही है जो समाज में विद्वेष पैदा करने वाले साबित हो रहे हैं।
समाजवादी पार्टी की तो स्थिति यह है कि उसके सदस्य ही दो फाड़ों में बंट गये हैं। अखिलेश सरकार की कार्यशैली पर उंगली उठ रही है। पार्टी के भीतर से ही आवाज आ रही है कि सरकार दंगा प्रभावित इलाकों में निष्पक्ष होकर कार्रवाई करे। मतलब,सपाई भी यह मान कर चल रहे हैं कि दंगा नियंत्रण मंे भेदभाव बरता जा रहा है। इसी लिये माहौल शांत नहीं हो रहा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई समाजवादी नेताआंे की तो स्थिति इतनी दयनीय हो गई है कि वह जनता से मुंह चुराते फिर रहे हैं। उनकी साख खत्म हो गई है। कई सपा विधायक और सांसद तो इस स्थिति में भी नहीं हैं कि आज चुनाव हो जायें तो जीत हासिल कर सकें।
उधर, मुलायम सिंह यादव पश्चिमी उत्तर प्रदेश का माहौल शांत नहीं होने पर अपनी सरकार को दोष देने के बजाये आरएसएस और भाजपा राग अलाप कर और मौलानाओें के समाने नतमस्तक होकर काम चला रहे हैं। मौलानाओं को हवाई मार्ग से लखनऊ बुलाकर मुलायम से मिलाया जाता है। कहने को तो मुलायम जमीन से जुड़े नेता हैं लेकिन आज तक उनके विवके में यह बात नहीं आई है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अमन-चैन वापस आये इसके लिये एक सर्वदलीय कमेटी बनायें। मुलायम की सोच का दायरा संकुचित हो गया है। एक वर्ग विशेष के प्रति नरमी का ही नतीजा है सरकार के खिलाफ जनांदोलन का दायरा बढ़ता जा रहा है। एक पक्षीय कार्रवाई को लेकर गत दिनों जाट बिरादरी द्वारा बुलाई गई पंचायत में पुलिस नेलाठियां भंाजी,हवाई फायर किये गये तो प्रदर्शनकारियों ने शांत होने के बजाये 84 गांवों की महापंचायत बुलाने की घोषणा कर दी। मुलायम के समाजवादी सरकार की कारगुजारी की तरफ से आंख मूंद लेने के कारण स्थितियों में सुधार नहीं हो रहा है।
मुख्यमंत्री और उनके करीबी आज तक यह नहीं समझ पाये हैं कि अगर किसी जिले में लॉ एंड आर्डर की समस्या आती है तो स्थानीय प्रशासन को निष्पक्ष होकर कार्रवाईं करने की छूट मिलना चाहिए। अगर ऐसा नहीं होगा तो सपा के हाथ में नुकसान के अलावा कुछ नहीं लगेगा। वह भाजपा को कोसने में ध्यान लगाये हैं जबकि उनकी प्रतिद्वंदी भाजपा इस दायरे से उठ कर बात कर रही है। इसकी बानगी बार-बार देखने को मिल रही है। हाल में ही केन्द्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे का बयान आया। उन्होंने सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर कहा कि इस ओर विशेष ध्यान दिया जाये कि जेलों में निर्दोष अल्पसंख्यक न बंद रहें। इस पर भाजपा का कहना था अल्पसंख्यक ही क्यों कोई भी निर्दोष जेल में न रहे।
समय तेजी से निकल रहा है और समाजवादी पार्टी संभल नहीं पा रही है। बदले हालात में मुसलमान भले ही उसके साथ खड़ा रहे,लेकिन पिछड़ा वर्ग और उसमें भी यादव बिरादरी जिस पर मुलायम अपना हक समझते हैं, वह भी उनसे बिदकने लगा है। भले ही सरकार आज जिनती मनमानी कर ले,परंतु उसकी अंधेरगर्दी के खिलाफ हाईकोर्ट आंख मंूद कर बैठने के मूड में नजर नहीं आ रहा है।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश से छांट-छांट कर जाट बिरादरी के पुलिस कर्मियों को दूरदराज के जिलों में तैनाती का मामला अदालत में पहुंच गया ह। अदालत ने सरकार से जबाव-तलब किया है और सिपाहियों को उनकी पुरानी तैनाती पर ही बने रहने का फरमान जारी करने के साथ ही कई महत्वपूर्ण जानकारियां तो सरकार से मांगी ही हैं इसके अलावा अदालत ने दंगों को लेकर
विवादों में घिरे मंत्री आजम खॉ को भी नोटिस जारी किया है। ऐसा लगता है कि दंगों की जांच की पर अदालत की भी नजरें लगी रहेंगी।
लेखक अजय कुमार लखनऊ में पदस्थ हैं. वे यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई अखबारों और पत्रिकाओं में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. अजय कुमार वर्तमान में ‘चौथी दुनिया’ और ‘प्रभा साक्षी’ से संबद्ध हैं.
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