उत्तर प्रदेश जातिवादी व्यवस्था का जिन्न सभी पार्टियों के ऊपर चढ़ा हुआ है। यह जिन्न पर कभी सपा के कंधे पर सवार हो जाता है तो कभी हाथी पर सवार होकर चिंघाड़ने लगता है। कमल पर मंडराने और पंजे को मरोड़ने में भी इस जिन्न को खूब मजा आता है। जातीय जिन्न की वजह से विकास के मुद्दे का पहिया जाम है। पिछले चुनाव में बिहार से भगाया गया जिन्न अभी उत्तर प्रदेश का पीछा नहीं छोड़ा है। यही वजह है कि इस समय भी उत्तर प्रदेश में कोई भी दल विकास के मुद्दे पर चुनाव नहीं लड़ रहा है। राजनीतिक दल राजनीति के बहाने प्रदेश की जनता की मूलभूत समस्याओं की अनदेखी कर ऐसे ऐसे मुद्दे उठाते हैं, जिनसे उत्तर प्रदेश सांप्रदायिकता एवं जात-पात की राजनीति का गढ़ बनता जा रहा हैं हालांकि जनता जातीय जिन्न से अब छुटकारा पाना चाहती है। वह इस परंपरा से आजिज है, परंतु सभी राजनीतिक दल अपने-अपने हिसाब से प्रदेश की जनता को हांकना चाहते हैं।
कोई भी राजनीतिक दल यह समझने को कतई तैयार नहीं कि जनता के सामने कौन सी समस्याएं मुंह बाये खड़ी हैं। पूरे प्रदेश की जनता त्राहिमाम-त्राहिमाम कर रही हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश दिमागी बुखार, नेपाली नदियों के कहर, पलायन, अशिक्षा, गरीबी जैसी ज्वलंत समस्याओं से त्रस्त हैं। लेकिन इन बातों से माननीयों का लेना- देना नहीं है । राज्यों के बंटवारे की राजनीति सिर पर चढ़कर बोल रही है। अल्पसंख्यकों के साढ़े चार प्रतिशत मजहबी आरक्षण से कोहराम मचा है। कांग्रेस के युवराज गांव गलियों में घूम-घूम कर गरीब किसानों मजदूरों, के घर ठहरकर उनके विकास की बात करते नहीं थक रहे थे। केन्द्र सरकार ने बुंदेलखंड के किसानों के लिए स्पेशन पैकेज भिजवाया उसका फायदा किसको मिला कोई नहीं जानता। सभी दलों ने जातीय तेवर अख्तियार कर रखे हैं।
कांग्रेस भी पीछे नहीं रही। केन्द्र ने 4.5 प्रतिशत आरक्षण दिया तो उसके मंत्री सलमान खुर्शीद मुसलमानों को 9 प्रतिशत की आरक्षणी सौगात देने की बात कहने लगे। वहीं मुल्ला मुलायम की उपाधि हासिल करने वाले सपा सुप्रीमों एक कदम आगे बढ़कर 18 प्रतिशत का आरक्षण का छक्का मुस्लिम हित में जड़ दिया है। भाजपा भी मुस्लिम आरक्षण में अपने हित तलाशने में जुट गयी है। वह पिछड़ों के 27 प्रतिशत कोटे में मुस्लिम आरक्षण देने की बात को मुद्दा बनाकर पिछड़ों की सहानुभूति हासिल करने में लगी है। 27 प्रतिशत का भाजपा का पिछड़ा वोट बैंक तब और पक्का होने लगा लगा जब भाजपा ने बाबूसिंह कुशवाहा को अपने पाले में खड़ा कर लिया। इस पर भाजपा की अंदर और बाहर काफी छीछालेदर हुई। लेकिन भाजपा ने अपने कदम पीछे नहीं खींचे। बस इतना भर किया, सबको खुश करते हुए भाजपा ने बाबूसिंह कुशवाहा से स्थगन पत्र दिलवा दिया। अब कुशवाहा भाजपा के न होते हुए भी उसके लिए पिछड़ा वोट बैंक का आधार बने हैं।
विदित हो कि कुशवाहा को लाने से पहले भाजपा ‘सुशासन लाओ, भ्रष्टाचार हटाओ‘ का नारा लगाकर जनता के विकास की बात कर रही थी। लेकिन उमा की सोच और कुशवाहा प्रकरण ने उसके विकास के नारे को दरकिनार कर जातीय बैशाखी पर खड़ा कर दिया है। लोध जाति की उमा भारती को बुंदेलखंड की चरखारी सीट से चुनाव मैदान में उतारकर भाजपा खुलकर जातिवादी राजनीति पर उतर आयी है। यही कारण है कि भाजपा ने प्रदेश सरकार के पूर्व मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा को पार्टी में शामिल कर कल्याण सिंह के जाने से लोध बिरादरी के कम हुए वोट बैंक की भरपाई कुशवाहा, शाक्य, सैनी, मौर्य से करने की रणनीति अपनाई है। यहां लोध बिरादरी के 2.64 प्रतिशत वोट हैं, जबकि कोइरी बिरादरी के 1.09 प्रतिशत, मौर्या बिरादरी के 1.54 प्रतिशत, सैनी बिरादरी के 0.20 प्रतिशत, और शाक्य बिरादरी के 0.30 प्रतिशत। लोध बिरादरी के लोग अधिक हैं। भाजपा पिछड़ों को साथ लेकर और अपने परंपरागत वोट बैंक के सहारे रामलहर जैसा माहौल फिर से दोहराना चाहती है। यही वजह है कि इस बार वह दलित महापुरुषों की फोटो अपने चुनाव प्रचार में इस्तेमाल कर रही है।
सपा और बसपा की कट्टर राजनीति के चलते उत्तर प्रदेश में जातिवाद की जड़े इतनी गहरी चली गईं कि उनका नष्ट होना सहज काम नहीं रह गया। गांव-गांव में फैली जातीय बेल बढ़ती ही जा रही है। जातिगत वोट के लिए नेता उसे पुष्पित और पल्लवित कर रहे हैं। साथ ही धनबल और बाहुबल की बाड़ भी लगाये हुए है। युवाओं को लुभाने के लिए पहली बार सपा ने लैपटाप और टैबलेट छात्रों को बांटने जैसे लुभावने वायदे कर रही है।
बात जहां तक जातीय वोट बैंक की है। सभी दल जातियों की आबादी बढ़चढ़कर बताते नजर आ रहे हैं। एक मोटे अनुमान के अनुसार उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक आबादी जाटव की 15.15 प्रतिशत है। इसके अलावा पासी, धोबी, कंजर, भंगी आदि मिलाकर 23 प्रतिशत से ऊपर हैं। बसपा 2007 के विधानसभा चुनाव में जाटव और ब्रहामणों को अपने साथ लाकर सत्ता में आई थी और 2002 के विधानसभा चुनाव में पाए 23.2 प्रतिशत मत को 30.4 प्रतिशत तक ले जाने में कामयाब रही थी। इससे पहले वह ‘तिलक तराजू और तलवार‘ नारा लगाकर दलित वोट को एकजुट कर चुकी थी। इस बार यह कार्ड सफल होता नहीं दिख रहा हैं। इसका प्रमुख कारण है, सत्ता विरोधी लहर और ऊपर से आधे से अधिक विधायकों का टिकट कटने के कारण अंदरखाने में उठता बगावती धुंआ है। लेकिन इस बात को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता है कि बसपा ही एक ऐसी पार्टी है, जिसका जनाधार लगातार बढ़ रहा है। बसपा पहली बार सत्ता में रहकर चुनाव मैदान में है। देखना यह है कि क्या अबकी बसपा की बढ़ता का ग्राफ कितना ऊपर नीचे होता है।
नई उभरी पीस पार्टी भी जातिवादी रंग में डूबी है। शुरुआती दौर में जहां उसके मुखिया डा. अयूब यह कहते नहीं थकते थे, ‘पीस पार्टी सर्वजन हिताय के लिए ही बनी है। लेकिन लेकिन आज वह ठाकुरवाद के जातीय दलदल में धंसती जा रही है। विकास का ढिंढोरा पीटने वाली पीस पार्टी अब अशांत दिख रही है। गौरतलब है कि जातिवादी जिन्न का तांडव राजनीतिक दलों में तब दिखा जब परवान चढ़ी जातिवादी राजनीति के चलते वर्ल्ड लेबल के ख्याति प्राप्त साहित्यकार सलमान रूश्दी का भारत दौरा इसलिए रद्द हुआ कि उसका असर यूपी के चुनाव पर पड़ सकता था। करीब 22 साल से उत्तर प्रदेश में हाशिये पर रही कांग्रेस का जातिगत वोट
बैंक ब्राह्मण, दलित तथा मुस्लिम उसके पाले से बाहर हो गया था।
लखनऊ से वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार की रिपोर्ट. अजय ‘माया’ मैग्जीन के ब्यूरो प्रमुख रह चुके हैं. वर्तमान में ‘चौथी दुनिया’ और ‘प्रभा साक्षी’ से संबद्ध हैं.






