प्रिय यशवंत जी, बहुत दुःख एवं आश्चर्य के साथ बताना चाहता हूँ कि जादूगोड़ा में चिटफंड संचालकों द्वारा अरबों लेकर भाग जाने के लगभग पन्द्रह दिनों बाद भी अभी तक पुलिस प्रशासन द्वारा कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गयी है, ना तो संचालक पकड़े गए हैं और ना ही उनके एजेंटों के ऊपर कोई पुलिसिया कार्रवाई हुई है. चिटफंड संचालकों के ऑफिस, घर, माल, होटल, रेस्टोंरेंट, ( संचालकों के २३/०९/२०१३ से भाग जाने के बाद सभी बंद पड़े हैं ) किसी को भी सील नहीं किया गया है और न ही कोई कागजात जब्त किया गया है.
विश्वस्त सूत्र बताते हैं कि इन जगहों के सीसीटीवी फुटेज एवं कंप्यूटर का डाटा निकालने पर बड़ी जानकारी पुलिस को मिल सकती है, लेकिन स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों ने संचालकों (कमल) से इतने गिफ्ट लिए हैं कि हो सकता है की फुटेज में वे खुद दिखाई पड़ जायें और उनकी पोल खुल जाये.
घोर आश्चर्य की बात यह है कि इन संचालकों ( कमल सिंह एवं दीपक सिंह ) के माता पिता पर किसी प्रकार का दवाब पुलिस प्रशासन नहीं बना रही है उल्टे उन्हें प्रशासन द्वारा सुरक्षा मुहैया कराई गयी है, जबकि कई निवेशकों ने उनके माता पिता के माध्यम से भी निवेश कराये थे एवं वे दोनों भी कमल के इस खेल में पूरी तरह से शामिल हैं.
दैनिक अखबार में छपे समाचार के अनुसार स्थानीय दल झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेताओं द्वारा उपायुक्त कार्यालय में ०७/१०/२०१३ को आवेदन देकर कहा गया है कि जादूगोड़ा पुलिस प्रशासन के लोगों द्वारा २३/०९/२०१३ को रात १२.३० बजे पुलिस वाहन से स्काट कर इन संचालकों को क्षेत्र से बाहर सुरक्षित पहुंचाया गया. आवेदन में यह भी बताया गया है कि यूसिल माइंस गेट में लगे कैमरों में सबकुछ कैद है.
०८/१०/२०१३ को प्रभात खबर के समाचार के अनुसार फरार संचालक कमल सिंह, दीपक सिंह तथा उनके एजेंट रूद्र नारायण भकत, मिहिर चंद्र मल्लिक, सीदो पूर्ति, अजित पात्रो, एवं वरुण सी को पुलिस पन्द्रह दिनों बाद भी पकड़ने में विफल रही है, इससे लोगो में तरह–तरह की चर्चा है, स्थानीय लोगों का कहना है कि पुलिस अप्रत्यक्ष रूप से कमल ग्रुप को संरक्षण एवं मदद दे रही है. लोगों का कहना है कि पुलिस की नीयत साफ रहती तो अगस्त माह में ही कमल टीम को गिरफ्तार कर सकती थी. लोगों का कहना है कि पुलिस कहती थी कि फरार होने से पहले किसी ने शिकायत नहीं की तो किस आधार पर पुलिस कमल को थाना एवं गेस्ट हाउस में बुलाकर घंटो पूछताछ करती थी. पुलिस केवल कागजी कार्रवाई एवं छापेमारी दिखा कर लोगों को गुमराह कर रही है, लोगों का कहना है कि आज भी संचालकों के एजेंट क्षेत्र में खुलेआम घूम रहें हैं जिनके ऊपर ठगी का मामला दर्ज करवाया गया है, परन्तु पुलिस ने केवल पांच एजेंटों पर ही मामला दर्ज किया है.
अब स्थानीय पुलिस के अंदर का सच मैं आपको बता रहा हूँ, स्थानीय पुलिस पहले कमल सिंह से पैसे लेती थी संरक्षण देने के नाम पर, अब सुनने में यह आ रहा है कि थाना से नाम काटने के नाम पर पुलिस एवं एजेंटों में दो-दो लाख रुपये का सौदा हो रहा है, यानी कि हाथी ज़िंदा भी सवा लाख का और मरा हुआ भी सवा लाख का.
अभी तक १६३ लोगों ने थाना में इन संचालकों एवं एजेंटों के विरुद्ध मामला दर्ज करवाया है, जबकि इन्वेस्टरों की संख्या ५ हज़ार से भी अधिक है.
इसी बीच जादूगोड़ा के लोगों को एक और चिटफंड कंपनी अपरूपा भविष्वा भी करोड़ों की चपत लगाकर अपना कार्यालय जादूगोड़ा में बंद कर चुकी है. लोगों के समक्ष हाथ मलने के अलावा कुछ नहीं बचा है. कई लोगों ने मुझे बताया कि पुलिस के पास जाकर क्या होगा उल्टे हमें ही परेशान किया जायेगा.
यहां यह भी बताना जरुरी है कि पुलिस प्रशासन ने जादूगोड़ा में पूरी तरह से अपना विश्वास खो दिया है.
एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.






