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सुख-दुख...

जाना तो हमको पहले था रवि

: स्मृति शेष : रवि (रवि पंत) से मेरी पहली मुलाकात तब हुई थी, जब हिंदुस्तान मेरठ से नया संस्करण निकलने जा रहा था। उनका परिचय मुझे अपने एक विश्वस्त सहयोगी द्वारा एक होनहार विनम्र और मेहनती ‘लड़के’ के बतौर दिया गया था, जो सही ब्रेक मिलने पर काफी आगे जा सकता था। दरमियाने कद और दुबली पतली काठी के उस युवा के चेहरे पर, जो मुझसे मिलने आया, एक सौम्य आत्मविश्वास था। उसकी छोटी छोटी आंखों में बुद्धि की दीप्ति थी। बिना किसी ज्वालामुखी जोश, या ‘मैंने आपको या शिवानी जी को बचपन से सराहा है’ सरीखा वाक्य बोले, उन्होंने अपना परिचय नपे तुले शब्दों में दिया।

: स्मृति शेष : रवि (रवि पंत) से मेरी पहली मुलाकात तब हुई थी, जब हिंदुस्तान मेरठ से नया संस्करण निकलने जा रहा था। उनका परिचय मुझे अपने एक विश्वस्त सहयोगी द्वारा एक होनहार विनम्र और मेहनती ‘लड़के’ के बतौर दिया गया था, जो सही ब्रेक मिलने पर काफी आगे जा सकता था। दरमियाने कद और दुबली पतली काठी के उस युवा के चेहरे पर, जो मुझसे मिलने आया, एक सौम्य आत्मविश्वास था। उसकी छोटी छोटी आंखों में बुद्धि की दीप्ति थी। बिना किसी ज्वालामुखी जोश, या ‘मैंने आपको या शिवानी जी को बचपन से सराहा है’ सरीखा वाक्य बोले, उन्होंने अपना परिचय नपे तुले शब्दों में दिया।

साक्षात्कार खत्म होने तक अपनी कुशाग्रता और पूछे गए विषयों की जानकारी से हम सबको इतना प्रभावित किया कि उन्हें मेरठ संस्करण का प्रभारी बनाने की तुरंत शुरुआत कर दी गई। कुछेक विघ्नसंतोषी लोगों ने यह ‘इंपल्सिव’ फैसला लेने का हल्का प्रतिवाद किया भी, किंतु तब तक मैं और कुछ न भी हो, पच्चीस बरस में हिंदी पत्रकारिता की उन गलियों, तहखानों और चोर दरवाजों से राजनीतिक नसेनियों के सहारे आ घुसे कंकड़ों और मेधा तथा ईमानदारी के ताप से परिपक्व हुए हीरों के बीच परख करने में समर्थ थी।

मेरी यह आस्था रवि ने नहीं झुठलाई। फिर कुछ समय बाद दूसरे उथल पुथल भरे प्रभार को उसे सौंपा गया, इस बार बनारस। ‘परिवार को वहां ले जाना होगा। बीच टर्म में बच्चों की पढ़ाई में व्यवधान से या और कोई तकलीफ होगी तो बताइयेगा, मैंने कहा तो रवि का हस्बेबामूल उत्तर था, नहीं, मैं मैनेज कर लूंगा। वहां भी पूरी गरिमा और निष्ठा से उसने काफी कठिन परिस्थितियों में काम जमाया। गो मुझे उनके त्वरित उत्थान से अकारण हो रहे दफ्तरी भितरघात और ‘पहाड़ी बिरादरी’ के अतिरिक्त रूप से उभर रहे कर्मियों के नाम पर कुछ ईर्ष्यालु गुमनाम पत्रों के बंटवार की खबरें मिलती रहती थीं, पर न कभी उन्होंने उसकी शिकायत की और न ही मैंने जवाब तलब किया। बच्चे उनके मेधावी थे और उनका स्कूली पढ़ाई में रमना और अखबार में आती बेहतरी रवि के लिए सुख का एक अनवरत स्रोत था। रवि को मैंने साप्ताहिक संपादकीय लिखने को कहा और उनका सुघड़ गंभीर लेखन मेरे मन में उनके प्रति और अधिक आदर जगा गया।

इसी बीच मैंने अखबार से अवकाश लेने का फैसला ले लिया। जब अपने वरिष्ठ सहयोगियों को मैंने सूचित किया तो रवि (जो संयोगवश शहर में थे) ही इकलौते व्यक्ति थे, जिनकी प्रतिक्रिया थी, आपने अकारण नहीं, कुछ सोच कर ही किया होगा। रवि से इसके बाद भी संपर्क बना रहा। त्योहार पर, नए साल पर तो कभी कोई आलेख पढ़ने के बाद। संक्षिप्त सा वार्तालाप, पर उनके मन का सच्चा स्नेह छलकता रहता। आप ठीक तो हैं ना? तबीयत? तभी पता चला वे खुद काफी बीमार हैं। फोन लगाया, तो लगा आवाज बदलने लगी है। बताया गया तालू में कुछ पेशियों को लकवा मार गया है। डॉक्टर कहते हैं धीमे धीमे ठीक हो जाएगा। पर पापशंकी मन में जाने क्यों धुकपुकी होती रही कहीं यह किसी बड़े कष्ट की शुरुआत तो नहीं? एकाध बार कहने की कोशिश भी की, पर भैय्या अपने स्वास्थ्य का खयाल रखना से अधिक न मैं कह सकी,  न हां हां दीदी सब ठीक है से अधिक वे। और अब वे नहीं रहे। जाना तो हमको पहले था रवि और यह लेख हमारे बारे में तुमको लिखना था। ईश्वर जहां भी तुम हो, तुम्हारी उस नेक, अजातशत्रु सहज आत्मा को शांति दे।

लेखिका मृणाल पांडे वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार हैं.

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