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जानिए, ट्रक वालों से उगाही का रेट देश के किस हिस्से में कितना चल रहा है

हमारे एक चाचा हैं, नाम है मुंशीलाल पर हम उन्हें दद्दू कहते हैं। कुल चार साल मुझसे बड़े हैं लेकिन चाचा हैं सगे सो चाचागिरी कभी-कभी दिखा देते हैं। दद्दू ट्रक चलाते हैं। जब मूड आया तो नौकरी कर ली जब जी चाहा घर बैठ गए। चाची खूब खिसियाईं, रोई, पीटीं पर दद्दू पर असर नहीं। हारकर चाची ने खेती बटाई पर उठाई और खुद ही घर संभाल लिया। दो बेटियां ब्याह दीं और एक बेटा भी। बस एक बेटा बचा है। किस्साकोताह यह कि एक बार मैने चाचा से कहा कि मुझे भी अपने साथ ट्रक पर ले चलो। करीब बारह साल पहले चाचा आ गए कोलकाता और वहां के जनसत्ता में बतौर संपादक मेरा नाम छपा देखकर वे अपने भतीजे से मिलने आ गए।

हमारे एक चाचा हैं, नाम है मुंशीलाल पर हम उन्हें दद्दू कहते हैं। कुल चार साल मुझसे बड़े हैं लेकिन चाचा हैं सगे सो चाचागिरी कभी-कभी दिखा देते हैं। दद्दू ट्रक चलाते हैं। जब मूड आया तो नौकरी कर ली जब जी चाहा घर बैठ गए। चाची खूब खिसियाईं, रोई, पीटीं पर दद्दू पर असर नहीं। हारकर चाची ने खेती बटाई पर उठाई और खुद ही घर संभाल लिया। दो बेटियां ब्याह दीं और एक बेटा भी। बस एक बेटा बचा है। किस्साकोताह यह कि एक बार मैने चाचा से कहा कि मुझे भी अपने साथ ट्रक पर ले चलो। करीब बारह साल पहले चाचा आ गए कोलकाता और वहां के जनसत्ता में बतौर संपादक मेरा नाम छपा देखकर वे अपने भतीजे से मिलने आ गए।

रात को मैं उन्हें घर ले गया। चाचा बोले चाहो तो मेरे साथ चलो अभी तो कानपुर से माल लेकर यहां आया हूं अब इंफाल जाऊँगा फिर वहां से देखूंगा कहां का माल मिलेगा। मैंने कहा चलिए। चाचा का ट्रक हावड़ा के किसी ट्रांसपोर्ट कंपनी में खड़ा था। वे मुझे अपने साथ ले गए और रात को बड़ा बाजार आकर माल उतारा। रास्ते में हावड़ा ब्रिज पर उन्होंने वहां खड़े हवलदार को पांच का एक सिक्का दिया। मैंने कहा कि अरे यहां तो कम्युनिस्ट राज है यहां रिश्वत नहीं चलती। चाचा ने कहा कम्युनिस्ट राज है इसलिए पांच रुपये मुलायम सिंह का राज होता तो 50 रुपये और दिल्ली, हरियाणा व पंजाब में रेट मिनिमम सौ रुपये का है। यह दस्तूर है हम हर रेड लाइट पर दे देते हैं। फिर कोई झंझट नहीं चाहे जितना माल लादो चाहे जितनी बार रेड लाइट जंप करो। नार्थ ईस्ट के राज्यों में यह रेट पांच से दस रुपये के बीच ही था। पर नगालैंड में नगा आदिवासी भी हाथ दे देता तो दद्दू उसे भी पांच रुपये पकड़ा देते।

मैंने पूछा कि इन्हें क्यों देते हो? बोले यह नगाओं का दस्तूर है। अगर वो हाथ दे दे तो पांच रुपये पकड़ा दो वर्ना अगर उसने कहीं धावा बोल दिया तब फिर खैर नहीं। तब नृपेन दा के अगरतला में रेट बीस रुपये का था और अरुणाचल में 25 रुपये। अभी पिछले दिनों चाचा ट्रक लेकर दिल्ली आ गए। जा रहे थे मुंबई के पास, बोले चलोगे? मैंने कहा अभी आप जाइए, फिर अगली दफे चलूंगा। लेकिन उत्सुकतावश मैंने ट्रैफिक वालों के रेट पूछ लिए। दद्दू ने बताया कि अब यूपी का भरोसा नहीं रह गया है। गाजियाबाद में तो रेट सौ का है पर अगर नोएडा गए तो रेट दिल्ली वाला लगेगा यानी दो सौ रुपये, हरियाणा तथा राजस्थान के बहरोड तक यही रेट है। आगे फिर वही सौ रुपये।

मोदी के गुजरात में रेट दो सौ रुपये है और महाराष्ट्र में सौ रुपये पर मुंबई में दो सौ रुपये। दद्दू ने कहा कि आजकल पंजाब का रेट पांच सौ चल रहा है पर बाकी देश में हालात इतने खराब नहीं हैं। एक दिलचस्प बात बताई कि बिहार में रेट आजकल यूपी से ज्यादा है लेकिन बंगाल में अभी भी पांच के सिक्के से काम चल जाता है। मैंने पूछा कि माणिक सरकार बाबू के त्रिपुरा में? दद्दू ने बताया कि वहां रेट अब पचास रुपये का हो गया है। दद्दू ने एक बात और बताई कि यूपी व बिहार में गाड़ी ओवरटेक करने के लिए कोई अगर दो बार लगातार डिपर दे तो समझ जाओ कि यह लौंडा वीआईपी है और साइड दे दो। मैंने पूछा कि ये लौंडा वीआईपी क्या होता है तो दद्दू ने बताया कि किसी वीआईपी की बिगड़ैल संतान या कोई बोर्ड का चेयरमैन अथवा राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त फोकटिया मंत्री।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से.

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