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‘जानो दुनिया’ नामक एक कथित नेशनल चैनल की हकीकत जानो दुनिया वालों

खीचो ना कमानो को न तलवार निकालो
गर तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो

पत्रकारिता और जन संचार की पढाई करने के दौरान अल्लामा इकबाल की शायरी मुझे एक ताकत देती थी औऱ खूब मेहनत से पढता था लेकिन हकीकत तो पढाई खत्म होने के बाद समझ मे आयी… जनसंचार की पढाई खत्म करने के बाद एक न खत्म होने वाला सफर शुरू हुआ… उसकी कोई मंजिल पहले तो नजर नही आई और हम तो चलते रहे जान बेमंजिल मगर मुड़कर देखे नहीं पैर के छाले हमने…

खीचो ना कमानो को न तलवार निकालो
गर तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो

पत्रकारिता और जन संचार की पढाई करने के दौरान अल्लामा इकबाल की शायरी मुझे एक ताकत देती थी औऱ खूब मेहनत से पढता था लेकिन हकीकत तो पढाई खत्म होने के बाद समझ मे आयी… जनसंचार की पढाई खत्म करने के बाद एक न खत्म होने वाला सफर शुरू हुआ… उसकी कोई मंजिल पहले तो नजर नही आई और हम तो चलते रहे जान बेमंजिल मगर मुड़कर देखे नहीं पैर के छाले हमने…

ये दिल्ली से होकर अहमदाबाद पहुंचा.. 'जानो दुनिया' नामक चैनल में थककर पहुंच गया.. कहने को तो ये नेशनल चैनल था और हम रिपोर्टर की टीम ने भी काफी ज्यादा मेहनत कर इसको बनाये रखने का प्रयास किया… धीरे धीरे 'जानो दुनिया' दुनिया में रहने वाले लोगों के बीच पहुंचने लगी लेकिन एक दिन अचानक चैनल प्रशासन ने ऐसा कदम उठा लिया जिसे सुनकर बेवकूफ के सरदार भी हंसने के मजबूर हो जाएं…

बात के पत्रकारिता के इतिहास के उस काले दिन की जिस दिन एक ऐसा निर्णय लिया गया जिसका कोई सानी ही नहीं… 'जानो दुनिया' के तथाकथित मालिकों ने 9 रिपोर्टरों की टीम को आफिस से निकाल दिया ….तेरे कूचे से बड़े बे आबरु होकर हम निकले ….आफिस से निकाल दिया यानी हमेशा के लिये नहीं बल्कि किसी दूसरे आफिस में शिफ्ट कर दिया ….आफिस कहना तो आफिस की बदनामी करना होगा बल्कि ये कहने में मुझे कोई एतराज नहीं होगा कि हमें एक घोसले में रखा गया जहां न्यूज तो हमें मिलती नहीं थी लेकिन हम सारे लोग धीरे धीरे नजदीक होते गये …

कुछ दिन बीत गया तो कैमरामैन की एक टीम भी वहां हमारे साथ पहुंच गई.. लेकिन उनका भी क्या कहना.. उनकी भी हालत कुछ ऐसी हो गई कि न सनम ही मिला न विसाले खुदा… न इधर के रहे न उधर के रहे ….धीरे धीरे दिवाली का त्यौहार नजदीक आ रहा है और हम लोगों को ये उम्मीद आज भी है कि शायद चैनल प्रशासन को कोई उधार में थोड़ी अक्ल दे दे और वो लोग अपने इस फैसले को वापस ले लें लेकिन यहां ये भी कहना जरूरी हो जाता है कि अक्ल अंधी है तो कोई निर्णय सही से नहीं लिया जाता… लेकिन हम कर भी क्या सकते हैं… हम तो यही कहेंगे अय खुदा इन्हें थोडी अक्ल दे तो शायद इस चैनल की शक्ल बदल पाने में कामयाबी हासिल कर पायेंगे ….

लेकिन ऐसे मौके पर ये भी कहना जरूरी हो जाता है कि क्या ये सारे निर्णय चैनल मालिक को पता हैं या फिर मालिक के पुछलग्गे ये सब करवा रहे हैं… ये तो सही वक्त आने पर पता चलेगा कि बगावत कि चिंगारी कहां से उठी थी …लेकिन इतना तो जरूर है कि किसी अपने ने ही इस बगावत को शुरू किया है ….शर्त ये है कि हमें आज तक कुछ पता नहीं चला लेकिन जिस दिन पता चलेगा उस दिन मेरे घर की हालत कुछ ऐसी होगी …शाम को जिस वक्त खाली हाथ घर लौट जाता हूं
मुस्कुरा देते हैं बच्चे और मैं मर जाता हूं …मेरे पत्रकार दोस्तों बस आज के लिये इतना ही… आने वाले समय में हम ऐसे ही बेबाक होकर आप लोगो से मिलते रहेंगे…

….आपका

शहिल अश्क

Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
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