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जावेद अख्‍तर बने प्रभात खबर के अतिथि संपादक

हमलोग अक्सर कहते हैं कि हिंदुस्तान सोने की चिड़िया थी. इसके अपने अर्थ हैं. आखिर वह भारत के कौन से हिस्से थे, जिसे सोने की चिड़िया कहा जाता था. आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु तो काफ़ी दूर थे. उन इलाकों से तो भारत के बाकी लोग वाकिफ़ भी नहीं थे. सोने की चिड़िया यही थी-यही हिंदीभाषी प्रदेश (मगध-अवध प्रदेश). यहीं सब कुछ हुआ. सभी देवी-देवताओं का संबंध यहीं से रहा है. ईस्ट इंडिया कंपनी का भी केंद्र यही इलाका रहा. आज भले ही इसे आप बिहार, यूपी के रूप में राजनीतिक रूप से अलग कर देखें, उस वक्त तो सब एक ही थे.

हमलोग अक्सर कहते हैं कि हिंदुस्तान सोने की चिड़िया थी. इसके अपने अर्थ हैं. आखिर वह भारत के कौन से हिस्से थे, जिसे सोने की चिड़िया कहा जाता था. आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु तो काफ़ी दूर थे. उन इलाकों से तो भारत के बाकी लोग वाकिफ़ भी नहीं थे. सोने की चिड़िया यही थी-यही हिंदीभाषी प्रदेश (मगध-अवध प्रदेश). यहीं सब कुछ हुआ. सभी देवी-देवताओं का संबंध यहीं से रहा है. ईस्ट इंडिया कंपनी का भी केंद्र यही इलाका रहा. आज भले ही इसे आप बिहार, यूपी के रूप में राजनीतिक रूप से अलग कर देखें, उस वक्त तो सब एक ही थे.

अंगरेजों ने यहां धीरे-धीरे अपना जाल बिछाया. यही इलाका था, जहां सबसे ज्यादा अंगरेजों का प्रतिरोध हुआ. वह चाहे कुंवर सिंह हों या अवध के नवाब या फ़िर झांसी की रानी-सबसे ज्यादा यही इलाका लड़ा है. बड़े पैमाने पर यहीं लड़ाई हुई. ठगी एक तरह से भूमिगत आंदोलन था. इसमें कौन लोग थे? अंगरेजों ने खुद ही लिखा है कि इसमें व्यवसायी थे. बड़े घरों के लोग थे. मुसलमान भी थे, जो काली की पूजा करते थे. दरअसल, अंगरेजों ने जिस अर्थव्यवस्था को बरबाद किया, उससे पीड़ित ये लोग थे. अंगरेजों ने हिंदी प्रदेशों की अर्थव्यवस्था को बरबाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी.

यहां चांदी बहुतायत में थी. चांदी यहीं से दूसरे देशों में गयी और बदले में सोना आया. अंगरेजों ने जब इस अर्थव्यवस्था को तोड़ने की कोशिश की, तो ठगी का मूवमेंट चला-कोलकाता से दिल्ली तक. अंगरेजों ने सबसे ज्यादा इस इलाके को बरबाद किया, क्योंकि उन्हें यहीं से खतरा महसूस हो रहा था. उन्होंने बिहार के दो वक्त की रोटी की खेती को नील की खेती में बदल दिया. आप देखेंगे कि देश के दूसरे हिस्सों की तरह बिहार में अंगरेजों के बनाये संस्थान या प्रतीक नहीं मिलेंगे. दो सौ वर्षो तक इस जगह को बरबाद किया गया. देश से मुहब्बत और अंगरेजों के खिलाफ़ लड़ाई की कीमत उन्हें चुकानी पड़ी.

जिन्होंने अंगरेजों का साथ दिया, उन्हें इनाम मिला. दुर्भाग्य यह रहा कि आजादी के बाद भी इस सच्चाई को नहीं समझा गया. बिहार की ओर अलग से ध्यान नहीं दिया गया. यही तो सोने की चिड़िया थी. आज यदि बिहार अपनी स्थापना के सौ साल मना रहा है, तो पिछले दो सौ साल को भी याद रखने की जरूरत है, जब बिहार ने अपनी लड़ाई की कीमत अदा की. इन लम्हों को आगे बढ़ाने की जरूरत है. अब जबकि इस इमारत को फ़िर से खड़ा करने का प्रयास किया जा रहा है, यह जिम्मेवारी सिर्फ़ बिहार की नहीं, बल्कि पूरे देश की है, क्योंकि बिहार ने आजादी की लड़ाई सिर्फ़ अपने लिए नहीं, बल्कि पूरे भारत के लिए लड़ी थी. बिहार के बारे में धारणा बदली है. जिनका बिहार से सीधा जुड़ाव नहीं है, उनके मन में भी इस राज्य के प्रति आदर का भाव पैदा हुआ है.

जावेद अख्‍तर

साभार : प्रभात ख़बर

 

 
 

 
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