बड़े कठोर सच और यथार्थ को आपने लोगों के सामने रखा है। इसके लिए आपका तहे दिल से साधुवाद। उदयन शर्मा की पुस्तक फिर पढ़ना। उसमें रविवार पत्रिका में उनके लिखे गए कुछ लेखों का संकलन है। मैंने उसे पढ़ा था। एसपी के बारे में भी एक पवित्र छवि थी। लेकिन यहां तो बुनियाद ही बदनामी, बदनीयती, बजबजाती गंदगी से शुरू हुई जो आजतक जारी है। सारे जगहों पर प्रतिबद्धता किसी चिड़िया का नाम है।
इस पेशे के नाम पर आम जनता की झोली के पैसे से अखबार के कागज आते हैं। लेकिन उसमें जनता नहीं होती। सारे ओहदे नाते रिश्तेदार और तेलबाजों के पास है। जिसने इस लेख को रोका होगा, वह जाने कितनों के सिर पर पैर रखकर आगे हो गया होगा। आपने जो कहा… वह पढ़के भी हंसेंगे। शर्मिंदगी नाम की चीज होगी तो माथा जरूर एक बार खुजाएंगे। इन तथाकथित बड़ों के पास स्वर्ग सुविधा वाले फ्लैट और केबिन हैं।
जितेंद्र जी आपने जो बयां किया वह काबिलेतारीफ है। इसे तो पोस्टर बनाकर दीवारों पर चिपकाना चाहिए। उन सभी पत्रकारिता संस्थानों के बच्चोंको देना चाहिए। जो मासूम इस पेशे को आज भी सच्चा मानकर इसमें आना चाहते हैं। जिसे खादी से नफरत हो। कलर प्लस पहनने वाले को आज भी देश की 70 फीसदी जनता इज्जत की निगाहों से देखती है जरूरी नहीं। मदर टेरेसा की साड़ी खादी की थी। आज भी लोग स्वीटजरलैंड की नौकरी ठोकरमारकर मेरठ जैसे शहरों में गरीबों को भोजन देते हैं। बंगाल की सब्जी बेचने वाली चाची का अस्पताल गरीबों को प्रश्रय देता है। यह पेशा तो वह भी नहीं कर रहा। क्योंकि बुनियाद ही बदनियती से रखी गई थी।
सरिता सिन्हा
उपरोक्त प्रतिक्रिया इस विश्लेषण पर है…
जिस लेख को अंजीत अंजुम ने 'हंस' के मीडिया विशेषांक में नहीं छापा, उसे यहां पढ़िए






