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लखनऊ

जिसका जूता उसकी भैंस है यूपी के स्‍वास्‍थ्‍य विभाग में!

उत्तर प्रदेश की सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं बेहद लचर हैं यह बात हम मीडिया के माध्यम से समय समय पर सुनते रहते हैं. दरअसल पूरे सरकारी विभाग में इस तरह का माहौल है, स्वास्थ्य सेवाओं का स्तर इससे बेहतर नहीं हो सकता. मैंने 2010 में उत्तर प्रदेश सरकार की नौकरी ज्वाइन की. मैं फिरोजाबाद के एक बेहद पिछड़े इलाके में कार्यरत था. वहां के लोकल स्टाफ ने अमर उजाला व हिन्दुस्तान के पत्रकारों के साथ मिल कर मेरे विरुद्ध अखबार में खबरें छपवाई, स्थानीय लोगों को भड़काया. जबकि मैं चौबीस घंटे अस्पताल में उपलब्ध रहता था और ओ.पी.डी रजिस्टर व मेडिको लीगल रजिस्टर इस बात के गवाह हैं कि अस्पताल चलाना मुख्यतः मेरे ही जिम्मे था. 

उत्तर प्रदेश की सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं बेहद लचर हैं यह बात हम मीडिया के माध्यम से समय समय पर सुनते रहते हैं. दरअसल पूरे सरकारी विभाग में इस तरह का माहौल है, स्वास्थ्य सेवाओं का स्तर इससे बेहतर नहीं हो सकता. मैंने 2010 में उत्तर प्रदेश सरकार की नौकरी ज्वाइन की. मैं फिरोजाबाद के एक बेहद पिछड़े इलाके में कार्यरत था. वहां के लोकल स्टाफ ने अमर उजाला व हिन्दुस्तान के पत्रकारों के साथ मिल कर मेरे विरुद्ध अखबार में खबरें छपवाई, स्थानीय लोगों को भड़काया. जबकि मैं चौबीस घंटे अस्पताल में उपलब्ध रहता था और ओ.पी.डी रजिस्टर व मेडिको लीगल रजिस्टर इस बात के गवाह हैं कि अस्पताल चलाना मुख्यतः मेरे ही जिम्मे था. 

पत्रकार, लोकल स्टाफ और उसके द्वारा भड़काए गए चंद लोगों की वजह से मेरा जीना दुश्वार हो गया. जून 2011 में मेरा ट्रांसफर टूंडला के एक नवीन प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर हो गया. यहाँ जब मैं आया था उस वक्त करीब डेढ़-दो सौ मरीज़ महीने में आते थे. एक महीने में ही मैंने करीब पांच-छह सौ मरीजों की ओ.पी.डी पहुंचा दी, लेकिन दो महीने बाद ही सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र टूंडला ने दवाएं देना ही बंद कर दीं. जब मैं यहाँ आया था उस समय न तो अस्पताल में कोई रजिस्टर था और न अस्पताल में अन्य कोई  सुविधा थी. मैंने अपने पैसे से सामान खरीद कर वहां की व्यवस्था बनाई और वह पैसा मुझे विभाग से कभी नहीं मिल सका.

मैंने RTI के माध्यम से पूछा भी पर विभाग किसी RTI का जवाब नहीं देता है. अप्रैल 2012 में मेरा ट्रांसफर नवीन प्राथमिक स्वास्‍थ्‍य केंद्र से सामुदायक स्वास्थ्य केंद्र टूंडला पर कर दिया. मुख्य चिकित्साधिकारी कार्यालय के बाबू मुझसे इसलिए चिढ़ते हैं क्योंकि मैं अपना काम ईमानदारी से करता हूँ और उन्हें चढ़ावा चढ़ाने नहीं जाता. इसलिए इन्होंने पिछले एक साल से बहुत परेशान किया. सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र अधीक्षक व मुख्य चिकित्साधिकारी का बाबुओं के साथ अलिखित समझौता होता है और बाबू एक तरह से इनके दलाल होते हैं. ये लोग एक वर्ष से निरंतर मेरा उत्पीड़न कर रहे हैं.

मेरे फरवरी -मार्च 2012 माह के वेतन से 937- 937 रु. काट लिए जबकि अगस्त 2011 से अस्पताल की बिजली व्यवस्था ध्वस्त थी और मैंने इसकी लिखित शिकायत अधीक्षक को की थी. जबकि दूसरे चिकित्साधिकारियों के वेतन से बिजली का बिल नहीं काटा गया है. मेरे निरंतर कहने व लिखित में शिकायत करने पर भी मेरा फरवरी 2012 का वेतन बिना किसी कारण के रोके रखा गया. मैंने उन्नीस जुलाई को एक RTI डाला, उसके बाद भी 12 अगस्त को मेरा वेतन एक बैंकर चेक के रूप में दिया. मेरा जुलाई से दिसंबर 2010 तक का महंगाई  भत्ता बार-बार कहने, लिखित में देने और RTI देने के बावजूद नहीं निकाला और न ही RTI का जवाब दिया है. अप्रैल 2012 से अब तक का मकान भत्ता नहीं निकाला है जबकि बाकी चिकित्साधिकारियों को वह मिल रहा है.

जून-जुलाई 2012 का मेरा वेतन रोक दिया गया और कारण यह बताया कि भूल से छूट गया है. मुझे बताया कि दस-बारह दिन में वेतन आ जाएगा. एक माह गुजरने के बाद मुझे क्लर्क ने बताया कि मुख्य चिकित्साधिकारी कार्यालय में दो हज़ार रुपये मांग रहे हैं. मैंने इसकी लिखित शिकायत सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र अधीक्षक, मुख्य चिकित्साधिकारी, अतिरिक्त महानिदेशक व स्वास्थ्य सचिव को की परन्तु किसी ने कोई सुनवाई नहीं की. इसके बावजूद मुख्य चिकित्साधिकारी ने मेरा वेतन दो हज़ार रुपये पाने के लिए दो महीने बाद तीस अक्टूबर को निकाला, जबकि मेरे खाते में बिलकुल पैसे नहीं थे और इसी बीच मेरे छोटे भाई को बेहोशी की हालत में हिन्दू राव अस्पताल में भर्ती कराया गया था. मेरे अगस्त, सितम्बर और अक्टूबर के वेतन से एक-एक दिन का वेतन भूल से काट लिया गया है जो अभी तक नहीं निकाला गया है.

मैंने अधीक्षक व मुख्य चिकित्साधिकारी को अपनी इन समस्याओं के बारे में RTI दिए जिनका मुझे कोई जवाब नहीं मिला. बदले में अधीक्षक ने दिसंबर में मेरी तीन तीन दिन लगातार इमरजेंसी ड्यूटी लगा दी और जब मैंने इसका विरोध किया तो उन्होंने कहा कि वे मेरा ट्रान्सफर करवा देंगे. उन्होंने मुख्यचिकित्साधिकारी से कह कर मेरा ट्रान्सफर जनवरी में एक दूर दराज के इलाके में करा दिया है. इन समस्याओं से तंग आकर मैंने उत्तर प्रदेश सरकार की नौकरी छोड़ने का मन बनाया और इक्कीस फरवरी को एक प्रार्थना पत्र work experience certificate के लिए दिया. करीब तीन महीने गुजर जाने के बाद भी क्लर्क का कहना है कि अभी रिकॉर्ड देखा जा रहा है जबकि यह एक घंटे का काम है. मैंने मुख्य सूचना आयुक्त तक अपील की है परन्तु ग्यारह सूचना आयुक्त वाले भारी भरकम आयोग ने पांच महीने बाद भी कोई कार्रवाई नहीं की है.
         
हम समझ सकते हैं कि उत्तर प्रदेश में अधिकारी सारे नियम क़ानून ताक पर रख कर किस क़दर निरंकुश हैं. अभी अफजल गुरु को फांसी लगाई गयी तब मेरे मन में बार-बार यह बात आती रही कि जब देश में कानून व्यवस्था जैसी कोई चीज़ ही नहीं है तो फिर इस देश में संसद और विधान सभाओं की ज़रूरत ही क्या है.

डा. राम प्रकाश अनंत

[email protected]

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