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जीत गए महुआ के हड़ताली मीडियाकर्मी, सेलरी बांटने पर मजबूर हुआ महुआ मैनेजमेंट

महुआ न्यूज से बड़ी खबर आ रही है. पिछले बहत्तर घंटे से न्यूज रूम पर कब्जा जमाए आंदोलनकारियों की एकजुटता और दबाव के आगे महुआ मैनेजमेंट को झुकना पड़ा. इस वक्त महुआ आफिस में सभी कर्मियों को सेलरी देने का काम चल रहा है. दस हजार रुपए कैश और दो पोस्टडेटेड चेक. इस तरह पूरे तीन महीने का भुगतान महुआ मैनेजमेंट ने कर दिया है. बाकी कंपनसेशन की मांग पर महुआ मैनेजमेंट का कहना है कि उनकी स्थिति ऐसी नहीं है कि वो कंपनसेशन दे सकें. मीडियाकर्मी इसके लिए कोर्ट और लेबर डिपार्टमेंट जाने के लिए स्वतंत्र हैं.

महुआ न्यूज से बड़ी खबर आ रही है. पिछले बहत्तर घंटे से न्यूज रूम पर कब्जा जमाए आंदोलनकारियों की एकजुटता और दबाव के आगे महुआ मैनेजमेंट को झुकना पड़ा. इस वक्त महुआ आफिस में सभी कर्मियों को सेलरी देने का काम चल रहा है. दस हजार रुपए कैश और दो पोस्टडेटेड चेक. इस तरह पूरे तीन महीने का भुगतान महुआ मैनेजमेंट ने कर दिया है. बाकी कंपनसेशन की मांग पर महुआ मैनेजमेंट का कहना है कि उनकी स्थिति ऐसी नहीं है कि वो कंपनसेशन दे सकें. मीडियाकर्मी इसके लिए कोर्ट और लेबर डिपार्टमेंट जाने के लिए स्वतंत्र हैं.

मतलब ये कि पीके तिवारी, मीना तिवारी और महुआ मैनेजमेंट को अपनी लायजनिंग की क्षमता पर पूरा भरोसा है कि अगर ये मीडियाकर्मी लेबर डिपार्टमेंट या कोर्ट गए तो वहां वे सब कुछ 'सेट' कर लेंगे और अपने खिलाफ आदेश नहीं होने देंगे, कुछ उसी तरह जैसे कल महुआ पर भड़ास समेत कई मीडिया व वेब पोर्टलों के संचालकों और दर्जनों वरिष्ठ-कनिष्ठ पत्रकारों के जोरदार प्रदर्शन के बाद महुआ के मालिकों ने पुलिस को खिला पिला कर महुआ पर कब्जा जमाए आंदोलनकारियों को बाहर निकालने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया. अगर तुरंत शीर्ष राजनेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों से संपर्क कर पुलिस की अभद्रता और मैनेजमेंट के उत्पीड़न को रुकवाने का प्रयास नहीं किया गया होता तो डंडाधारी पुलिस आंदोलनकारियों की पीट कर बाहर निकालने का फैसला कर चुके थे और इस फैसले पर कुछ बड़े पुलिस अफसरों की सहमति थी.

खैर, पीके तिवारी को उनके कर्मों की सजा कोई क्या देगा, खुद ही मिल रही है. करप्शन, दलाली, भ्रष्टाचार, चारसौबीसी आदि के आरोपों में यह शख्स सीबीआई समेत कई एजेंसियों की जद में है. जेल जा चुका है. बैंकों ने डिफाल्टर घोषित कर दिया है. कोलकाता से लेकर मुंबई-दिल्ली तक में इसके घपलों की दर्जनों कहानियां हैं. सो, यह खुद ब खुद उस जाल में फंसता जा रहा है जिसे इसने खुद बुना हुआ है.

महुआ आफिस के सामने पत्रकारों की नुक्कड़ सभा के दृश्य.


बधाई उन बहादुर महुआ कर्मियों को जिन्होंने इस चरम बाजारू दौर में अपने हक के लिए न सिर्फ तीन दिनों तक लगातार संघर्ष किया बल्कि प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद महुआ न्यूज रूम से बाहर नहीं निकले, प्रबंधन के किसी छलावे में नहीं आए, पुलिस के किसी भय के कारण कमजोर नहीं पड़े. इन लोगों ने दिवाली की पूर्वसंध्या पर अपना हक छीनकर यह जता दिया है कि अगर तुम प्रेम से नहीं दोगे तो हम अपना हक छीन कर लेंगे. इन सभी बहादुर महुआकर्मियों को दिवाली की ढेर सारी शुभकामनाएं. दिवाली के बाद इन कर्मियों के आगे एक बड़ी चुनौती नया रोजगार तलाशने की है क्योंकि इन लोगों ने आज तीन महीने की सेलरी लेने के बाद फुल एंड फाइनल सेटलमेंट और रिजाइन के लेटर पर साइन कर दिया है. ये कतई नहीं चाहते कि वहां काम करें जहां उन्हें तनख्वाह न दी जाती हो. ये फैसला बिलकुल सही है. चुनाव के इस मौसम में कई सारे चैनल व अखबार आदि पाइपलाइन में हैं. जरूर इन्हें कहीं न कहीं कोई काम मिलेगा. और, कहीं काम न मिले तो ये खुद का कोई रोजगार शुरू करें ताकि उन बुनियादी जरूरतों को पूरा कर सकें जिसके लिए इन्हें किसी लाला, बनिया, किसी सेठ, किसी करप्ट, किसी फ्राड, किसी चिटफंडिये, किसी बिल्डर के यहां बीस-बीस घंटे खटना पड़ता है.

भड़ास हर उस पत्रकार के साथ है जो अपने हक के लिए लड़ रहा है और ईमानदारी से जीवन निर्वाह करते हुए समाज व सिस्टम की खामियों के खुलासे में लगा हुआ है. बहुत शार्ट नोटिस पर कल दर्जनों पत्रकार इकट्ठे हुए और महुआ को घेर कर जमकर नारेबाजी की गई और भाषणबाजी हुई. मैं उन सभी लोगों को दिल से धन्यवाद कहना चाहूंगा जो महुआ के साथियों के सपोर्ट में आंदोलन में शामिल होने के लिए फिल्म सिटी पहुंचे.

इन्हें भी पढ़ें…

महुआ के अंदर-बाहर प्रदर्शन, भाषण, आंदोलन की कुछ तस्वीरें और कुछ बातें

महुआ की जीत : इसके मायने, सबक और निहितार्थ क्या हैं?

लेखक यशवंत सिंह भड़ास4मीडिया डाट काम के संपादक हैं.

संपर्क: मेल- [email protected]

मोबाइल- 09999330099


संबंधित अन्य खबरों के लिए यहां क्लिक करें…

महुआ आफिस कब्जा

 

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